सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस साबित होंगे सार्थक राष्ट्र, राज्य, जिला, अनुभाग, नगर, कस्बा, गांव, गली को ध्यान में रख हो रणनीत तैयार सृष्टि, सृजन में स्वस्थ, समृद्ध, खुशहाल जीवन के लिये नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप सामाजिक ज्ञान-विज्ञान ही सार्थक होता है स्वराज पर समय रहते संज्ञान लिया होता तो परिणाम कुछ और ही होते दया, प्रेम, त्याग, निष्ठापूर्ण, कत्र्तव्य निर्वहन ही स्वस्थ, समृद्ध जीवन का आधार है सत्य से विमुख जीवन की सार्थकता सृष्टि में अनादिकाल से संदिग्ध रही है
व्ही.एस.भुल्लेविलेज टाइम्स समाचार सेवा।
हो सकता है कि स्वभाव विपरीत स्वार्थवत महत्वकांक्षी जीवन अज्ञानता बस लोग इस सत्य को आज का आध्यात्म करार दें इसे ग्लोबल संस्कृति, संस्कारों में नकार सकते है व विलासितापूर्ण संस्कृति, शिक्षा, संस्कारों के मोहपास में फस अज्ञानता को ही ज्ञान-विज्ञान मान सकते है और सृष्टि के सिद्धान्त प्रकृति में हर जीव को प्राप्त है। उसके मूल स्वभाव पर भी सवाल खडे कर सत्य को नकार उसे अस्वीकार्य कर सकते है। मगर कहते है कि जब तक इस सृष्टि में किसी भी भूभाग पर जीवन है तब तक सत्य को न तो कभी अस्वीकार्य किया जा सकता है न ही उसे नकारा जा सकता है। क्योंकि मानव प्रकृति की एक ऐसी अनमोल कृति है जो समूचे जीव-जगत में और वह प्रकृति का श्रंृगार का संरक्षक भी है जो उसकी सुन्दरता के स्वरूप को दिव्य, भव्य, सार्थक सफल बनाने में एक स्वभाविक नैसर्गिक जीवन का अंग है। मगर दुर्भाग्य कि अनादिकाल से मानव की स्वार्थवत महत्वकांक्षायें और नैसर्गिक स्वभाव के विरूद्ध उसका व्यवहार ने आज उसे कहीं का नहीं छोडा है।
देखा जाये तो एक मात्र छोटे से वायरस कोरोना के आगे आज बडी-बडी महाशक्तियां और मानव सभ्यता कांप रही है तो वहीं हजारों की तादाद में मानव कोरोना का शिकार हो अपना बहुमूल्य जीवन गंवा रहे है। कारण नैसर्गिक स्वभाव विरूद्ध शिक्षा, संस्कृति, संस्कार, आचरण, व्यवहार है। आज भी हम न चेते तो हमारा वर्तमान तो भयाभय दिख ही रहा है अगर हमने आज भी सार्थक संज्ञान नहीं लिया तो भविष्य कितना बीभत्स हो सकता है, कल्पना की जा सकती है। आज जब हम कोरोना जैसी महामारी से सोशल डिस्टेंस और घरों में बंद रह दो-दो हाथ करने में जुटे है। ऐसे में समझने वाली बात यह है कि हमें सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस के सिद्धान्त को जीवन में और व्यवस्था में आत्मसात करना ही होगा, आज की स्थिति में हमारा यहीं ही कर्म और धर्म होना चाहिए। क्योंकि सील सिद्धान्त के रहते जहां हम अपनी राष्ट्रीय और राज्य, जिला सहित अनुभाग, नगर, कस्बा, गांव, गली की सीमाओं को आवश्यकता अनुसार सील कर सीमाओं पर सुरक्षा और स्वास्थ्य संसाधनों से लैस स्वास्थ्य टीमों की तैनाती से सीमा पर ही कोरोना की चेन को तोड सकते है तो वहीं सोशल डिस्टेंस व्यक्ति से व्यक्ति की दूरी और घरों में रहकर कोरोना की चेन को प्रभावी ढंग से रोक सकते है। मगर इन दोनों मोर्चो पर कोरोना से आरपार की जंग जीतने हमें मजबूत सप्लाई चेन बनानी होगी जो प्रभावी हो जिसके माध्यम से कोरोना से लडने मास्क, केप और हेंड गिलेब्स जैसे संसाधन साथ ही जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर आबादी से दूर अलग से कोरोना सेन्टर जिससे शेष आबादी चिकित्सालय एवं चिकित्सीय स्टाफ को सुरक्षित रख कोरोना पर जोरदार प्रहार किये जा सके और जो सैनिक घरों में बैठ सोशल डिस्टेसिंग के साथ व्यक्ति से व्यक्ति की दूरी बना कोरोना से मोर्चा ले रहे है उनके लिये जरूरत की दवा, खादन्न सामग्री, दूध और पानी की पर्याप्त व्यवस्था हो सके, जो शासन उत्पादक हाॅल सेलर और रिटेल विक्रेताओं के बीच समन्वय बना मांग अनुसार पूर्ति की व्यवस्था रखे और यह संभव है क्योंकि सौभाग्य से गांव से लेकर नगर, कस्बा, शहरों में इतना स्टाफ है कि जिनकी मदद से रिटेलर, हाॅल सेलर और उत्पादकों के समन्वय से कोरोना की जंग को आसान किया जा सकता है।
जय स्वराज
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