स्वराज का सील सप्लाई सोशल डिस्टेंस का फाॅरमूला कोरोना का परास्त कर मजबूत निर्माण अर्थव्यवस्था में होगा कारगार स्वार्थवत महत्वकांक्षा अहम, अहंकार ले डूबा समृद्ध, स्वस्थ, सशक्त जीवन और शास्त्रार्थ सत्ता का यथार्थ स्वरूप तय करने वक्त स्वराज के मूल में है खुशहाल जीवन और विश्व गुरू बनने आधार

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
स्वार्थवत अहम, अहंकारी सत्ताओं का प्राकृतिक सिद्धान्त से इतर आचरण व्यवहार यूं तो अनादिकाल से रहा है मगर उसकी भयाभयता इतनी विकराल होगी वह न तो आज की सत्ता और न ही सृष्टि, सृजन में अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले आम जीव-जगत और मानव ने सोचा होगा जिस कोरोना के महासंकट से सारे विश्व में जीवन को लेकर कोहराम मचा है उससे निदान के लिये सील सप्लाई सोशल डिस्टेंस जैसे कदम जो स्वराज का मूल आधार है कोरोना के खिलाफ भले ही आज एक अचूक अस्त्र और कारगार हथियार हो। मगर जो स्वराज का मूल है और जिसका सत्य आधार है शायद उससे हम मानव ही नहीं समूचे जीव-जगत को बचा पाये। मगर प्राकृतिक सिद्धान्त विरूद्ध जिस तरह से सत्तायें अपनी महत्वकांक्षा, अहंकार और स्वार्थो के चलते शास्त्रार्थ का अर्थात ज्ञान-विज्ञान का तिरस्कार करती रही है। परिणाम कि आज समृद्ध, स्वस्थ, खुशहाल जीवन घिसटने पर मजबूर है। 
ये अलग बात है कि प्रकृति से प्राप्त अपने नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप कोरोना से तो निवट उसे सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस के माध्यम से निवटा ही लेंगे। मगर उसके पश्चात जीवन के लिये संघर्ष का भस्मासुर और चैपट होती अर्थव्यवस्था तथा रोजगार की भयाभयता निश्चित ही मानव जगत के सामने जिन्दा रहने आने वाली है। जिसकी चिन्ता सिर्फ सत्ता सरकार, संस्थाओं को ही नहीं आम नागरिक को भी करनी चाहिए क्योंकि जिस तरह से अनादिकाल से अहंकारी, महत्वकांक्षी स्वार्थवत सत्तायें सुरक्षित, स्वस्थ, समृद्ध, खुशहाल जीवन की कीमत पर अपना इकबाल बुलंद करती आई है वह क्रम आज भी लगता है कि कुछ जगह थमने का नाम नहीं ले रहा है। अगर यो कहे कि समय-समय पर सत्ताओं का स्वरूप तो बदला संचालन कत्र्ताओं के चेहरे भी बदले। मगर समस्या संकटों का पहाड यथावत बना रहा है। आज जब हम ही नहीं समूचा विश्व महासंकट के दौर से गुजर रहा है ऐसे में समाधान का आभाव इस बात के स्पष्ट संकेत है कि हमने अपने स्वार्थ महत्वकांक्षा पूर्ति और अहम, अहंकार के चलते एक से बढकर एक उपलब्धियां तो हासिल की। मगर जिस तरह से मानव ने अपने नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप प्राकृतिक सिद्धान्तांे की अवेहलना कर ज्ञान-विज्ञान और शास्त्रार्थ का तिरस्कार कर उसका घोर अपमान किया है उसकी भरपाई अब सिर्फ और सिर्फ स्वराज के रास्ते ही हो सकती है। ऐसे में निस्तानाबूत होने की दिशा में बढती मानव सभ्यता अर्थव्यवस्था रोजगार जिसके गर्भ में अप्रत्याशित महासंकट जीवन के लिये छटपटा रहा है जो कोरोना से कहीं अधिक घातक हो सकता है उस पर विचार करने का वक्त है। क्योंकि सृष्टि में जीवन, मृत्यु सुबह और शाम एक कटु सत्य है। आज जब हम शास्त्रार्थ के विरूद्ध निर्जीव मशीनों और सिस्टम में समाधान खोज रहे है ऐसे में जीवन को लेकर यक्ष सवाल होना स्वभाविक है। अगर आज भी हमारी सत्तायें, संस्थायें और दिन रात मानव जीवन को सुरक्षित करने में जुटे महानुभावों ने निर्जीव प्रकृति विरूद्ध पद्धति का स्वभाव अपने अहम अहंकार के रहते नहीं छोडा और समूचा मानव जगत अपने महत्वकांक्षी स्वार्थवत समाधानों में जुटा रहा तो यह सुनिश्चित है कि हमारी जीत आसान नहीं होगी। बेहतर हो कि हम स्वराज के ही रास्ते एक नई शुरूआत सील सप्लाई और सोशल डिस्टेंस के माध्यम से निष्ठापूर्ण तरीके से समाधान खोजने में सफल रहे तो निश्चित ही हम मानव ही नहीं समूचे जीव-जगत एवं मानव को स्वस्थ समृद्ध, सुरक्षित जीवन देने में सक्षम, सफल होगें और एक मर्तवा फिर से इस महान भूभाग से मानव जगत की बेहतरी के लिये हम सार्थक संदेश दे सकेंगे। 

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