सील सप्लाई सोशल डिस्टेंस का भट्टा बैठालते, न-समझ जरा-सी चूक पड सकती है जान पर भारी आजादी की छूट पर उमडा जन सैलाब
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कोरोना के कहर के बीच जब सारी उम्मीद माननीय, श्रीमानों पर टिकी हो ऐसे में 25 दिन के लाॅकडाउन पूर्ण और 13 दिन के शेष लाॅकडाउन के बीच अचानक सडकों पर उमडा लोगों का सैलाब और हाथों-हाथ सेवा करने उठे बाजारों के शटर तथा कुछ महिलाओं के हुजूम ने साबित कर दिया कि आध्यात्म को तो पहले ही विज्ञान, विकास की चकाचैंद में हम भुला चुके है। मगर अब तो विज्ञान, विकास के पुरोद्धा सुपर पावर महाशक्तियां भी कोरोना के चलते चारों खाने चित पडे है। हजारों की तादाद में होती मौतों और लाखों की संख्या संक्रमित लोगों के होने के बावजूद तथा प्रधानमंत्रत्री, मुख्यमंत्रियों तथा विधा, विद्ववानों के बार-बार आग्रह समझाइस के बावजूद भी अगर लोग मानने तैयार नहीं कि कोरोना कितनी भयाभय बीमारी है जिसकी विश्व में कोई दवा मौजूद नहीं सिर्फ सोशल डिस्टेंस और घरों में रहकर कोरोना का सामना करने के अलावा।
मौत के मुहाने पर खडी मानव सभ्यता को आज भी अपनी आजादी ज्यादा अहम और कोरोना का भय बेकार जान पडता है। कारण सिर्फ आम मानव की आजादी तक सीमित होता तो अलग बात थी कि अगर यह खबर दुरूस्त है कि सप्लाई लाईन और सटीक समझ में सेंधमारी हो रही है वह भी ऐसे खतरनाक अवसर पर जबकि कोरोना का कहर समूचे विश्व में टूट रहा है। ऐसे में इसे मानव सभ्यता के लिये शर्मनाक ही नहीं दर्दनाक ही कहा जायेगा। अगर देश के प्रधानमंत्री या कुछ मुख्यमंत्रियों को छोड दें, तो जिस तरह से सप्लाई तथा समझ की लाईन वष्ट हो रही है यह माननीय श्रीमानों को समझने वाली बात होना चाहिए। म.प्र. के मुख्यमंत्री ने शिवपुरी जिले को कोरोना मुक्त होने की बात क्या कही कि सुबह से ही दुकानों शटर उठ शिवपुरी की सडकों पर जन सैलाब पिलपडा। जबकि लाॅकडाउन 3 मई तक है जबकि इस जिले में न तो ऐसा कोई बडा उघोग है और न ही सरकार पर पैसा जो वह रोजगार के अवसर रात भर में ही उपलब्ध करा देती। मगर जन सैलाब जरूरत की चीजों के लिये सडक पर था। जिसे छूट के नाम मानों आजादी मिल गई हो। ऐसी न समझी को क्या नाम दें, यह तो माननीय श्रीमान आप ही को तय करना है कि कोरोना महासंकट से कैसे हम बचे। क्योंकि न तो हमारे पास उतनी उम्मदा समझ है न ही कोरोना से लडने कारगार संसाधन। मुम्बई, दिल्ली की सडको ंपर उमडा जनसैलाब देश के सामने शर्मनाक उदाहरण है। हमारे पास ऐसे में न तो पर्याप्त मास्क, गिलेब्स, स्क्रीनिंग मशीन न ही रक्षात्मक किट है अब तो रहा सहा राशन पानी भी जबाव देने की स्थिति में है। ऐसे में वष्ट होती सप्लाई लाईन समझ से परे है और सोशल डिस्टेंस में सेंधमारी जांच का ही नहीं बल्कि समीक्षा का विषय होना चाहिए तभी हम कोरोना से लड पायेंगे।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कोरोना के कहर के बीच जब सारी उम्मीद माननीय, श्रीमानों पर टिकी हो ऐसे में 25 दिन के लाॅकडाउन पूर्ण और 13 दिन के शेष लाॅकडाउन के बीच अचानक सडकों पर उमडा लोगों का सैलाब और हाथों-हाथ सेवा करने उठे बाजारों के शटर तथा कुछ महिलाओं के हुजूम ने साबित कर दिया कि आध्यात्म को तो पहले ही विज्ञान, विकास की चकाचैंद में हम भुला चुके है। मगर अब तो विज्ञान, विकास के पुरोद्धा सुपर पावर महाशक्तियां भी कोरोना के चलते चारों खाने चित पडे है। हजारों की तादाद में होती मौतों और लाखों की संख्या संक्रमित लोगों के होने के बावजूद तथा प्रधानमंत्रत्री, मुख्यमंत्रियों तथा विधा, विद्ववानों के बार-बार आग्रह समझाइस के बावजूद भी अगर लोग मानने तैयार नहीं कि कोरोना कितनी भयाभय बीमारी है जिसकी विश्व में कोई दवा मौजूद नहीं सिर्फ सोशल डिस्टेंस और घरों में रहकर कोरोना का सामना करने के अलावा।मौत के मुहाने पर खडी मानव सभ्यता को आज भी अपनी आजादी ज्यादा अहम और कोरोना का भय बेकार जान पडता है। कारण सिर्फ आम मानव की आजादी तक सीमित होता तो अलग बात थी कि अगर यह खबर दुरूस्त है कि सप्लाई लाईन और सटीक समझ में सेंधमारी हो रही है वह भी ऐसे खतरनाक अवसर पर जबकि कोरोना का कहर समूचे विश्व में टूट रहा है। ऐसे में इसे मानव सभ्यता के लिये शर्मनाक ही नहीं दर्दनाक ही कहा जायेगा। अगर देश के प्रधानमंत्री या कुछ मुख्यमंत्रियों को छोड दें, तो जिस तरह से सप्लाई तथा समझ की लाईन वष्ट हो रही है यह माननीय श्रीमानों को समझने वाली बात होना चाहिए। म.प्र. के मुख्यमंत्री ने शिवपुरी जिले को कोरोना मुक्त होने की बात क्या कही कि सुबह से ही दुकानों शटर उठ शिवपुरी की सडकों पर जन सैलाब पिलपडा। जबकि लाॅकडाउन 3 मई तक है जबकि इस जिले में न तो ऐसा कोई बडा उघोग है और न ही सरकार पर पैसा जो वह रोजगार के अवसर रात भर में ही उपलब्ध करा देती। मगर जन सैलाब जरूरत की चीजों के लिये सडक पर था। जिसे छूट के नाम मानों आजादी मिल गई हो। ऐसी न समझी को क्या नाम दें, यह तो माननीय श्रीमान आप ही को तय करना है कि कोरोना महासंकट से कैसे हम बचे। क्योंकि न तो हमारे पास उतनी उम्मदा समझ है न ही कोरोना से लडने कारगार संसाधन। मुम्बई, दिल्ली की सडको ंपर उमडा जनसैलाब देश के सामने शर्मनाक उदाहरण है। हमारे पास ऐसे में न तो पर्याप्त मास्क, गिलेब्स, स्क्रीनिंग मशीन न ही रक्षात्मक किट है अब तो रहा सहा राशन पानी भी जबाव देने की स्थिति में है। ऐसे में वष्ट होती सप्लाई लाईन समझ से परे है और सोशल डिस्टेंस में सेंधमारी जांच का ही नहीं बल्कि समीक्षा का विषय होना चाहिए तभी हम कोरोना से लड पायेंगे।
जय स्वराज
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