सर्वकल्याण की बडी बाधा स्वार्थवत महत्वकांक्षी सत्तायें और स्वार्थवत सलाहकार सत्य की अस्वीकार्यता, संपदा लूट का आचरण, सशक्त, समृद्ध, राष्ट्र निर्माण पर, कलंक क्या नैसर्गिक संपदा की लूट और सत्ताओं का अहंकार उसका नैसर्गिक स्वभाव है ? विनाश की ओर बढती मानव सभ्यता

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कभी महाभारत से पूर्व स्वयं प्रभु भगवान कृष्ण ने और लंका दहन से पूर्व स्वयं प्रभु राम ने आग्रह पूर्ण तरीके से अहंकारी, स्वार्थी संपदा चोर लूट करने वाली सत्ता, शासकों को सत्य, धर्म और मानवीय कत्र्तव्यों के बारे में खूब समझाया। मगर अहंकारी सत्ता शासकों ने अपने स्वार्थी चापलूस, चाटूकार, धूर्त महत्वकांक्षी सहयोगी, शुभचिन्तकों की सलाह के आगे उनकी एक नहीं सुनी। यहां तक कि वाणों की अंतिम सैया पर पडे अपने अंतिम सफर के दौरान भीष्म-पितामह जैसे महान बलशाली, वीर योद्धा की सर्वकल्याणकारी बात अहंकारी, स्वार्थी महत्वकांक्षी दुर्योधन ने नहीं सुनी, आज परिणाम हमारे सामने।
आज ठीक उसी प्रकार जब विश्व की मानव सभ्यता विभिन्न क्षेत्रों की बौद्धिक संपदा तथा सत्य को अस्वीकार्य कर संपदा लूट के साथ अपने चाटूकार, चापलूस, बौद्धिक चोरों के अहम, अहंकार में डूब मानव सभ्यता यहां तक आ पहुंची है और आज भी सत्ताओं में बने रहने सभा, संस्था, बौद्धिक संपदा के संरक्षण के सिद्धान्त की अनदेखी कर उसके तिरस्कार में जुटी है। ऐसे में मानव सभ्यता के बीच समृद्ध परिणामों की कल्पना सृष्टि सिद्धान्त और प्रकृति के नैसर्गिक स्वभाव के साथ खुली बैमानी है। हो सकता है कि मानव सभ्यता को इसकी बडी कीमत चुकाना पडे जो संभावित है। 
अगर सत्ताओं का संपदा लूट और सत्य को अस्वीकार्य कर अहम, अहंकार का रास्ता जीवन में दुरूस्त होता, तो इतिहास में दर्ज बडे-बडे बलशाली, शक्तिशाली सत्ताओं के शासकों के वंशज आज हमारे बीच अवश्य होते और उनके स्वार्थी महत्वकांक्षी, चापलूस, चाटूकार तथा बौद्धिक संपदा लूट करने वालों की वंशावली के प्रमाण भी हमारे बीच होते। 
आज जिस तरह से तकनीक का दुरूपयोग और बौद्धिक संपदा के लुटेरों की सत्ता के गलियारों में सक्रियता, सक्षमता, सफलता और धमक दिखाई देती है और जो अहम अहंकारी स्वार्थवत सत्ताओं के सिरमौर बने है इससे न तो उन सत्ताओं का कभी भला हुआ जो इतिहास में मौजूद है और न ही उन सत्ताओं का भला होने वाला है जो नया इतिहास गढने आतुर है और न ही उन समाज, संस्थाओं एवं मानव सभ्यताओं का भला होने वाला है जिनका मूल आधार निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन, सर्वकल्याण तथा मानव जीव-जगत की समृद्धि, खुशहाली है। बरना समूचे विश्व ही नहीं हमारे महान देश की आत्मा प्रमाणिक शास्त्रार्थ के अभाव में निर्जीव न पडी होती और ज्ञान-विज्ञान का पिता आध्यात्म मातम मनाने पर विवश न होता।
इसलिये समय का तकाजा है कि हम सत्य की स्वीकार्यता बढा अपनी विभिन्न संपदाओं का सम्मान, सरंक्षण और उन्हें उचित अवसर प्रदान कर अपने मानव, समाज और राष्ट्र-धर्म का पालन करें तथा समस्त मानव जीव-जगत तथा राष्ट्र कल्याण का मार्ग प्रस्त करें, न कि रावण और दुर्योधन की तरह अपनी महत्वकांक्षा के चलते कुलनाशी बनें। जिस तरह से दिन रात जन्म, मृत्यु, अग्नि जलवायु एक यथार्थ अनादि सत्य है। उसी तरह बौद्धिक संपदा भी सत्य है। जिसका आधार सिर्फ और सिर्फ नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप सृष्टि, सृजन में सर्वकल्याण ही होता है और जो अपनी आध्यात्म, ज्ञान-विज्ञान के बल समाधान को मूर्तरूप देने में अपना योगदान देती है। आज जब कोरोना जैसी महा बीमारी का कहर समूची मानव सभ्यता पर टूट पडा है। ऐसे में बौद्धिक संपदा ही वह औषधि है जो इससे समूची मानव सभ्यता को बचा सकती है। आज सभी के लिये यहीं समझने वाली बात होनी चाहिए।
जय स्वराज 

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