सीमित, संकुचित सोच और स्वार्थी संस्कार न तो हमारी विरासत है और न ही स्वभाव समृद्ध जीवन ने सत्ता, समाज को कभी निराश नहीं किया
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
निश्चित ही मेरा यह भाव न तो कोई खबरचियों के लिये खबर है और न ही समृद्ध, खुशहाल जीवन के लिये सबकुछ दाव लगा स्वयं की नैसर्गिक कृज्ञता को कलंकित करने वालों के लिये ज्ञान की बात। हो सकता है कि उन्हें यह बेकार की बात लगे जो जीवन में आज की समृद्ध, सुसंस्कृत पीढी के लिये अछूत हो चुका आध्यात्म लगे। अगर यों कहें कि 150 वर्षो के कालखण्ड में हमारी निष्ठापूर्ण, त्याग-तपस्या अनगिनत कुर्बानियां और हमारी उस महान शिक्षा, संस्कृति, संस्कारों का कचूमर निकल चुका है जिस पर कभी समूची मानव सभ्यता को नाज था तो कोई अति संयोक्ति नहीं होगी। यह कटु कडवा सच है कि सैकडो वर्षो से समृद्ध जीवन ने सत्ता, समाज और सरकारों को बहुत कुछ दिया और वह क्रम सेवा कल्याण के नाम आज भी जारी है, तो फिर सवाल यह उठता है कि आखिर सत्तायें, समाज इतना निष्ठुर स्वार्थी कैसे हो सकता है और उनका स्वभाव इतना अव्यवहारिक असंवेदनशील कैसे हो सकता है। अगर वाक्य में ही हमारे बीच यह भाव है तो इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि आज मानव ही नहीं समूचा जीव-जगत बडे संकट में है।
कौन नहीं जानता कि विश्व के विकसित, सुपर पावर देशों में कोरोना के कहर के चलते किस तरह से लाशें बिछ रही है और जीवन प्रदान करने वाले चिकित्सालय भरे पडे है। किस तरह से लोग अपना बहुमूल्य जीवन गंवानें पर मजबूर है। समूचे विश्व और विश्व के सुपर पावर ही नहीं हम भी हमारे भूभाग पर कोरोना के मौत का तांडव खुली आंखों से घरों में बंद रह देखने पर विवश है।
दुर्भाग्य आज किसी की चिन्ता, पुरूषार्थ, सत्ता बनाने, बचाने, बिगाडने, विस्तार में लगा है, तो समाज के अंदर कुछ वर्ग घरों में बंद लोगों की बैवसी का लाभ उठा कई गुना कीमत बसूलने में लगे है। आखिर हम मानवों के बीच ऐसा क्या है जो हमारी संवेदनायें संकट के समय भी दफन होती जा रही है। आखिर क्यों हमें अपने-अपनों की बैवसी, मजबूरी नहीं दिखती। आखिर क्यों सत्ता, सरकारें निर्जीव सिस्टम के रथ पर सवार सेवा कल्याण की ध्वजा फहरा सर्वकल्याण का जयघौस करती नहीं थकती। हालात ये है कि बगैर सार्थी के भीषण सेवा संग्राम मे जुटे महाबलियों की क्या बैवसी है जो वह सेवा कल्याण के महासंग्राम में अकेले ही अपना शौर्य दिखा महान हो जाना चाहते है। बहरहाल बैसे भी समूचे विश्व समुदाय में ग्लोबल संस्कृति के दौर में किसी को भी महान महाबली बनने कहलाने की मनाही नहीं है। मगर जिस तरह से कोरोना के कहर ने बडे-बडे वीर योद्धा बलशालियों को बगले फांकने पर मजबूर किया है वह किसी से छिपा नहीं। इसलिये समय है कि सत्ता, सरकारें, समाज सत्य और समय की नजाकत को समझें, बरना फिलहाल मानव जीवन तो संकट में है ही, कहीं ऐसा न हो कि पशुवत जीवन के लाले भी इस सृष्टि, सृजन में न पड जाये। क्योंकि किसी भी संक्रमित भयाभय बीमारी से संक्रमितों की संख्या का आंकडा 30 हजार के पार मानव समाज में कम संकट का कारण कम नहीं। काश समय रहते स्वराज का मार्ग इख्तियार किया होता तो आज हम इतने बडे संकट के अपने ही भूभाग पर साक्षी न होते। कहते है जबावदेही, उत्तरदायित्व ही वह सार्थक लक्ष्य होते है जो निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन को कसौटी पर कस सार्थक सफल परिणाम देने बाध्य होते है।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
निश्चित ही मेरा यह भाव न तो कोई खबरचियों के लिये खबर है और न ही समृद्ध, खुशहाल जीवन के लिये सबकुछ दाव लगा स्वयं की नैसर्गिक कृज्ञता को कलंकित करने वालों के लिये ज्ञान की बात। हो सकता है कि उन्हें यह बेकार की बात लगे जो जीवन में आज की समृद्ध, सुसंस्कृत पीढी के लिये अछूत हो चुका आध्यात्म लगे। अगर यों कहें कि 150 वर्षो के कालखण्ड में हमारी निष्ठापूर्ण, त्याग-तपस्या अनगिनत कुर्बानियां और हमारी उस महान शिक्षा, संस्कृति, संस्कारों का कचूमर निकल चुका है जिस पर कभी समूची मानव सभ्यता को नाज था तो कोई अति संयोक्ति नहीं होगी। यह कटु कडवा सच है कि सैकडो वर्षो से समृद्ध जीवन ने सत्ता, समाज और सरकारों को बहुत कुछ दिया और वह क्रम सेवा कल्याण के नाम आज भी जारी है, तो फिर सवाल यह उठता है कि आखिर सत्तायें, समाज इतना निष्ठुर स्वार्थी कैसे हो सकता है और उनका स्वभाव इतना अव्यवहारिक असंवेदनशील कैसे हो सकता है। अगर वाक्य में ही हमारे बीच यह भाव है तो इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि आज मानव ही नहीं समूचा जीव-जगत बडे संकट में है।
कौन नहीं जानता कि विश्व के विकसित, सुपर पावर देशों में कोरोना के कहर के चलते किस तरह से लाशें बिछ रही है और जीवन प्रदान करने वाले चिकित्सालय भरे पडे है। किस तरह से लोग अपना बहुमूल्य जीवन गंवानें पर मजबूर है। समूचे विश्व और विश्व के सुपर पावर ही नहीं हम भी हमारे भूभाग पर कोरोना के मौत का तांडव खुली आंखों से घरों में बंद रह देखने पर विवश है।
दुर्भाग्य आज किसी की चिन्ता, पुरूषार्थ, सत्ता बनाने, बचाने, बिगाडने, विस्तार में लगा है, तो समाज के अंदर कुछ वर्ग घरों में बंद लोगों की बैवसी का लाभ उठा कई गुना कीमत बसूलने में लगे है। आखिर हम मानवों के बीच ऐसा क्या है जो हमारी संवेदनायें संकट के समय भी दफन होती जा रही है। आखिर क्यों हमें अपने-अपनों की बैवसी, मजबूरी नहीं दिखती। आखिर क्यों सत्ता, सरकारें निर्जीव सिस्टम के रथ पर सवार सेवा कल्याण की ध्वजा फहरा सर्वकल्याण का जयघौस करती नहीं थकती। हालात ये है कि बगैर सार्थी के भीषण सेवा संग्राम मे जुटे महाबलियों की क्या बैवसी है जो वह सेवा कल्याण के महासंग्राम में अकेले ही अपना शौर्य दिखा महान हो जाना चाहते है। बहरहाल बैसे भी समूचे विश्व समुदाय में ग्लोबल संस्कृति के दौर में किसी को भी महान महाबली बनने कहलाने की मनाही नहीं है। मगर जिस तरह से कोरोना के कहर ने बडे-बडे वीर योद्धा बलशालियों को बगले फांकने पर मजबूर किया है वह किसी से छिपा नहीं। इसलिये समय है कि सत्ता, सरकारें, समाज सत्य और समय की नजाकत को समझें, बरना फिलहाल मानव जीवन तो संकट में है ही, कहीं ऐसा न हो कि पशुवत जीवन के लाले भी इस सृष्टि, सृजन में न पड जाये। क्योंकि किसी भी संक्रमित भयाभय बीमारी से संक्रमितों की संख्या का आंकडा 30 हजार के पार मानव समाज में कम संकट का कारण कम नहीं। काश समय रहते स्वराज का मार्ग इख्तियार किया होता तो आज हम इतने बडे संकट के अपने ही भूभाग पर साक्षी न होते। कहते है जबावदेही, उत्तरदायित्व ही वह सार्थक लक्ष्य होते है जो निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन को कसौटी पर कस सार्थक सफल परिणाम देने बाध्य होते है।
जय स्वराज

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