बड़ी उम्मीद है इस महान राष्ट्र को तप, त्याग, तपस्या और सन्यास से यथार्थ में आस्था है तो पुरूषार्थ तथा सामर्थ सिद्ध होना चाहिए धन्य होता है महान भारतवर्ष
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
अगर तप, त्याग, तपस्या, निष्ठा का प्रदर्शन यथार्थ है तो आस्था पुरूषार्थ के सामर्थ की सिद्धता हमारी प्रमाणिकता होनी चाहिए और यह संभव है कोई असंभव कार्य नहीं। लोकतांत्रिक, व्यवहारिक, व्यवस्था में कुछ सियासी सवाल देश के अन्दर और बाहर यक्ष हो सकते है सत्ताओं की कृतज्ञता को लेकर। वहीं दलों की प्रतिबद्धता के चलते सत्ताओं की अपनी कुछ मजबूरी, बैवसी, स्वस्थ, समृद्ध, खुशहाल जीवन को लेकर हो सकती है। मगर कहते है कि देश से बडा कोई दल नहीं होता। इसलिये राष्ट्र-धर्म का तकाजा होता है कि राजधर्म का पालन हो। अगर आज हमारे जीवन निर्वहन का आधार संवैधानिक और व्यवस्थागत लोकतंात्रिक है तो कानून का पालन हर कीमत पर कडाई से होना चाहिए। यहीं सत्ताओं का राष्ट्र-धर्म होना चाहिए। मगर जिस तरह से सत्तायें मानव जीवन को स्वस्थ, समृद्ध, खुशहाल बनाने संघर्षरत है। ऐसे में उन्हें समझना होगा कि देश के सामने दलों के प्रति प्रतिबद्धता के मार्ग पर शास्त्रार्थ के मूलमंत्र से विमुख हुये बगैर विधा-विद्ववानों का सानिध्य और शास्त्रार्थ का उपयोग होना चाहिए। क्योंकि जिनकी त्याग-तपस्या राष्ट्र मानव, जीव-जगत के कल्याण और उनके संरक्षण को लेकर है उसका लाभ राष्ट्र को अवश्य मिलना चाहिए और उसकी सिद्धता से समूचे मानव जगत को भी विधित होना चाहिए।
देखा जाये तो विगत कुछ वर्षो में जिस तरह से सत्ताओं ने अपने पुरूषार्थ के बल एक से बढकर एक राष्ट्र-जन और मानव कल्याण का योजनाओं के माध्यम से खाका खीचा है। ये अलग बता है कि उसकी सार्थकता अभी भी सिद्ध होने की दिशा में संघर्षरत है। यह संघर्ष फिलहाल अकल्पित सराहनीय हो सकते थे और भविष्य में हो भी सकते है मगर जरूरत उनके सार्थक क्रिन्यावयन के साथ उनकी पुरूषार्थपूर्ण प्रमाणिकत सिद्धता की है। कहते है कि मानव जीवन में सृष्टि सिद्धान्त को छोड किसी भी सिद्धान्त की सिद्धता असंभव नहीं। अगर अभी भी हम और हमारी सत्तायें सुरक्षा, समृद्धि के लिये उचित संसाधनों की उपलब्धता शास्त्रार्थ अर्थात आध्यात्म, ज्ञान-विज्ञान के सूत्र पर लक्ष्य सुनिश्चित करने में कामयाब होती है तो निश्चित ही सिद्धता का स्वप्न सिद्ध ही होगा और साकार भी। आज जब हमारी सत्ताओं के सिरमोर त्याग-तपस्वी, सन्यासी है और सियासत राष्ट्र-धर्म की ओर ऐसा सार्थक वातावरण प्रमाण और पुरूषार्थ की सिद्धता में सहायक होता है। ऐसे में विचार उन मार्गो पर होना चाहिए जिसमें सत्ता, सियासत स्वस्थ, समृद्ध, खुशहाल जीवन की उपादेयता सिद्ध हो सके और मानव जीवन कृतज्ञ।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
अगर तप, त्याग, तपस्या, निष्ठा का प्रदर्शन यथार्थ है तो आस्था पुरूषार्थ के सामर्थ की सिद्धता हमारी प्रमाणिकता होनी चाहिए और यह संभव है कोई असंभव कार्य नहीं। लोकतांत्रिक, व्यवहारिक, व्यवस्था में कुछ सियासी सवाल देश के अन्दर और बाहर यक्ष हो सकते है सत्ताओं की कृतज्ञता को लेकर। वहीं दलों की प्रतिबद्धता के चलते सत्ताओं की अपनी कुछ मजबूरी, बैवसी, स्वस्थ, समृद्ध, खुशहाल जीवन को लेकर हो सकती है। मगर कहते है कि देश से बडा कोई दल नहीं होता। इसलिये राष्ट्र-धर्म का तकाजा होता है कि राजधर्म का पालन हो। अगर आज हमारे जीवन निर्वहन का आधार संवैधानिक और व्यवस्थागत लोकतंात्रिक है तो कानून का पालन हर कीमत पर कडाई से होना चाहिए। यहीं सत्ताओं का राष्ट्र-धर्म होना चाहिए। मगर जिस तरह से सत्तायें मानव जीवन को स्वस्थ, समृद्ध, खुशहाल बनाने संघर्षरत है। ऐसे में उन्हें समझना होगा कि देश के सामने दलों के प्रति प्रतिबद्धता के मार्ग पर शास्त्रार्थ के मूलमंत्र से विमुख हुये बगैर विधा-विद्ववानों का सानिध्य और शास्त्रार्थ का उपयोग होना चाहिए। क्योंकि जिनकी त्याग-तपस्या राष्ट्र मानव, जीव-जगत के कल्याण और उनके संरक्षण को लेकर है उसका लाभ राष्ट्र को अवश्य मिलना चाहिए और उसकी सिद्धता से समूचे मानव जगत को भी विधित होना चाहिए।देखा जाये तो विगत कुछ वर्षो में जिस तरह से सत्ताओं ने अपने पुरूषार्थ के बल एक से बढकर एक राष्ट्र-जन और मानव कल्याण का योजनाओं के माध्यम से खाका खीचा है। ये अलग बता है कि उसकी सार्थकता अभी भी सिद्ध होने की दिशा में संघर्षरत है। यह संघर्ष फिलहाल अकल्पित सराहनीय हो सकते थे और भविष्य में हो भी सकते है मगर जरूरत उनके सार्थक क्रिन्यावयन के साथ उनकी पुरूषार्थपूर्ण प्रमाणिकत सिद्धता की है। कहते है कि मानव जीवन में सृष्टि सिद्धान्त को छोड किसी भी सिद्धान्त की सिद्धता असंभव नहीं। अगर अभी भी हम और हमारी सत्तायें सुरक्षा, समृद्धि के लिये उचित संसाधनों की उपलब्धता शास्त्रार्थ अर्थात आध्यात्म, ज्ञान-विज्ञान के सूत्र पर लक्ष्य सुनिश्चित करने में कामयाब होती है तो निश्चित ही सिद्धता का स्वप्न सिद्ध ही होगा और साकार भी। आज जब हमारी सत्ताओं के सिरमोर त्याग-तपस्वी, सन्यासी है और सियासत राष्ट्र-धर्म की ओर ऐसा सार्थक वातावरण प्रमाण और पुरूषार्थ की सिद्धता में सहायक होता है। ऐसे में विचार उन मार्गो पर होना चाहिए जिसमें सत्ता, सियासत स्वस्थ, समृद्ध, खुशहाल जीवन की उपादेयता सिद्ध हो सके और मानव जीवन कृतज्ञ।
जय स्वराज
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