नैतिक पतन के बीच, सेवा कल्याण की उम्मीद दम तोडते संस्कार और विलखती संस्कृति स्वाभिमान समृद्ध, खुशहाल जीवन को दया की दरकार
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है जब कोई मानवीय सभ्यता जीवन निर्वहन में तथा देखते जानते बूझते जब कोई भी इंसान क्षणिक स्वार्थवत मूर्ख बन दिमागी तौर पर दिवालिया हो जाये तो ऐसी सभ्यता और उसकी संस्कृति तथा संस्कारों का दम निकलना तय है। देखा जाये तो विगत 30 वर्षो के प्रमाणिक परिणाम सेवा कल्याण को लेकर लोगों की आंखों के सामने है और जिन आचार-विचार, व्यवहार तथा पहचान से वह आये दिन दो चार होता रहता है। अगर सही वक्त पर उसका भी संज्ञान न रहे तो उसे कैसा समाज कहा जाये। देखा जाये तो सूचना क्रान्ति के दौर में बडी लोगों की समझ और स्वयं के स्वार्थ तथा आलस्यपूर्ण निकम्मी बैवसी और फ्री में दया, भीख के उम्मीद के चलते जब वह निठल्ली हो जाये और उसे यह ज्ञान तक न रहे कि सच क्या है और गलत क्या तथा सच के सामने ही मुंह मोड वह शर्म मेहसूस न करें और इसी जीवन निर्वहन को जब वह अपना मान-सम्मान, स्वाभिमान मान खुशहाल, समृद्ध जीवन की कुंजी मान लें लगे तो इससे बडा दिमागी दिवालिया और सांस्कृारिक उजाड और कोई हो नहीं सकता। सियासत सत्ता को व्यवसाय समझ व्यापार बनाने वाली सियासत का सबसे बडा सत्य आज सेवा कल्याण के नाम यह है कि जिस पर जितना धन उतना बडा सक्षम सफल सियासी कद उसका होता है और जीत-हार सत्ता हासिल करने का खेल उन्हें बच्चों का खेल लगता है। क्योंकि अब इस महान लोकतंत्र में वोट, मान-सम्मान, सेवा कल्याण का शायद विषय नहीं रहा।
अगर अपुष्ट सूत्रों की माने तो चाय, पुडिया, पूडी का पैकेट, पऊआ, भण्डारे, रात्रि भोज, अन्नकूट अब सेवा कल्याण के माध्यम बन चुके है। जिसे आज सियासत भुनाने में कतई कोताही मेहसूस नहीं करती। गांव, गली से लेकर नगर, महानगर, राजधानी तक नेता बनने के खुले अघोषित विद्यालय, विश्वविद्यालय इस बात के सबूत है कि किस कदर परदे के पीछे सत्ता के लिये सियासी मीना बाजार सजते है। गली मौहल्लों में जनधन, प्राकृतिक संपदा की लूट की कोचिंग, प्राथमिक विद्यालय और सबसे बडे सेवाभावी होने की डिग्री लेने अब सियासी संस्थानों के अघोषित तौर पर इतने खर्चे और विकास शुल्क बढ चुके है कि विशुद्ध व्यवसाय के अलावा सेवा कल्याण तो कोसो दूर नजर नहीं आता। लाखों करोडो को छोड अब अरबों तक के खर्च और मोलनुमा सेवा कल्याण के केन्द्रों में तब्दील बडी-बडी इमारतें इस बात की गवाह है कि उनकी मार्केटिंग और प्रोडक्ट कितने उम्दा और कितने कारगार हो सकते है। सेवा कल्याण के क्षेत्र में अगर किसी भी समृद्ध विरासत को आगे ले जाने और लोगों के जीवन को समृद्ध खुशहाल बनाने का अपुष्ट अघोषित पैमाना अगर स्व-स्वार्थ प्राकृतिक जनधन संपदा की लूट है तो कम से कम अब तो जागरूक लोगों को ऐसी सियासत और सेवा कल्याण पर विचार अवश्य करना चाहिए। कहते है कि कोरोना महामारी के दौर से बडी शिक्षा की शायद ही कोई पाठशाला बनी हो जहां सभी विश्व की समूची मानवता विद्यार्थी बन कोरोना से पार पाने की परीक्षा उत्तीर्ण करने में जुटी है विचार अवश्य होना चाहिए।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है जब कोई मानवीय सभ्यता जीवन निर्वहन में तथा देखते जानते बूझते जब कोई भी इंसान क्षणिक स्वार्थवत मूर्ख बन दिमागी तौर पर दिवालिया हो जाये तो ऐसी सभ्यता और उसकी संस्कृति तथा संस्कारों का दम निकलना तय है। देखा जाये तो विगत 30 वर्षो के प्रमाणिक परिणाम सेवा कल्याण को लेकर लोगों की आंखों के सामने है और जिन आचार-विचार, व्यवहार तथा पहचान से वह आये दिन दो चार होता रहता है। अगर सही वक्त पर उसका भी संज्ञान न रहे तो उसे कैसा समाज कहा जाये। देखा जाये तो सूचना क्रान्ति के दौर में बडी लोगों की समझ और स्वयं के स्वार्थ तथा आलस्यपूर्ण निकम्मी बैवसी और फ्री में दया, भीख के उम्मीद के चलते जब वह निठल्ली हो जाये और उसे यह ज्ञान तक न रहे कि सच क्या है और गलत क्या तथा सच के सामने ही मुंह मोड वह शर्म मेहसूस न करें और इसी जीवन निर्वहन को जब वह अपना मान-सम्मान, स्वाभिमान मान खुशहाल, समृद्ध जीवन की कुंजी मान लें लगे तो इससे बडा दिमागी दिवालिया और सांस्कृारिक उजाड और कोई हो नहीं सकता। सियासत सत्ता को व्यवसाय समझ व्यापार बनाने वाली सियासत का सबसे बडा सत्य आज सेवा कल्याण के नाम यह है कि जिस पर जितना धन उतना बडा सक्षम सफल सियासी कद उसका होता है और जीत-हार सत्ता हासिल करने का खेल उन्हें बच्चों का खेल लगता है। क्योंकि अब इस महान लोकतंत्र में वोट, मान-सम्मान, सेवा कल्याण का शायद विषय नहीं रहा। अगर अपुष्ट सूत्रों की माने तो चाय, पुडिया, पूडी का पैकेट, पऊआ, भण्डारे, रात्रि भोज, अन्नकूट अब सेवा कल्याण के माध्यम बन चुके है। जिसे आज सियासत भुनाने में कतई कोताही मेहसूस नहीं करती। गांव, गली से लेकर नगर, महानगर, राजधानी तक नेता बनने के खुले अघोषित विद्यालय, विश्वविद्यालय इस बात के सबूत है कि किस कदर परदे के पीछे सत्ता के लिये सियासी मीना बाजार सजते है। गली मौहल्लों में जनधन, प्राकृतिक संपदा की लूट की कोचिंग, प्राथमिक विद्यालय और सबसे बडे सेवाभावी होने की डिग्री लेने अब सियासी संस्थानों के अघोषित तौर पर इतने खर्चे और विकास शुल्क बढ चुके है कि विशुद्ध व्यवसाय के अलावा सेवा कल्याण तो कोसो दूर नजर नहीं आता। लाखों करोडो को छोड अब अरबों तक के खर्च और मोलनुमा सेवा कल्याण के केन्द्रों में तब्दील बडी-बडी इमारतें इस बात की गवाह है कि उनकी मार्केटिंग और प्रोडक्ट कितने उम्दा और कितने कारगार हो सकते है। सेवा कल्याण के क्षेत्र में अगर किसी भी समृद्ध विरासत को आगे ले जाने और लोगों के जीवन को समृद्ध खुशहाल बनाने का अपुष्ट अघोषित पैमाना अगर स्व-स्वार्थ प्राकृतिक जनधन संपदा की लूट है तो कम से कम अब तो जागरूक लोगों को ऐसी सियासत और सेवा कल्याण पर विचार अवश्य करना चाहिए। कहते है कि कोरोना महामारी के दौर से बडी शिक्षा की शायद ही कोई पाठशाला बनी हो जहां सभी विश्व की समूची मानवता विद्यार्थी बन कोरोना से पार पाने की परीक्षा उत्तीर्ण करने में जुटी है विचार अवश्य होना चाहिए।
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