निःस्वार्थ नेतृत्व की अदभुत निष्ठा अगर निर्णय सार्थक है तो फिर सवाल स्वतः ही र्निरथक कहे जायेंगे गांव, गली, गरीब को खोला खजाना बैवस सियासत बडे निर्णय पुरूषार्थ की सिद्धता में साक्षी अदम्य साहस जबावदेहपूर्ण ज्वइंटवेंचर बन सकता है, आत्मनिर्भर समृद्ध अर्थव्यवस्था का अचूक अस्त्र शास्त्रार्थ, प्रदर्शन की प्रमाणिक न्यायपूर्ण व्यवस्था राजसत्ता का राजधर्म

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
जिस वृहत टीम के साथ आदर्श राजनीति एवं सर्वकल्याण के भाव के साथ मानव कल्याण को लक्ष्य मान आज की सियासत में जिस तरह से सैकडो वर्ष बाद राष्ट्र-जन कल्याण की शुरूआत व्यापक पैमाने पर नीतिगत तौर पर अब से 6़ वर्ष पूर्व यथार्थता हुई है। भले ही परिणामों का पैमाना जो भी हो। मगर अब कोरोनाकाल में ऐसे निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन की उस नेतृत्व की चर्चा न हो तो यह आदर्श राजनीति के साथ बडा अन्याय होगा। हम चर्चा करें, इससे पूर्व धन्यवाद, साधूवाद के पात्र है वह महापुरूष जिन्होंने राष्ट्र-जन कल्याण के स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित कर लोगों को जोड निःस्वार्थ भाव से संघर्षपूर्ण यात्रा शुरू कर कारवां को यहां तक पहुंचाया। धन्यवाद के पात्र है सत्ता के वह सहोदर जिन्होंने अपनी-अपनी समझ अनुसार राष्ट्र-जन कल्याण के लिये अदम्य साहस के साथ पुरूषार्थ कर अनगिनत कुर्बानियां दें, राष्ट्र को यहां तक पहुंचाया। मगर आज की सियासत में बिखरे पडे बर्बाद सियासी सार्वजनिक आदर्श सरोकारों को समेट सदमार्ग का रास्ता सर्वकल्याण का रास्ता जिस तरह से प्रस्त हो रहा है और राष्ट्र-जन की समृद्धि, खुशहाली की खातिर संघर्ष का कारवां कोरोनाकाल में शुरू हुआ है वह सराहनीय कहा जायेगा। मगर कोरोनाकाल में उपजे महासंकट का दुःख और दर्द इतना है कि आज उससे इंसानियत भी कांपने पर मजबूर है। मगर कहते है कि जब वो दिन नहीं रहे तो ये दिन भी नहीं रहेंगे। 
अगर इस महान राष्ट्र के समक्ष आज सबसे अहम यक्ष सवाल जन-जन की समृद्धि और सत्ता सियासत सिस्टम की शुद्धता के साथ सेवा कल्याण में सिद्धता को लेकर है जिसके संभावित परिणाम भले ही फिलहाल साक्षी न हो। मगर उनका अक्स स्पष्ट अवश्य नजर आता है। जिस तरह से एक निष्ठापूर्ण नेतृत्व पुरूषार्थ की पराकाष्ठा कर त्याग-तपस्या, सामर्थ, राष्ट्र-जन कल्याण की खातिर कर रहा है वह कोरोनाकाल में उठे सवालों का भले ही आज प्रमाणिक उत्तर न हो। मगर आने वाले भविष्य में वह सवाल न हो तो इसमें किसी को अतिसंयोक्ति नहीं होना चाहिए। अगर यो कहे कि सत्ताओं का जन राष्ट्र सर्वकल्याण से जुडा अक्स जिस तरह से सिद्धान्तः परिपूर्ण होता है अगर उसमें रंगों की कला के माध्यम से जान न डाली जाये तो वह अपने स्वरूप में जीवंत ही नहीं कहा जायेगा। विदेशी-देशी नीतिगत सरोकारों से लेकर संस्कृति, संस्कारों और सुरक्षा को लेकर जो लम्बी लकीर आज नजर आती है वह सत्य को समझने काफी है। क्योंकि उनके परिणाम आज सिर्फ दिख ही नहीं रहे, बल्कि मेहसूस भी हो रहे है। अगर हम यों कहे कि भीष्मपितामह के सवाल पर विदुर नीति में आदर्श नीति के विरूद्ध बदलाव नीतिगत है तो अगर आज की राजनीति में लोगों को कुछ बदलाव और परिणाम अनयंत्र नजर आते है तो यह नेतृत्व की न तो अक्षमता है, न ही असफलता। इसे सत्ता की बैवसी या संगठनात्मक, संस्कारों की दासी तो कहा जा सकता है। मगर पुरूषार्थ पर सवाल कतई नहीं, क्योंकि पुरूषार्थ अगर निष्ठापूर्ण है तो सिद्धता भी स्वभाविक होती है। 
जय स्वराज

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