नैतिक पतन का नंगा नाच राक्षसी मानसिकता की पराकाष्ठा आपसी आर्थिक लूट से कांपी बैवस मानवता

वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
जीवन में मन, कर्म, वचन की कृतज्ञता से प्राप्त परिणाम मानव की श्रेष्ठता, सफलता, असफलता का पैमाना होते है। जब भी इन तीनों में से एक भी आचरण पथभ्रष्ट हो, तो सृष्टि जनित नैसर्गिक स्वभाव, मानवता की पहचान को कलंकित करने के कारक सिद्ध हो, तो वह सृजन में अपनी पहचान ही नहीं, अपना अर्थ भी खो देता है। तब की स्थिति में ऐसे आचरण, व्यवहार चरित्र की तुलना पशुवत करना भी जीवन में निष्ठापूर्ण नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले उन महान पशु, जीव, जन्तुओं का अपमान है और महापाप।
कोरोनाकाल में जिस तरह से आम जरूरत की चीजों की खरीद में कोहराम मचा है जिसे हम कभी भ्रष्ट आचरण की संज्ञा देते नहीं थकते थे और पानी पी-पी कर सत्ता और सरकारों को कोसते से नहीं चूकते थे। मगर जब आज कोरोना से लडते घरों में बंद बैवस, मजबूर लोगों को जरूरत की चीजों की उपलब्धता के नाम पर ऊपर से लेकर नीचे तक मनमाने दामों पर यहां तक कि दो गुना दस गुना दामों पर माल बेचा जा रहा है वह मानव के राक्षसी गुण समझने काफी है। गली, मौहल्लों से लेकर बाजारों तक में पसरी व्यापार की इस नई संस्कृति ने नैतिक पतन के वह कीर्तिमान स्थापित कर रख छोडे है जिसे देख कोई भी मानवता सहर्ष कलफ जायेगी। जब खुद की बैवसी मजबूरी पर लोग शासन सरकारों को कोसते नहीं थकते और न्याय पाने नैतिकता की दुहाई के नये-नये कीर्तिमान स्थापित करते है। मगर जब कोरोनाकाल में स्वयं की बारी नैतिक आचरण को लेकर आई तो नैतिक पतन के ऐसे-ऐसे कीर्तिमान जहां गली, मौहल्ले से लेकर बाजार तक लोग सहर्ष आपस में जरूरत की चीजें बेचने के नाम पर मनमानी दर बसूल कर अर्थ लूटने से नहीं चूकते। सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि जो कभी रोजमर्रा के ग्राहक के थे आपसी पहचान वाले है उन्हें भी अधिक दर बसूली से नहीं बख्शा जा रहा। अगर यही हमारा सभ्य, कृतज्ञ, कत्र्तव्यनिष्ठ और महान संस्कृति का उत्तराधिकारी समाज है तो फिर तो ईश्वर ही मालिक है ऐसे समाज का जो स्वयं पीडित होने पर पशुओं की भांति चिल्लाता है और दूसरों का शिकार करने में कतई रहम नहीं खाता।

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