बडे नुकसान से बेखबर, बैवस मानवता, मोहताज जीवन के मुहाने पर

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
जिस मार्ग पर हम नैसर्गिक विधान को त्याग लगभग पौने दो सौ वर्ष की यात्रा को स्वार्थवत प्रायोजित शिक्षा और जीवन के आम विधानों के साथ समृद्ध, खुशहाल जीवन की प्रत्याशा में पूर्ण कर चुके है। परिणाम कि न तो हमारा जीवन समृद्ध हुआ, न ही वह खुशहाल हो सका और आज भी हम निर्जीव शिाक्षा, संस्कृति में समृद्ध, खुशहाल जीवन की खोज में जुटे है। अब तो हालात यहां तक आ पहुंचे है कि जितना गंभीर आज की चिकित्सा सेवाओं में मरीज नहीं उससे अधिक गंभीर बीमार तो हमारे नीम-हकीम नजर आते है। फिर क्षेत्र आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, संस्थागत हो या फिर हमारी सेवा सुविधाये हो। अगर यो कहे कि पारदर्शी रूप से समझ के पैमाने पर मरीज और हकीम एक दूसरे से जुदा है और मानवता छाती पीठ मातम मनाने में जुटी है तो कोई अति संयोक्ति न होगी। 
वहीं दूसरी ओर सत्ता, धन, संसाधनों से समृद्ध, सियासत, संस्थायें अपने अमृत्व का मुगालता पाल स्वयं को सेवा कल्याण के नाम स्वयं सिद्धि में जुटी है। अगर यो कहे कि बडे नुकसान से बेखबर बैवस मानवता का कारवां कोरोना के मकडजाल में फसता नजर आ रहा है तो इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। देखा जाये तो कोरोना तो प्राकृतिक या मानव भूल का एक बहाना है। अगर यो कहे कि नव निर्जीव विधान से उपजी संस्कृति को आत्मसात कर स्वकल्याण में डूबे स्वार्थवत अहंकारी, अज्ञानी, अंजान उस बैवस मानव को, सृष्टि, सृजन में प्रकृति से प्राप्त नैसर्गिक जबावदेही और उसके कत्र्तव्य निर्वहन को समझना होगा और नव-विधान से उत्पन्न चकाचैंध भरी स्वार्थवत संस्कृति जिसे वह विधा-विद्ववान, प्राण समझने लगा था उसे त्यागना होगा। 
मगर कहते है कि साक्ष हमेशा प्रमाण होता है और सही दिशा में किये गये उसके प्रयास उसकी कृतज्ञता का पुरूषार्थ होता है। मगर तथा कथित जीवन का आधार ग्लोबल संस्कृति में सृजन के बजाये स्वार्थ, महत्वकांक्षी स्वभाव और अहंकार है वह जीवन को कैसे संरक्षित, सुरक्षित और सृजन योग्य बना सकती है। कहते है कि प्रमाणिकता के आभाव में नैतिक पतन की नींव पर खडा कत्र्तव्य निर्वहन का भव्य भवन भी उतना ही कमजोर होता है जितनी कमजोर आज के मनुष्य की कद काठी उसकी इम्युनिटी और उसका शरीर है।
मगर स्वार्थवत प्रायोजित पैमाने जीवन निर्वहन में आज भी जस के तस खडे है। परिणाम कि हम सक्षम, समर्थ, संसाधनवान होने के बावजूद भी जीवन के एक जैसे कुचक्र के भाग साबित हो रहे है जिसका मार्ग विनाश की ओर जाता है। क्योंकि हम 70 वर्ष में न तो विनाशकारी उस शिक्षा पद्धति उसकी विषय वस्तु और न ही प्रतिस्पर्धा के मार्ग जीवंत सृजनात्मक बना सके और न ही अपनी विरासतपूर्ण शिक्षा पद्धति विषय वस्तु और उसके व्यवहार को आत्मसात कर सके। निर्जीव संवेदनहीन सिस्टम के आदि हो चुके हम स्वकल्याण स्वार्थ महत्वकांक्षाओं को ही समृद्ध, खुशहाल जीवन और अहंकार को पुरूषार्थ मानते रहे और वह क्रम दुर्भाग्य से आज भी जारी है। ऐसे में कल्पना की जा सकती है कि हम कोरोना के फलते-फूलते इस कुचक्र में फसते जा रहे है। अगर हम हमारी सत्ता, सरकारें, संस्थायें आज भी न जागी और मानव ने मानव धर्म और सत्ताओं ने अपना राजधर्म नहीं निभाया तो इतिहास गवाह है मानव की समृद्धि और दुर्गति का। 

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