व्यथित प्रधानमंत्री ने आफत के बीच खुद संभाला मोर्चा पीडित प्रभावित वंचितों का हाल जानने स्वयं किया कूच कलेक्टर को नहीं पता, स्टार्टप क्या है ?
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कोरोना कहर के बीच 130 करोड जीवन की रक्षा हेतु प्रधानमंत्री यूं तो अपने आवासीय आॅफिस बैठ कोरोना से जंग का नेतृत्व स्वयं कर मोर्चा संभाले थे। कभी देश को समझाईस, तो कभी समझाईस की थप्पी कोरोना से बचाव के सुझावों के बीच व्यवस्थाओं की बागडोर संभालते रहे। अब जब देश के दो राज्य पंश्चिम बंगाल, उडीसा में समुद्री तूफान का कहर बरपा है ऐसे में कोरोना महामारी के बीच स्वयं का आवास छोड प्रधानमंत्री ने प्रभावित राज्यों की ओर कूच कर दिया। प्राकृतिक आपदाओं मानवीय भूल से हुई तबाहियों का अखाडा बने देश को बचाने जिस तरह से प्रधानमंत्री ने विगत वर्षो से बगैर विचलित हुये देश को नेतृत्व दिया और कोरोनाकाल के बीच देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिये संकल्पित किया है वह प्रधानमंत्री के पुरूषार्थ की एक नजीर हो सकती है। मगर जिस देश का प्रधानमंत्री इतना संवेदनशील, दूर-दृष्टा पुरूषार्थी हो उस देश के 733 जिलों में से म.प्र. के एक जिले के कलेक्टर को यह भी पता न हो कि स्टार्टप क्या है यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा। आॅनलाईन के अलाउद्दीन चिराग से जीवन की समृद्धि, खुशहाली तलाशती प्रतिभा, पुरूषार्थ का दर्द यह है कि सरकारें योजनायें तो शुरू कर देती है। मगर उनका क्रिन्यावयन आॅनलाईन नाम के अलाउद्दीन चिराग से पूछना पडता है।
अपुष्ट सूत्रों की माने तो फिलवक्त स्टार्टप करने कंपनी का रजिस्ट्रेशन और लगभग 50 करोड की पूंजी की आवश्यकता होती है। अगर कोई छोटा-मोटा काम करना चाहता है तो बैंक गारंटी सबसे बडी बाधा होती है। जबकि सरकार के स्पष्ट निर्देश है कि गारंटर सरकार है आवेदक से गारंटी न मांगी जाये। मतलब साफ है कि जिस बेजान शिक्षा और प्रशिक्षण से निकले लोग संस्थानों में काबिज है उनसे संवेदनशीलता की उम्मीद रखना बैमानी है। अगर देश के प्रधानमंत्री इतने संवेदनशील हो सकते है तो फिर देश के 733 जिलों में बैठे कुछ कलेक्टर इतने संवेदनशील क्यों नहीं यही यक्ष सवाल आज आत्मनिर्भर भारत के मार्ग की सबसे बडी बाधा है।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कोरोना कहर के बीच 130 करोड जीवन की रक्षा हेतु प्रधानमंत्री यूं तो अपने आवासीय आॅफिस बैठ कोरोना से जंग का नेतृत्व स्वयं कर मोर्चा संभाले थे। कभी देश को समझाईस, तो कभी समझाईस की थप्पी कोरोना से बचाव के सुझावों के बीच व्यवस्थाओं की बागडोर संभालते रहे। अब जब देश के दो राज्य पंश्चिम बंगाल, उडीसा में समुद्री तूफान का कहर बरपा है ऐसे में कोरोना महामारी के बीच स्वयं का आवास छोड प्रधानमंत्री ने प्रभावित राज्यों की ओर कूच कर दिया। प्राकृतिक आपदाओं मानवीय भूल से हुई तबाहियों का अखाडा बने देश को बचाने जिस तरह से प्रधानमंत्री ने विगत वर्षो से बगैर विचलित हुये देश को नेतृत्व दिया और कोरोनाकाल के बीच देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिये संकल्पित किया है वह प्रधानमंत्री के पुरूषार्थ की एक नजीर हो सकती है। मगर जिस देश का प्रधानमंत्री इतना संवेदनशील, दूर-दृष्टा पुरूषार्थी हो उस देश के 733 जिलों में से म.प्र. के एक जिले के कलेक्टर को यह भी पता न हो कि स्टार्टप क्या है यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा। आॅनलाईन के अलाउद्दीन चिराग से जीवन की समृद्धि, खुशहाली तलाशती प्रतिभा, पुरूषार्थ का दर्द यह है कि सरकारें योजनायें तो शुरू कर देती है। मगर उनका क्रिन्यावयन आॅनलाईन नाम के अलाउद्दीन चिराग से पूछना पडता है। अपुष्ट सूत्रों की माने तो फिलवक्त स्टार्टप करने कंपनी का रजिस्ट्रेशन और लगभग 50 करोड की पूंजी की आवश्यकता होती है। अगर कोई छोटा-मोटा काम करना चाहता है तो बैंक गारंटी सबसे बडी बाधा होती है। जबकि सरकार के स्पष्ट निर्देश है कि गारंटर सरकार है आवेदक से गारंटी न मांगी जाये। मतलब साफ है कि जिस बेजान शिक्षा और प्रशिक्षण से निकले लोग संस्थानों में काबिज है उनसे संवेदनशीलता की उम्मीद रखना बैमानी है। अगर देश के प्रधानमंत्री इतने संवेदनशील हो सकते है तो फिर देश के 733 जिलों में बैठे कुछ कलेक्टर इतने संवेदनशील क्यों नहीं यही यक्ष सवाल आज आत्मनिर्भर भारत के मार्ग की सबसे बडी बाधा है।
जय स्वराज
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