सत्ताओं का स्वभाव दमनात्मक या कल्याणकारी यक्ष सवाल को लेकर उठे सवाल
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
आज जब कोरोनाकाल में लोग अपने संघर्षपूर्ण जीवन की व्यस्ताओं से इतर जब एकाग्रचित हो, ऐसे में विभिन्न विषयों समस्या समाधान एवं विभिन्न स्वभावों पर सवाल होना लाजमी है। यूं भी पुरानी कहावत है कि खाली दिमाग और शैतान का घर। ऐसे में अगर सत्ता स्वभाव को लेकर कुछ सवाल है तो उन पर विचार अवश्य होना चाहिए। कभी जब सत्तायें सेवाभावी कल्याणकारी और उन सत्ताओं पर आसीन लोग त्यागी, निःस्वार्थ कत्र्तव्य निर्वहन को अपना धर्म मानने वाले होते है और अपने कर्म को ही जीवन की सबसे बडी कृतज्ञता और कमाया धन समझते है तो उनके कत्र्तव्य निर्वहन को लोग सफल, सराहनीय समझते है तथा लोगों को सुखद जीवन और समृद्धि की अनुभूति तो होती ही है साथ ही ऐसी सत्ताओं को पाकर आमजन स्वयं को धन्य समझने लगता है। आज जब कभी रामराज की चर्चा होती है तो निश्चित ही लोग त्याग, सेवा कल्याण की उस पराकाष्ठा के दर्शन करते है और उस पुरूषार्थ को आज भी याद कर स्वयं पर गर्व मेहसूस करते है।
मगर विगत सैकडों वर्षो की सत्ताओं को देखें तो उनका स्वभाव लगभग संरक्षक बतौर व्यवस्थायें चलाने एक सोशक का ही कहा जा सकता है जो सत्तायें संतुलन के सिद्धान्त के साथ सेवाभावी, कल्याणकारी सत्ताओं की स्थापना करती है वह सराहा ही भी जाती है और उनकी मुख्य कंठ से प्रसंशा भी की जाती है। अगर हम विगत डेढ सौ वर्ष के दौरान रही सत्तायें और उनके स्वभाव की बात करें तो सिस्टम में उसके स्वरूप को देखते हुये कोई बडी अनुभूति होना खासकर जन और सेवा कल्याण को लेकर कोई स्पष्ट प्रतिबिम्ब नजर नहीं आता है। क्योंकि जो जनता जनार्दन अपने स्वच्छंद जीवन और सुरक्षा की खातिर सत्ताओं को विभिन्न रूपों में आत्मसात करती रही उनके अनुभव भी कोई ज्यादा सुखद नहीं कहे जा सकते या यों कहे कि परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है तो कुछ कालखण्डों को छोड दें, जब-जब परिवर्तन सेवा कल्याण के रूप में सामने रहे या सेवा कल्याण के नाम स्वयं स्वार्थ में डूबे रहे वह सब इतिहास का आज अंग है। मगर दुर्भाग्य कि जिस लोकतंत्र को जनता का सबसे बडा रक्षक, संरक्षक मान लोगों ने अपने जीवन की समृद्धि खुशहाली सुरक्षा की खातिर स्वीकार्य किया सिस्टम ने उसके इस सिद्धान्त को तार-तार कर लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि सेवा क्या है और कल्याण क्या ? क्योंकि आज तक कोई ऐसा सूत्र और सिस्टम प्रतिपादित नहीं हो सका जो शिक्षा को ज्ञान की संघिनी बना सृजन और समृद्धि के मार्ग को प्रस्त करता, न ही वह स्वयं को ऐसा संरक्षक सिद्ध कर सका जिसमें आम नागरिक स्वयं को सुरक्षा को लेकर स्वयं को सिद्ध पाते। इससे स्पष्ट है कि सत्ताओं का स्वभाव सेवा कल्याण के नाम सोशक होना स्वभाविक है। अगर हम यों कहे कि नंद की सभा में जब शास्त्रार्थ के दौरान यह सवाल हुआ कि राजकोष को सबसे बडा खतरा किससे होता है। इस पर उत्तर था कि राज सत्ता में बैठे या जुडे लोगों से आज लुटती प्राकृतिक संपदा और सेवा कल्याण के नाम मची जनधन की लूट इस बात का प्रमाण है कि सत्ताओं का स्वभाव कैसा है। आज यहीं सबसे बडी समझने वाली बात होनी चाहिए।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
आज जब कोरोनाकाल में लोग अपने संघर्षपूर्ण जीवन की व्यस्ताओं से इतर जब एकाग्रचित हो, ऐसे में विभिन्न विषयों समस्या समाधान एवं विभिन्न स्वभावों पर सवाल होना लाजमी है। यूं भी पुरानी कहावत है कि खाली दिमाग और शैतान का घर। ऐसे में अगर सत्ता स्वभाव को लेकर कुछ सवाल है तो उन पर विचार अवश्य होना चाहिए। कभी जब सत्तायें सेवाभावी कल्याणकारी और उन सत्ताओं पर आसीन लोग त्यागी, निःस्वार्थ कत्र्तव्य निर्वहन को अपना धर्म मानने वाले होते है और अपने कर्म को ही जीवन की सबसे बडी कृतज्ञता और कमाया धन समझते है तो उनके कत्र्तव्य निर्वहन को लोग सफल, सराहनीय समझते है तथा लोगों को सुखद जीवन और समृद्धि की अनुभूति तो होती ही है साथ ही ऐसी सत्ताओं को पाकर आमजन स्वयं को धन्य समझने लगता है। आज जब कभी रामराज की चर्चा होती है तो निश्चित ही लोग त्याग, सेवा कल्याण की उस पराकाष्ठा के दर्शन करते है और उस पुरूषार्थ को आज भी याद कर स्वयं पर गर्व मेहसूस करते है।
मगर विगत सैकडों वर्षो की सत्ताओं को देखें तो उनका स्वभाव लगभग संरक्षक बतौर व्यवस्थायें चलाने एक सोशक का ही कहा जा सकता है जो सत्तायें संतुलन के सिद्धान्त के साथ सेवाभावी, कल्याणकारी सत्ताओं की स्थापना करती है वह सराहा ही भी जाती है और उनकी मुख्य कंठ से प्रसंशा भी की जाती है। अगर हम विगत डेढ सौ वर्ष के दौरान रही सत्तायें और उनके स्वभाव की बात करें तो सिस्टम में उसके स्वरूप को देखते हुये कोई बडी अनुभूति होना खासकर जन और सेवा कल्याण को लेकर कोई स्पष्ट प्रतिबिम्ब नजर नहीं आता है। क्योंकि जो जनता जनार्दन अपने स्वच्छंद जीवन और सुरक्षा की खातिर सत्ताओं को विभिन्न रूपों में आत्मसात करती रही उनके अनुभव भी कोई ज्यादा सुखद नहीं कहे जा सकते या यों कहे कि परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है तो कुछ कालखण्डों को छोड दें, जब-जब परिवर्तन सेवा कल्याण के रूप में सामने रहे या सेवा कल्याण के नाम स्वयं स्वार्थ में डूबे रहे वह सब इतिहास का आज अंग है। मगर दुर्भाग्य कि जिस लोकतंत्र को जनता का सबसे बडा रक्षक, संरक्षक मान लोगों ने अपने जीवन की समृद्धि खुशहाली सुरक्षा की खातिर स्वीकार्य किया सिस्टम ने उसके इस सिद्धान्त को तार-तार कर लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि सेवा क्या है और कल्याण क्या ? क्योंकि आज तक कोई ऐसा सूत्र और सिस्टम प्रतिपादित नहीं हो सका जो शिक्षा को ज्ञान की संघिनी बना सृजन और समृद्धि के मार्ग को प्रस्त करता, न ही वह स्वयं को ऐसा संरक्षक सिद्ध कर सका जिसमें आम नागरिक स्वयं को सुरक्षा को लेकर स्वयं को सिद्ध पाते। इससे स्पष्ट है कि सत्ताओं का स्वभाव सेवा कल्याण के नाम सोशक होना स्वभाविक है। अगर हम यों कहे कि नंद की सभा में जब शास्त्रार्थ के दौरान यह सवाल हुआ कि राजकोष को सबसे बडा खतरा किससे होता है। इस पर उत्तर था कि राज सत्ता में बैठे या जुडे लोगों से आज लुटती प्राकृतिक संपदा और सेवा कल्याण के नाम मची जनधन की लूट इस बात का प्रमाण है कि सत्ताओं का स्वभाव कैसा है। आज यहीं सबसे बडी समझने वाली बात होनी चाहिए।
जय स्वराज

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