रोजगार कल्याण के क्षेत्र में सिद्धान्तः म.प्र. सरकार की धमाकेदार शुरूआत
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
म.प्र. में कोरोना की व्यापक दस्तक क्यों हुई कौन दोषी है और क्यों दिन व दिन म.प्र. में कोरोना संक्रमितों के आंकडे बढ रहे है। ये अलग बात है मगर इस सत्य से भी मुंह नहीं मोडा जा सकता कि कोरोना जैसे महामारी के बीच ही न तो हमारी व्यवस्था और न ही हम स्वयं सुधरने तैयार है। मगर इस बीच म.प्र. सरकार ने स्वसहायता समूह और मनरेगा के तहत स्थानीय स्तर पर रोजगार तथा सुलभ रोजगार के लिये श्रम कानूनों में जो सुधार किया है वह स्वागत योग्य ही कहा जायेगा। मगर कई मोर्चो पर पसरी अलाली और महामारी के बीच भी राजनीति चमकाने की जो संस्कृति चल पडी है वह शर्मनाक ही कही जायेगी। जिस तरह से जिन नेताओं के आभाव का दंश कोरोना महासंकट के दौर में लोग झेल रहे है और निर्जीव सेवा सिस्टम को देख रहे है उससे लोग बडे हताश और निराश है। अहम अहंकारी स्वभाव और सेवा के बीच संकटों से जूझते लोग भले ही सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस और लाॅकडाउन का पालन कर रहे हो। मगर फिलहाल इसके अलावा कोई समाधान भी नहीं। उम्मीद की जाने चाहिए कि जो सिस्टम कई पीढियों से जिस संस्कृति, व्यवहार में है उसका अचानक पलट पाना न मुमकिन भी नहीं मुश्किल है इसलिये सुधार की उम्मीद हर सेवक और जन को अवश्य रखनी चाहिए।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
म.प्र. में कोरोना की व्यापक दस्तक क्यों हुई कौन दोषी है और क्यों दिन व दिन म.प्र. में कोरोना संक्रमितों के आंकडे बढ रहे है। ये अलग बात है मगर इस सत्य से भी मुंह नहीं मोडा जा सकता कि कोरोना जैसे महामारी के बीच ही न तो हमारी व्यवस्था और न ही हम स्वयं सुधरने तैयार है। मगर इस बीच म.प्र. सरकार ने स्वसहायता समूह और मनरेगा के तहत स्थानीय स्तर पर रोजगार तथा सुलभ रोजगार के लिये श्रम कानूनों में जो सुधार किया है वह स्वागत योग्य ही कहा जायेगा। मगर कई मोर्चो पर पसरी अलाली और महामारी के बीच भी राजनीति चमकाने की जो संस्कृति चल पडी है वह शर्मनाक ही कही जायेगी। जिस तरह से जिन नेताओं के आभाव का दंश कोरोना महासंकट के दौर में लोग झेल रहे है और निर्जीव सेवा सिस्टम को देख रहे है उससे लोग बडे हताश और निराश है। अहम अहंकारी स्वभाव और सेवा के बीच संकटों से जूझते लोग भले ही सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस और लाॅकडाउन का पालन कर रहे हो। मगर फिलहाल इसके अलावा कोई समाधान भी नहीं। उम्मीद की जाने चाहिए कि जो सिस्टम कई पीढियों से जिस संस्कृति, व्यवहार में है उसका अचानक पलट पाना न मुमकिन भी नहीं मुश्किल है इसलिये सुधार की उम्मीद हर सेवक और जन को अवश्य रखनी चाहिए।
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