लोगों का समृद्ध, खुशहाल जीवन, देखने सुनने से नहीं करने से बनेगा समृद्ध सियासत की दरकार
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कोरोनाकाल के बीच सेवा कल्याण की परवाह किये बगैर जिस तरह से सियासत म.प्र. में सातवे आसमान पर है उसको देखते हुये गांव, गली के आम गरीब का सावधान होना बहुत आवश्यक है। अगर अभी भी छोटे-छोटे स्वार्थो की पूर्ति व बडे-बडे सियासी दल नेताओं को भगवान मान अपने और अपनी आने वाली पीढी के सुखद समृद्ध जीवन की उम्मीद में है तो इससे बडा झूठ और कोई हो नहीं सकता। लोकतंत्र में वोट की ताकत अहम है और जिस भी व्यक्ति को सर्वाधिक वोट प्राप्त होते है वह विधायक कहलाता है जो सदन और सरकार से संघर्ष कर अपने क्षेत्र के लोगों का जीवन सुखद समृद्ध बना सकता है। बस इतनी सी बात अगर हर मतदाता ने अपने छोटे-छोटे स्वार्थ छोड समझ ली, तो विगत 70 वर्षो से झेलते आ रहे पीडा के दंश को हो सकता है आगे न झेलना पडें। इसलिये जरूरी है कि गांव-गांव, गली-गली लोग इकट्ठे हो निःस्वार्थ भाव से अपने-अपने सक्षम और संघर्षशील व्यक्ति को सामने रख चुनाव की तैयारियां रखे, नहीं तो जिस तरह से विगत 30 वर्ष से वोट लेने-देने का दौर सियासी दल व कभी न दिखने वाले चेहरों के रूप में बदली हैसियत में सामने आते है और हारने या जीतने के बाद सेवा कल्याण जिनके लिये बोझ बन जाते है ऐसे लोगों से सावधानी बहुत जरूरी है। क्योंकि जिस तरह की र्दुदशा इस कोरोनाकाल में गांव, गली, गरीब और किसान ने झेली है और झेल रहे है वह किसी से छिपी नहीं। इसलिये बगैर किसी के बहकावे में या लालच में आये निष्ठापूर्ण तरीके से अगर समझदार लोगों ने अपना-अपना योगदान किया तो सियासत और राजनीति से गन्दगी और सत्ता से जनधन प्राकृतिक संपदा की लूट करने वालो की विदाई होना तय है।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कोरोनाकाल के बीच सेवा कल्याण की परवाह किये बगैर जिस तरह से सियासत म.प्र. में सातवे आसमान पर है उसको देखते हुये गांव, गली के आम गरीब का सावधान होना बहुत आवश्यक है। अगर अभी भी छोटे-छोटे स्वार्थो की पूर्ति व बडे-बडे सियासी दल नेताओं को भगवान मान अपने और अपनी आने वाली पीढी के सुखद समृद्ध जीवन की उम्मीद में है तो इससे बडा झूठ और कोई हो नहीं सकता। लोकतंत्र में वोट की ताकत अहम है और जिस भी व्यक्ति को सर्वाधिक वोट प्राप्त होते है वह विधायक कहलाता है जो सदन और सरकार से संघर्ष कर अपने क्षेत्र के लोगों का जीवन सुखद समृद्ध बना सकता है। बस इतनी सी बात अगर हर मतदाता ने अपने छोटे-छोटे स्वार्थ छोड समझ ली, तो विगत 70 वर्षो से झेलते आ रहे पीडा के दंश को हो सकता है आगे न झेलना पडें। इसलिये जरूरी है कि गांव-गांव, गली-गली लोग इकट्ठे हो निःस्वार्थ भाव से अपने-अपने सक्षम और संघर्षशील व्यक्ति को सामने रख चुनाव की तैयारियां रखे, नहीं तो जिस तरह से विगत 30 वर्ष से वोट लेने-देने का दौर सियासी दल व कभी न दिखने वाले चेहरों के रूप में बदली हैसियत में सामने आते है और हारने या जीतने के बाद सेवा कल्याण जिनके लिये बोझ बन जाते है ऐसे लोगों से सावधानी बहुत जरूरी है। क्योंकि जिस तरह की र्दुदशा इस कोरोनाकाल में गांव, गली, गरीब और किसान ने झेली है और झेल रहे है वह किसी से छिपी नहीं। इसलिये बगैर किसी के बहकावे में या लालच में आये निष्ठापूर्ण तरीके से अगर समझदार लोगों ने अपना-अपना योगदान किया तो सियासत और राजनीति से गन्दगी और सत्ता से जनधन प्राकृतिक संपदा की लूट करने वालो की विदाई होना तय है।

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