मर कर भी अमर है, जिनकी जन के प्रति कृतज्ञता जनसेवा में धैर्य, साहस, दया की प्रतिमूर्ति थी राजमाता विजयाराजे सिंधिया

वीरेन्द्र शर्मा 
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कोरोना महासंकट के बीच जिस तरह से स्व. राजमाता विजयाराजे सिंधिया फांउडेंशन ट्रस्ट ने पीडित, वंचित, जरूरतमंदों के बीच मदद की, जो मिशाल प्रस्तुत की है वह राजमाता के जीवन में स्थापित उस संस्कृति का परिणाम है जो संस्कार के रूप में आज भी 20 वर्ष बाद लोगों के बीच जिन्दा है। जिस तरह से दो कदम आगे बढ फाउंडेशन के लोगों ने कोरोना महामारी के बीच मदद का बीडा उठाया क्या सरकारी, क्या गैर सरकारी, क्या पीडित, वंचित एवं पलायन करते मजदूरों की मदद कर वह निश्चित ही राजमाता की जनसेवा में कृतज्ञता को स्थापित करता है। जिस राजमाता ने स्वयं के जिन्दा रहते किसी आन्दोलन में दो छात्रों की पुलिस की गोली से मौत होने पर महल त्याग अपना विरोध दर्ज कराया और इमरजेंसी के दौरान जेल की सलाखों के बीच आमजन की खातिर महीनों का समय बिताया जो राजमाता डकैत समस्या के चलते पुलिस को यह उदाहरण देने से कभी पीछे नहीं रही कि जब महाराज थे तो डकैतों का सामना करने महाराज स्वयं जंगलों में जाकर कैम्प किया करते थे। आज उनके नाम से स्थापित फाउंडेशन ने जिस तरह से जनसेवा में अपनी सार्थकता सिद्ध की है वह अन्य लोगों के लिये भी अनुशरणीय होना चाहिए।   

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