कत्र्तव्य आधारित दण्ड व्यवस्था अहम: मुख्य संयोजक स्वराजव्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कोरोना के कहर के बीच जिस तरह से मानव सभ्यता कांप रही है। ऐसे में व्यवस्थाओं को लेकर उठते सवाल इस बात की ओर इंग्गित करते है कि मौजूद व्यवस्थाओं में दण्ड प्रक्रिया कत्र्तव्य आधारित हों। क्योंकि जिस तरह से आम नागरिक से उसके जाने-अनजाने में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन और कानून पालन की जबावदेही की अपेक्षा सत्ता गत व्यवस्थाओं, संस्थाओं को होती है। ठीक उसी प्रकार सत्ता और व्यवस्था में भी कत्र्तव्य आधारित दण्ड व्यवस्था सुनिश्चित होनी चाहिए।
देखा जाये तो व्यवहार में होता ये है कि व्यवस्थागत जिन लोगों का कत्र्तव्य होता है वह अधिकार बस अपने कत्र्तव्य भूल दूसरों को दण्ड देने में अधिक काबलियत समझते है। जबकि उनके निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन का खांका कोरा और कानूनन संरक्षित बना रहता है। अगर एक आम नागरिक से कत्र्तव्य निर्वहन की अपेक्षा सत्ता को अधिकार बस होती है तो फिर सत्ता, संस्थाओं में बैठे लोगों के कत्र्तव्य भी सुनिश्चित होना चाहिए। जिस तरह से चाहे बिजली, व्यापार, जीवोत्पार्जन, स्वच्छता से जुडे मामलों में या व्यवस्थागत सत्ताओं द्वारा निर्धारित नियम कानूनों के पालन की जबावदेही आम नागरिक की सुनिश्चित हो जाती है और अधिकारों के नाम कत्र्तव्य निष्ठा की किताब बंद मान ली जाती है। ऐसी व्यवस्था किसी भी व्यवस्था समाज, संस्थाओं को सुशोभित कर संस्कारिक नहीं कही जा सकती। इसलिये दण्ड का विधान अधिकारों से इतर कत्र्तव्य आधारित होना चाहिए। जिससे जबावदेह व्यवस्था में उत्तरदायित्व सुनिश्चित हो और सर्वकल्याण रूवरूप उत्तम व्यवस्था को स्थापित किया जा सके।
जय स्वराज
कोरोना के कहर के बीच जिस तरह से मानव सभ्यता कांप रही है। ऐसे में व्यवस्थाओं को लेकर उठते सवाल इस बात की ओर इंग्गित करते है कि मौजूद व्यवस्थाओं में दण्ड प्रक्रिया कत्र्तव्य आधारित हों। क्योंकि जिस तरह से आम नागरिक से उसके जाने-अनजाने में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन और कानून पालन की जबावदेही की अपेक्षा सत्ता गत व्यवस्थाओं, संस्थाओं को होती है। ठीक उसी प्रकार सत्ता और व्यवस्था में भी कत्र्तव्य आधारित दण्ड व्यवस्था सुनिश्चित होनी चाहिए। देखा जाये तो व्यवहार में होता ये है कि व्यवस्थागत जिन लोगों का कत्र्तव्य होता है वह अधिकार बस अपने कत्र्तव्य भूल दूसरों को दण्ड देने में अधिक काबलियत समझते है। जबकि उनके निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन का खांका कोरा और कानूनन संरक्षित बना रहता है। अगर एक आम नागरिक से कत्र्तव्य निर्वहन की अपेक्षा सत्ता को अधिकार बस होती है तो फिर सत्ता, संस्थाओं में बैठे लोगों के कत्र्तव्य भी सुनिश्चित होना चाहिए। जिस तरह से चाहे बिजली, व्यापार, जीवोत्पार्जन, स्वच्छता से जुडे मामलों में या व्यवस्थागत सत्ताओं द्वारा निर्धारित नियम कानूनों के पालन की जबावदेही आम नागरिक की सुनिश्चित हो जाती है और अधिकारों के नाम कत्र्तव्य निष्ठा की किताब बंद मान ली जाती है। ऐसी व्यवस्था किसी भी व्यवस्था समाज, संस्थाओं को सुशोभित कर संस्कारिक नहीं कही जा सकती। इसलिये दण्ड का विधान अधिकारों से इतर कत्र्तव्य आधारित होना चाहिए। जिससे जबावदेह व्यवस्था में उत्तरदायित्व सुनिश्चित हो और सर्वकल्याण रूवरूप उत्तम व्यवस्था को स्थापित किया जा सके।
जय स्वराज
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