स्वार्थी, अहम अहंकारी, महत्वकांक्षी सत्ताओं ने अनादिकाल से ही सृष्टि के अनमोल अंश मानव सभ्यता का बडा नुकसान किया है देव स्वरूप अमृत हासिल होने का मुगालता पालने वालों को समझना होगा कि यह सतयुग नहीं कलयुग है नैसर्गिक निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन की अचूक अस्त्र

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है कि जब जबावदेह लोग कत्र्तव्य विमुख और सत्तायें स्वार्थी, अहम-अहंकारी, महत्वकांक्षी हो जाये तो विनाश सुनिश्चित होता है। बैसे भी अनादिकाल से स्वार्थी अहम-अहंकारी सत्ताओं ने सृष्टि की अनमोल धरोहर मानव सभ्यता का बडा नुकसान किया है। जिसका दंश कई पीढियां भोग आज तक अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के माघ्यम से स्वयं को सक्षम, समृद्ध बनाती रही है। जिनकी आज हम पहचान है। रावण से लेकर कंस तक और कंस से लेकर दुर्योधन तक एक लम्बी चैडी फैरित हमारे सामने है तथा मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक की चर्चाऐं हमारे साक्षी है। इस बीच सिर्फ उन्हीं सत्ताओं को सराहा गया जिन्होंने सृष्टि, सृजन में सर्वकल्याण के भाव के साथ अपने नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप सृष्टि, सृजन में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन किया। आज भी जब हम जिस मार्गदर्शी इतिहास का उल्लेख कर रहे है निश्चित ही वर्तमान हालातों के मद्देनजर इनका पूर्व की भांति कोई अर्थ नहीं। मगर एक उम्मीद अवश्य है कि सृजन में विश्वास रखने वाली सत्ता शासकों से। मगर वर्तमान हालातों के मद्देजनर कारण साफ है और जरा भी इंसानियत के प्रति लोगों में आस्था है तो निश्चित ही 130 करोड के इस महान राष्ट्र में निष्ठावान सत्य का संज्ञान लेने वाले सक्रिय लोगों की संख्या अगर बढ जाये, खासकर वो लोग जो सत्ता संस्था में जबावदेह होते है। जिनका राजधर्म, सेवा, कल्याण और लोगों की सुरक्षा होता है वह राष्ट्र-जन कल्याण में संज्ञान पूरी सतर्कता से रखें। 
मगर कहते है कि ओहदे पहचान व सत्ता के सार्गिद न होना आज के समय में विधा, विद्ववानों की सबसे बडी कमी है। जिसके चलते सच से समाधान कभी-कभी दूर की कोणी साबित होता है और जिसका उपयोग सर्वकल्याण से दूर रह जाता है। कहते है किसी भी व्यवस्था में अमृत का मुगालता पालना हर सत्ता से सरोकार रखने वाले तथाकथित लोगों का अधिकार रहा है। सो देव स्वरूप सत्ता और उन सलाहकारों का क्या जो कोरोना के कहर के बीच भी मोल-तोल में उलझे रहते है। ऐसे में असली धर्म और कर्म आमजन का होता है और स्वभाव अनुरूप जीवन में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन उसका अधिकार। कहते है निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन जीवन में अनादिकाल से मानव सभ्यता का अचूक अस्त्र और उसके जिन्दा रहने का आधार रहा है। इसलिये अब जबकि कोरोना जैसा महासंकट आमने-सामने है और जंग आरपार की हो, तो ऐसे में हम स्वयं अपने-अपनों का जीवन सुरक्षित करने में अवश्य योगदान दे सकते है। जिसका मात्र एक ही सूत्र शेष है और वह सूत्र है सील, सप्लाई और सोशल डिस्टेंस के साथ स्वच्छता।
जय स्वराज

Comments

Popular posts from this blog

खण्ड खण्ड असतित्व का अखण्ड आधार

संविधान से विमुख सत्तायें, स्वराज में बड़ी बाधा सत्ताओं का सर्वोच्च समर्पण व आस्था अहम: व्ही.एस.भुल्ले

श्राफ भोगता समृद्ध भूभाग गौ-पालन सिर्फ आध्यात्म नहीं बल्कि मानव जीवन से जुडा सिद्धान्तः व्यवहारिक विज्ञान है अमृतदायिनी के निस्वार्थ, निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन, त्याग तपस्या का तिरस्कार, अपमान पडा भारी जघन्य अन्याय, अत्याचार का दंश भोगती भ्रमित मानव सभ्यता