सत्ताओं में सार्थक समाधानों का आभाव सेवा, समृद्धि में बडी बाधा, सांख्यिकीय ज्ञान के आभाव में दिशाहीन विकास और समाधान स्वार्थ की नींव पर सत्ताओं के महल शर्मनाक बगैर स्वराज के असंभव है आत्मनिर्भरता सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस ही हो सकता है प्रमाणिक समाधान
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता का मूल आधार सियासी दलों की जन सामान में मान्यता और प्राप्त वोट का आधार होता है जहां जनसमस्याओं की बिना पर जनप्रतिनिधि या दल विश्वास और वोट से सत्ता हासिल कर उनके समाधान उसे ढूढने का अपना कत्र्तव्य निभाते है। मगर जब दल सत्ता के पिचलग्गू और सत्तायें स्वयंभू हो जाती है ऐसे में समझ और समाधान का संकट सांख्यिकी के आभाव में बढ जाता है। दुर्भाग्य कि सौभाग्य से कठिन संघर्ष कुर्बानी पश्चात हमें आजादी तो मिली। मगर हम 70 वर्ष बाद भी अपनी शिक्षा और लोकशाही के सिस्टम को उचित प्रशिक्षण नहीं दे पाये।
परिणाम कि आज हमारा तंत्र लोक, जन की भावना से जुदा तो सत्तायें सार्थक समाधान ढूंढने में अक्षम साबित हो रही है। सत्ताओं की बैवसी यह है कि वह स्थापित सिस्टम के बाहर नहीं जा सकती और सिस्टम की बैवसी यह है कि वह अपने विधि सम्वत स्थापित सिद्धान्त और प्रशिक्षण से प्राप्त हुनर केे बाहर नहीं आ सकती। इस दुष्चक्र के भंवर में फंसी आशा-आकांक्षाओं का भविष्य क्या होगा फिलहाल इन संभावनाओं के बीच स्पष्ट है। मगर इतना तय है कि जब तक सियासी दल मौजूद सत्तायें अपने अदम्य साहस का परिचय दें बडे बदलाव की दिशा में नहीं बढती तब तक आमजन की आशा-आकांक्षा और उनकी अनुभूति तथा सत्ता और सिस्टम के बीच असंवाद ही नहीं असमन्वय का भाव बना रहेगा जो कोरोना जैसे महासंकट के बीच या इससे पूर्व भी रहे संकटों के समाधान में वह बाधा बना रहेगा। इसलिये स्वराज ही वह मार्ग है जिसका सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस का सूत्र ऐसे में अचूक अस्त्र समाधान की दिशा में साबित हो सकता है।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता का मूल आधार सियासी दलों की जन सामान में मान्यता और प्राप्त वोट का आधार होता है जहां जनसमस्याओं की बिना पर जनप्रतिनिधि या दल विश्वास और वोट से सत्ता हासिल कर उनके समाधान उसे ढूढने का अपना कत्र्तव्य निभाते है। मगर जब दल सत्ता के पिचलग्गू और सत्तायें स्वयंभू हो जाती है ऐसे में समझ और समाधान का संकट सांख्यिकी के आभाव में बढ जाता है। दुर्भाग्य कि सौभाग्य से कठिन संघर्ष कुर्बानी पश्चात हमें आजादी तो मिली। मगर हम 70 वर्ष बाद भी अपनी शिक्षा और लोकशाही के सिस्टम को उचित प्रशिक्षण नहीं दे पाये। परिणाम कि आज हमारा तंत्र लोक, जन की भावना से जुदा तो सत्तायें सार्थक समाधान ढूंढने में अक्षम साबित हो रही है। सत्ताओं की बैवसी यह है कि वह स्थापित सिस्टम के बाहर नहीं जा सकती और सिस्टम की बैवसी यह है कि वह अपने विधि सम्वत स्थापित सिद्धान्त और प्रशिक्षण से प्राप्त हुनर केे बाहर नहीं आ सकती। इस दुष्चक्र के भंवर में फंसी आशा-आकांक्षाओं का भविष्य क्या होगा फिलहाल इन संभावनाओं के बीच स्पष्ट है। मगर इतना तय है कि जब तक सियासी दल मौजूद सत्तायें अपने अदम्य साहस का परिचय दें बडे बदलाव की दिशा में नहीं बढती तब तक आमजन की आशा-आकांक्षा और उनकी अनुभूति तथा सत्ता और सिस्टम के बीच असंवाद ही नहीं असमन्वय का भाव बना रहेगा जो कोरोना जैसे महासंकट के बीच या इससे पूर्व भी रहे संकटों के समाधान में वह बाधा बना रहेगा। इसलिये स्वराज ही वह मार्ग है जिसका सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस का सूत्र ऐसे में अचूक अस्त्र समाधान की दिशा में साबित हो सकता है।
जय स्वराज
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