ग्लोबल संस्कृति में जनसेवा की मिशाल आॅफिस और घरों में बैठ, बैठकों के माध्यम से फर्राटे भरती राहत और सेवा
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
आज के दौर में ग्लोबल संस्कृति से प्रतिपादित तकनीक सत्ताओं के लिये कभी इतनी कारगार होगी कि जिसकी कृतज्ञता का भान किसी को सपने में भी न रहा होगा। जिस तरह से आॅफिस घरों में तकनीक के माध्यम से वीडियों काॅन्फ्रिस से और एक क्लीक के माध्यम से राहत पीडित, वंचित, बैवस, मजबूरों तक पहुंच रही है वह काबिले तारीफ। सुना तो ये था कि कबीलाई प्रथा में कबीले का सरदार और राजशी प्रथा में राजा स्वयं मैदाने-ए जंग में अपने सैनिक साथियों के साथ संकट का सामना मिल-जुलकर किया करते थे। यहां तक कि अताताई, आक्रांता, लुटेरे भी मुखिया होने के नाते, सरगना होने के नाते अपना पुरूषार्थ सामूहिक रूप से मैदाने-ए जंग में किया करते थे। मगर धन्य है संस्कृति जिसने कम से कम हमारे मुखियाओं को इतना सक्षम बना उन्हें समर्थ बना दिया कि अब कोरोना जैसे महासंकट के आमने-सामने का युद्ध सैनिकों के बजाये जनता सीधे लड रही हो और कंधे से कंधा मिलाकर हमारी पुलिस स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान जोखिम में डाल दिन रात लगे हो। मगर हमारे शासकों की दिनरात की कृतज्ञता भी कुछ कम नहीं जो तकनीक के सहारे बैठकें, वीडियों काॅन्फ्रेस और एक क्लीक के माध्यम से सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुये निष्ठापूर्ण ढंग से करने में जुटे है। निश्चित ही इसके परिणाम फिलहाल कितने सार्थक सिद्ध हो रहे है यह आंकडो के भविष्य में दर्ज होंगे। मगर इस कृतज्ञता को कृतार्थ देख स्वयं पर गर्व अवश्य करना चाहिए।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
आज के दौर में ग्लोबल संस्कृति से प्रतिपादित तकनीक सत्ताओं के लिये कभी इतनी कारगार होगी कि जिसकी कृतज्ञता का भान किसी को सपने में भी न रहा होगा। जिस तरह से आॅफिस घरों में तकनीक के माध्यम से वीडियों काॅन्फ्रिस से और एक क्लीक के माध्यम से राहत पीडित, वंचित, बैवस, मजबूरों तक पहुंच रही है वह काबिले तारीफ। सुना तो ये था कि कबीलाई प्रथा में कबीले का सरदार और राजशी प्रथा में राजा स्वयं मैदाने-ए जंग में अपने सैनिक साथियों के साथ संकट का सामना मिल-जुलकर किया करते थे। यहां तक कि अताताई, आक्रांता, लुटेरे भी मुखिया होने के नाते, सरगना होने के नाते अपना पुरूषार्थ सामूहिक रूप से मैदाने-ए जंग में किया करते थे। मगर धन्य है संस्कृति जिसने कम से कम हमारे मुखियाओं को इतना सक्षम बना उन्हें समर्थ बना दिया कि अब कोरोना जैसे महासंकट के आमने-सामने का युद्ध सैनिकों के बजाये जनता सीधे लड रही हो और कंधे से कंधा मिलाकर हमारी पुलिस स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान जोखिम में डाल दिन रात लगे हो। मगर हमारे शासकों की दिनरात की कृतज्ञता भी कुछ कम नहीं जो तकनीक के सहारे बैठकें, वीडियों काॅन्फ्रेस और एक क्लीक के माध्यम से सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुये निष्ठापूर्ण ढंग से करने में जुटे है। निश्चित ही इसके परिणाम फिलहाल कितने सार्थक सिद्ध हो रहे है यह आंकडो के भविष्य में दर्ज होंगे। मगर इस कृतज्ञता को कृतार्थ देख स्वयं पर गर्व अवश्य करना चाहिए।
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