पुरूषार्थ से सबक लेने का वक्त समझना होगा त्याग-तपस्या और कडे परिश्रम की इस मिशाल को

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
यह इस महान भूभाग का सौभाग्य ही कहा जायेगा कि आज भी इस कलयुग में हमारे बीच सृष्टि आधारित नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप त्याग-तपस्वी और सृजन में विश्वास रखने वाले लोग मौजूद है। उनसे सीख लें, सत्ता सियासत से जुडे लोगों को अवश्य सीख लेना चाहिए कि जिस तरह से सर्वोच्च पद को सत्ताओं ने सुशोभित करने वाले लोग पूर्ण प्रमाणिक पुरूषार्थ के साथ अपने कत्र्तव्य निर्वहन में लगे है। आज की सियासत को समझने वाली बात होना चाहिए। सत्ता सौपानों तक पहुंचे या बाहर बैठे लोगों को समझना होगा कि कोई भी व्यक्ति मानव जीवन में कभी सम्पूर्ण र्निविकार नहीं हो सकता। सिर्फ उस आदृश्य शक्ति के जिसे सृष्टि, सृजन का आधार माना जाता है। 
अगर हम रामायाणकाल के दौर में जायें तो माता सीता का वन गमन और प्रभु राम का त्याग उस निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन की मिशाल थी जिसने यह साबित किया कि वह जिस भी क्षेत्र या अवस्था में जिस पद के निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन में है उसमें किंचित मात्र एक भी सवाल नहीं होना चाहिए फिर कीमत कत्र्तव्य निर्वहन के मार्ग में जो भी हो। यहीं उम्मीद आज जब मानव समूह के बीच सत्तायें है और शासक भी है और उनका स्वरूप भी अलग-अलग हो सकता है मगर वह न तो सृष्टि, सृजन के मूल आधार हो सकते है और न ही वह उस दिव्य शक्ति के अंश। मगर इसके उलट अगर कोई स्वयं के जीवन निर्वहन में स्वयं का आचरण व्यवहार सृष्टि अनुरूप मर्यादित अनुशासित और निष्ठापूर्ण रखता है तो निश्चित ही मानव जगत में उसकी अपनी एक पहचान स्थापित होती है। आज की सत्ताओं में निश्चित ही मानवीय जीवन में त्रुटियां हो सकती है। मगर समय रहते सुधार समाधान है। निश्चित ही विगत 30 वर्षो में समय या कालचक्र के रहते निर्दोष होने के बावजूद निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन अज्ञानता बस इतिहास में या आज दोषी करार दिया जाये, मगर यह सम्पूर्ण सत्य नहीं हो सकता। क्योंकि सत्ताओं की ज्ञान के अभाव में ब्रम्ह की पहचान के अभाव में त्रुटियां होना स्वभाविक है और सत्तारूपी विनम्रता के विरूद्ध अहंकार उसके विनाश का कारण, सो जो लोग भी आज सत्ता सियासत में अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन का भाव रखते है उन्हें यह स्पष्ट होना चाहिए कि किसी भी समृद्ध न्यायप्रिय और सेवाभावी सत्ता की पहली सीढी उसका सात्विक पुरूषार्थ और न्यायप्रिय व्यवस्था होता है। हर अंतिम व्यक्ति के कष्ट और उसकी वैवसी मजबूरी संकट उसकी समृद्धि सत्ता का ही अंग होती है। अगर सत्तायें सजग सक्रिय न्यायप्रिय हो तो बडे-बडे संकटों का समाधान स्वतः ही हो जाता है। मगर यह तभी संभव है जब हमारे अन्दर सीखने-समझने की जिज्ञासा के साथ सर्वकल्याण का भाव न्याय सिद्धान्त और नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप कत्र्तव्य निर्वहन का भाव हो और प्रतिभाओं को सहज उचित अवसर देने की प्रमाणिक मान्यता हो। मगर जिस तरह से आज हमारी केन्द्रीय सत्ता और कुछ राज्य के नेतृत्व अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन का पुरूषार्थ करने में जुटे है यह हमारे लिये सुखद होना चाहिए और जिन जबावदेह लोगों से त्रुटियां हुई है उनके प्रति भी समादर का भाव अवश्य होना चाहिए तभी हम एक सार्थक जीवन के सजग साक्षी कहलायेंगे।  
जय स्वराज

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