कोरोनाकाल में उमडती भीड, सत्ताओं के अस्तित्व पर सवाल कत्र्तव्य निर्वहन की आड में कत्र्तव्यनिष्ठा का मौन घातक
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
यूं तो लोकतंत्र हो या राजतंत्र, नैसर्गिक कत्र्तव्य निर्वहन को समृद्ध, खुशहाल अनुशासित बनाने में सत्ताओं की अहम भूमिका होती है और उनकी जबावदेही भी। क्योंकि निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन पर ही सत्ताओं का अस्तित्व निर्भर होता है। सहज संसाधन, स्वच्छंद जीवन के साथ सुरक्षा का भाव ही सत्ताओं का मूल आधार रहा है। जिसके लिये उसके नैसर्गिक जीवन निर्वहन के साथ सत्ताओं के पोषण की जबावदेही भी उसके कंधों पर होती है। आज जब कोरोना जैसी महामारी के बीच सरकारों और समूचे सूचना तंत्र के माध्यम से कोरोना की प्रमाणिक दवा के आभाव में सोशल डिस्टेंस और मास्क, सेनेट्राईजर सहित हाथ साफ रखने के उपाय सुझाये जा रहे है तथा विश्व भर में संक्रमितों का आंकडा 50 लाख के पार हो चुका है और जिस तरह से भारत में संक्रमितों की संख्या बढ रही है ऐसे में नैसर्गिक कत्र्तव्य निर्वहन करने वालों के बीच कोरोना के प्रति कोताही कहीं मानवता के लिये श्राफ साबित न हो, यहीं आज सबसे बडा यक्ष सवाल है। मगर ऐसे में जब हर नागरिक और सत्ता से जुडे हर अंग की जबावदेही मानव रक्षा की है। ऐसे में जागरूकता ही वह हथियार है जिससे कोरोना को परास्त किया जा सकता है। क्योंकि जिस तरह से सत्तायें लोकतंात्रित स्वभाव अनुरूप अपने राजधर्म का पालन करने में जुटी है वह भी इस महामारी के बीच कहीं न कहीं कोई तो चूक कर रही है यह सही है कि बीमारी जो भी हो फिर वह कोरोना ही क्यों न हो। अगर सत्ताओं के अस्तित्व की सच्ची व्याख्या हो तो मानवता की रक्षा करना सत्ताओं का ही पहला कत्र्तव्य है। क्योंकि समूचे जनमानस की शक्तियां सत्ताओं में ही निहित होती है और उसे यह अधिकार भी वैद्याानिक तौर पर प्राप्त होता है कि वह मानवता की रक्षा के लिये जो भी संभव हो उसे करना चाहिए और नागरिकों को भी चाहिए कि उनके नैसर्गिक कत्र्तव्य निर्वहन में ऐसी कोई चूक न हो, जिसका दंश समूची मानव सभ्यता को भोगना पडें। आज यहीं विचारणीय बात होना चाहिए।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
यूं तो लोकतंत्र हो या राजतंत्र, नैसर्गिक कत्र्तव्य निर्वहन को समृद्ध, खुशहाल अनुशासित बनाने में सत्ताओं की अहम भूमिका होती है और उनकी जबावदेही भी। क्योंकि निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन पर ही सत्ताओं का अस्तित्व निर्भर होता है। सहज संसाधन, स्वच्छंद जीवन के साथ सुरक्षा का भाव ही सत्ताओं का मूल आधार रहा है। जिसके लिये उसके नैसर्गिक जीवन निर्वहन के साथ सत्ताओं के पोषण की जबावदेही भी उसके कंधों पर होती है। आज जब कोरोना जैसी महामारी के बीच सरकारों और समूचे सूचना तंत्र के माध्यम से कोरोना की प्रमाणिक दवा के आभाव में सोशल डिस्टेंस और मास्क, सेनेट्राईजर सहित हाथ साफ रखने के उपाय सुझाये जा रहे है तथा विश्व भर में संक्रमितों का आंकडा 50 लाख के पार हो चुका है और जिस तरह से भारत में संक्रमितों की संख्या बढ रही है ऐसे में नैसर्गिक कत्र्तव्य निर्वहन करने वालों के बीच कोरोना के प्रति कोताही कहीं मानवता के लिये श्राफ साबित न हो, यहीं आज सबसे बडा यक्ष सवाल है। मगर ऐसे में जब हर नागरिक और सत्ता से जुडे हर अंग की जबावदेही मानव रक्षा की है। ऐसे में जागरूकता ही वह हथियार है जिससे कोरोना को परास्त किया जा सकता है। क्योंकि जिस तरह से सत्तायें लोकतंात्रित स्वभाव अनुरूप अपने राजधर्म का पालन करने में जुटी है वह भी इस महामारी के बीच कहीं न कहीं कोई तो चूक कर रही है यह सही है कि बीमारी जो भी हो फिर वह कोरोना ही क्यों न हो। अगर सत्ताओं के अस्तित्व की सच्ची व्याख्या हो तो मानवता की रक्षा करना सत्ताओं का ही पहला कत्र्तव्य है। क्योंकि समूचे जनमानस की शक्तियां सत्ताओं में ही निहित होती है और उसे यह अधिकार भी वैद्याानिक तौर पर प्राप्त होता है कि वह मानवता की रक्षा के लिये जो भी संभव हो उसे करना चाहिए और नागरिकों को भी चाहिए कि उनके नैसर्गिक कत्र्तव्य निर्वहन में ऐसी कोई चूक न हो, जिसका दंश समूची मानव सभ्यता को भोगना पडें। आज यहीं विचारणीय बात होना चाहिए।

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