अन्तरमुखी परमानन्दियों की ऐसगाह बनता लोकतंत्र अमृत्व का आनंद भोगते संरक्षक और सेवक बिलखते गांव, गली, मजदूर और मातम में डूबी आशा-आकांक्षा

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
कोरोना ने समूचे विश्व में जिस तरह से कहर बरपाया है और जिस तरह से वह भारतवर्ष को धीरे-धीरे जकड रहा है ऐसी विपदा की कल्पना शायद ही किसी ने की हो। मगर गांव, गली, मजदूर और करोडों-करोड आशा-आकांक्षाओं पर इसका जो कहर टूटा है वह किसी से छिपा नहीं। कोरोना की कृतज्ञता को देख लगता है कि उसने विश्व में ऐसे किसी राष्ट्र को छोडा भी नहीं जो स्वयं को सबसे बडा बलशाली समृद्ध और शक्तिशाली समझते है। कोरोना से जंग तो दूर समूचा विश्व मिलकर अभी तक उससे बचाव के कोई कारगार कदम तक नहीं खोज सका। मगर जहां-जहां अपरिपक्व लोकतंत्र है वहां की व्यवस्थायें और सडक पर संघर्ष करते लोगों को देख नहीं लगता कि लोकतंत्र सेवा कल्याण और विकास की कारगार व्यवस्था है या फिर अंतरमुखी परमानन्दियों की ऐसगाह। ऐसे में अमृत्व का मुगालता पाल आनंद भोगते संरक्षक, सेवक जिस तरह से सेवा कल्याण में जुटे है उनकी कृतज्ञता को इतिहास किस नाम से जानेगा यह तो भविष्य के गर्व में है। मगर कहीं पर भी समूचे ब्रम्हाण्ड में कोई भी जीवन है तो उसकी मृत्यु भी सुनिश्चित है जिसका आधार संतुलन का सिद्धान्त ही कहा जा सकता है फिर क्षेत्र जो भी हो। अगर संतुलन का सिद्धान्त निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के साथ आत्मसात हुआ तो लोगों का जीवन भी स्वस्थ रहेगा और उनका जीवन भी समृद्ध, खुशहाल हो सकेगा। जरूरत आज अपने-अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन की है अगर हुआ तो कल्याण भी होगा और सेवा का भाव भी जागृत होगा। 
जय स्वराज

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