मानवता की रक्षा, सत्ता और सामर्थशालियों का धर्म अहंकार में बिगडते हालात सामर्थ अनुसार पुरूषार्थ हुआ होता, तो हालात आज कुछ और होते
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।

कहते है सृजनपूर्ण सोच मन, कर्म, वचन और पुरूषार्थ सृष्टि में सम्मानजनक रहा है और वह समृद्ध, खुशहाल मानव कृति की पूंजी भी है। मगर अहंकार की आग अनादिकाल से मानव संततति का बडा नुकसान करती रही है और वह क्रम आज भी अनवरत जारी है। बैसे भी अनादिकाल से मानव व मानवता की रक्षा को सबसे बडा धर्म कहा गया है और उसकी और उसके अस्तित्व को बचाने समय-समय पर बडे-बडे संग्राम जिन पुरूषार्थियों और सत्ताओं ने सृजन, सृष्टि में मौजूद मानवीय सभ्यता जीव-जगत के कल्याण का साथ दिया और धर्म के लिये पुरूषार्थ किया वह हमेशा सफल रहे तथा जिनके कारण संतुलन का सिद्धान्त बिगडा और मानव और जीव-जगत के जीवन पर संकट हुआ वह सब संघार के पात्र बने। अब चूकि कोरोनाकाल की भयाभय दस्तक समूची मानवता पर टूट पडी और चर्मोत्कर्ष की ओर अग्रसर है ऐसे में राजधर्म, सत्ता धर्म और पुरूषार्थियों के पुरूषार्थ का अक्षम, असफल सिद्ध होना सबसे बडी खतरे की घंटी है। ये अलग बात है कि भारतवर्ष में भले ही दो माह बाद रफ्तार में तेजी आ रही हो। मगर फिलहाल इसे सृजन विरूद्ध ही कहा जायेगा। मगर एक लाख चालीस हजार के आसपास जा पहुंची भारतवर्ष में संक्रमितों की संख्या अब उन राजसत्ता और पुस्षार्थियों को डराने और निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के लिये बाध्य करने स्पष्ट संदेश है। अगर सत्तायें अपने-अपने सियासी धर्म को छोड राजधर्म का पालन करती है और अपने सामर्थ, विवेक, ज्ञान-विज्ञान से समाधान ढंूढती है तो आज परिस्थिति कुछ और ही होती।
कहते है सत्य सृष्टि, सृजन, राष्ट्र-जन, स्व-कल्याण में आस्था रखने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी बीज को अपना प्रतिफल देने के लिये उसे जड से अलग होना ही पडता है यह आध्यात्मिक नहीं वैज्ञानिक सच भी है और खेती-किसानी या कृषि विज्ञान में समझ रखने वाले लोग इस सत्य को बखूबी जानते है। इसलिये अगर किसी भी सत्ता, शासक, सियासी दल को अपने सामर्थ, पुरूषार्थ का प्रतिफल देना है तो उसे जड से अलग हो प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त का इस सृष्टि में पालन करना ही होगा जो अभी तक नहीं हो सका। अगर सरकारों ने स्वराज के सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस के सूत्र को समझ मार्च में ही अगर शुरूआत की होती तो आज परिणाम प्रभावी और परिणाममूलक होते है। अगर सरकारों ने पूर्व में ही सील सिद्धान्त के तहत राष्ट्र, राज्य, जिला, नगर, महानगर, गांव की सीमायें सील कर एवं आबादी से दूर अलग से कोरोना का अनुसंधान, समाधान, सेवा शोध केन्द्रों की स्थापना की होती तो राष्ट्र के समूचे संसाधन और समूचा देश इस विपदा को नहीं झेल रहा होता। क्योंकि अगर सील होने के साथ सप्लाई चैन पर काम हुआ होता जहां रूट लेवल से लेकर टाॅप लेवल तक सप्लाई चैन को मजबूत करने वाले समन्वय के साथ आवश्यक वस्तुऐं मुहैया कराने वाले निर्णय होते तो आज लोगांे को विचलित हो अपने-अपने घरों की ओर जान जोखिम में डाल नहीं लौटना पडता।
कौन नहीं जानता कि देश के हर वार्ड और ग्राम पंचायत में उचित मूल की दुकान आशा कार्यकर्ता, आंगनबाडी कार्यकर्ता, शिक्षक, बीटगार्ड, चैकीदार, पोस्टमेन पदस्थ होते है। अगर जिला स्तर पर स्थापित कंट्रौलरूम, राज्य कंट्रौलरूम, राष्ट्रीय कंट्रौलरूम से समन्वय बना उत्पादक रिटेलर के बीच मांगपूर्ति के समन्वय को बिठाते तो सभी को जरूरत का सामान घर बैठे ही मुहैया हो सकता था। करोडो लोगों को घर बैठे रोजगार मिल सकता था और सोशल डिस्टेंस का संदेश हर व्यक्ति तक पहुंचा उसका प्रभावी रूप से क्रियान्वयन कराया जा सकता था।
अगर आबादी से दूर कोरोना सेन्टर या नगर ही बसा सीमाओं पर चैकिंग के दौरान या गली, मौहल्लों में चैकिंग के दौरान मिलने वाले कोरोना संक्रमितों को सीधे कोरोना सेन्टर भेज वह काम बंद पडे वाहन रेल और किराये के एयर एम्बूलेंस के माध्यम से सीधे उन्हें त्रिस्तरीय कोरोना सेन्टर में उपचार कर स्वस्थ होते ही उनके घर वापिस भेजा जा सकता था। कोरोना सेन्टर बनाने किसी बडे भवन नहीं, बल्कि टेन्ट लगाकर भी तत्काल सेवायें कोरेाना सेन्टर पर शुरू की जा सकती थी जिससे वहां काम करने वाला हर नागरिक इस बात के लिये सजग और प्रतिशिक्षित रहता कि उसे कोरोना जैसी महामारी से लडना है। कम संसाधन में सैनेट्राईजेशन और एतयात बरत पूरे देश को इस भयाभयता बचाया जा सकता था और आर्थिक ढांचे को भी ध्वस्त होने से बचाया जा सकता था। मगर अल्प ज्ञान, अहंकार तथा सिस्टम के मोहताज ज्ञान ने संभवतः ऐसा होने नहीं दिया और एक दो दस-पचास मिलने वाले संक्रमितों की जगह अब हर रोज पांच हजार से अधिक संक्रमित सामने आ रहे है, तो वहीं आर्थिक ढांचा धरासाई होने की ओर अग्रसर है। अभी भी कुछ नहीं बिगडा अगर सत्तायें अपने अहम, अहंकार को छोड अपने राजधर्म, मानव धर्म का पालन करने की शुरूआत कर दें तो मानव जाति पर आये संकट से उसे उभारा जा सकता है क्योंकि आज जिस महासंकट का दंश सत्ता, सरकारें, शासक और आमजन भोगने को मजबूर है सही मायने में इस महासंकट के उत्तरदायी वह कतई नही। क्योंकि जिस शिक्षा, नीति, विषय वस्तु के साथ विगत दो सौ वर्षो में हमारी पीडियां रहीं और आज मौजूद है उसमें सिर्फ निर्जीव सिस्टम के अलावा जीवंत ज्ञान का कोई स्थान नहीं। मगर कहते है कि इति-इति और चराबेति ही जीवन निर्वहन का जीवन में वह प्रभावी मूलमंत्र है। जिसने शास्त्रार्थ, ज्ञान और विज्ञान के माध्यम से मानव की सेवा, कल्याण और रक्षा हेतु अपने सामर्थ और पुरूषार्थ का सार्थक योगदान किया जा सकता है। इसलिये समझने, सीखने में कोई बुराई नहीं, ज्ञान अनंत है और जीवंत चलायेमान तथा प्रकृति परिवर्तनशील होती है यही आज सत्ता, सरकार, समर्थ, पुरूषार्थियों और आमजन के लिये समझने वाली बात होना चाहिए। प्रयास अहम होते है और परिणाम पुरूषार्थ के अधीन।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।

कहते है सृजनपूर्ण सोच मन, कर्म, वचन और पुरूषार्थ सृष्टि में सम्मानजनक रहा है और वह समृद्ध, खुशहाल मानव कृति की पूंजी भी है। मगर अहंकार की आग अनादिकाल से मानव संततति का बडा नुकसान करती रही है और वह क्रम आज भी अनवरत जारी है। बैसे भी अनादिकाल से मानव व मानवता की रक्षा को सबसे बडा धर्म कहा गया है और उसकी और उसके अस्तित्व को बचाने समय-समय पर बडे-बडे संग्राम जिन पुरूषार्थियों और सत्ताओं ने सृजन, सृष्टि में मौजूद मानवीय सभ्यता जीव-जगत के कल्याण का साथ दिया और धर्म के लिये पुरूषार्थ किया वह हमेशा सफल रहे तथा जिनके कारण संतुलन का सिद्धान्त बिगडा और मानव और जीव-जगत के जीवन पर संकट हुआ वह सब संघार के पात्र बने। अब चूकि कोरोनाकाल की भयाभय दस्तक समूची मानवता पर टूट पडी और चर्मोत्कर्ष की ओर अग्रसर है ऐसे में राजधर्म, सत्ता धर्म और पुरूषार्थियों के पुरूषार्थ का अक्षम, असफल सिद्ध होना सबसे बडी खतरे की घंटी है। ये अलग बात है कि भारतवर्ष में भले ही दो माह बाद रफ्तार में तेजी आ रही हो। मगर फिलहाल इसे सृजन विरूद्ध ही कहा जायेगा। मगर एक लाख चालीस हजार के आसपास जा पहुंची भारतवर्ष में संक्रमितों की संख्या अब उन राजसत्ता और पुस्षार्थियों को डराने और निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के लिये बाध्य करने स्पष्ट संदेश है। अगर सत्तायें अपने-अपने सियासी धर्म को छोड राजधर्म का पालन करती है और अपने सामर्थ, विवेक, ज्ञान-विज्ञान से समाधान ढंूढती है तो आज परिस्थिति कुछ और ही होती।
कहते है सत्य सृष्टि, सृजन, राष्ट्र-जन, स्व-कल्याण में आस्था रखने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी बीज को अपना प्रतिफल देने के लिये उसे जड से अलग होना ही पडता है यह आध्यात्मिक नहीं वैज्ञानिक सच भी है और खेती-किसानी या कृषि विज्ञान में समझ रखने वाले लोग इस सत्य को बखूबी जानते है। इसलिये अगर किसी भी सत्ता, शासक, सियासी दल को अपने सामर्थ, पुरूषार्थ का प्रतिफल देना है तो उसे जड से अलग हो प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त का इस सृष्टि में पालन करना ही होगा जो अभी तक नहीं हो सका। अगर सरकारों ने स्वराज के सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस के सूत्र को समझ मार्च में ही अगर शुरूआत की होती तो आज परिणाम प्रभावी और परिणाममूलक होते है। अगर सरकारों ने पूर्व में ही सील सिद्धान्त के तहत राष्ट्र, राज्य, जिला, नगर, महानगर, गांव की सीमायें सील कर एवं आबादी से दूर अलग से कोरोना का अनुसंधान, समाधान, सेवा शोध केन्द्रों की स्थापना की होती तो राष्ट्र के समूचे संसाधन और समूचा देश इस विपदा को नहीं झेल रहा होता। क्योंकि अगर सील होने के साथ सप्लाई चैन पर काम हुआ होता जहां रूट लेवल से लेकर टाॅप लेवल तक सप्लाई चैन को मजबूत करने वाले समन्वय के साथ आवश्यक वस्तुऐं मुहैया कराने वाले निर्णय होते तो आज लोगांे को विचलित हो अपने-अपने घरों की ओर जान जोखिम में डाल नहीं लौटना पडता।
कौन नहीं जानता कि देश के हर वार्ड और ग्राम पंचायत में उचित मूल की दुकान आशा कार्यकर्ता, आंगनबाडी कार्यकर्ता, शिक्षक, बीटगार्ड, चैकीदार, पोस्टमेन पदस्थ होते है। अगर जिला स्तर पर स्थापित कंट्रौलरूम, राज्य कंट्रौलरूम, राष्ट्रीय कंट्रौलरूम से समन्वय बना उत्पादक रिटेलर के बीच मांगपूर्ति के समन्वय को बिठाते तो सभी को जरूरत का सामान घर बैठे ही मुहैया हो सकता था। करोडो लोगों को घर बैठे रोजगार मिल सकता था और सोशल डिस्टेंस का संदेश हर व्यक्ति तक पहुंचा उसका प्रभावी रूप से क्रियान्वयन कराया जा सकता था।
अगर आबादी से दूर कोरोना सेन्टर या नगर ही बसा सीमाओं पर चैकिंग के दौरान या गली, मौहल्लों में चैकिंग के दौरान मिलने वाले कोरोना संक्रमितों को सीधे कोरोना सेन्टर भेज वह काम बंद पडे वाहन रेल और किराये के एयर एम्बूलेंस के माध्यम से सीधे उन्हें त्रिस्तरीय कोरोना सेन्टर में उपचार कर स्वस्थ होते ही उनके घर वापिस भेजा जा सकता था। कोरोना सेन्टर बनाने किसी बडे भवन नहीं, बल्कि टेन्ट लगाकर भी तत्काल सेवायें कोरेाना सेन्टर पर शुरू की जा सकती थी जिससे वहां काम करने वाला हर नागरिक इस बात के लिये सजग और प्रतिशिक्षित रहता कि उसे कोरोना जैसी महामारी से लडना है। कम संसाधन में सैनेट्राईजेशन और एतयात बरत पूरे देश को इस भयाभयता बचाया जा सकता था और आर्थिक ढांचे को भी ध्वस्त होने से बचाया जा सकता था। मगर अल्प ज्ञान, अहंकार तथा सिस्टम के मोहताज ज्ञान ने संभवतः ऐसा होने नहीं दिया और एक दो दस-पचास मिलने वाले संक्रमितों की जगह अब हर रोज पांच हजार से अधिक संक्रमित सामने आ रहे है, तो वहीं आर्थिक ढांचा धरासाई होने की ओर अग्रसर है। अभी भी कुछ नहीं बिगडा अगर सत्तायें अपने अहम, अहंकार को छोड अपने राजधर्म, मानव धर्म का पालन करने की शुरूआत कर दें तो मानव जाति पर आये संकट से उसे उभारा जा सकता है क्योंकि आज जिस महासंकट का दंश सत्ता, सरकारें, शासक और आमजन भोगने को मजबूर है सही मायने में इस महासंकट के उत्तरदायी वह कतई नही। क्योंकि जिस शिक्षा, नीति, विषय वस्तु के साथ विगत दो सौ वर्षो में हमारी पीडियां रहीं और आज मौजूद है उसमें सिर्फ निर्जीव सिस्टम के अलावा जीवंत ज्ञान का कोई स्थान नहीं। मगर कहते है कि इति-इति और चराबेति ही जीवन निर्वहन का जीवन में वह प्रभावी मूलमंत्र है। जिसने शास्त्रार्थ, ज्ञान और विज्ञान के माध्यम से मानव की सेवा, कल्याण और रक्षा हेतु अपने सामर्थ और पुरूषार्थ का सार्थक योगदान किया जा सकता है। इसलिये समझने, सीखने में कोई बुराई नहीं, ज्ञान अनंत है और जीवंत चलायेमान तथा प्रकृति परिवर्तनशील होती है यही आज सत्ता, सरकार, समर्थ, पुरूषार्थियों और आमजन के लिये समझने वाली बात होना चाहिए। प्रयास अहम होते है और परिणाम पुरूषार्थ के अधीन।
जय स्वराज
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