कागजी घोडे पर सवार सेवा कल्याण से कलफते लोग बैठकों की बाढ में बैवस आशा-आकांक्षा पहले ही जीवन में दुष्वारियां क्या कम थी जो कोरोना के कहर ने कोहराम मचा रखा है

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
विगत दो दशक से कागजी घोडो पर सवार सेवा कल्याण और आज कोरोना के कहर के बीच जीवन में जो कोहराम मचा है वहीं बैठकों की बाढ में जिस तरह से आशा-आकांक्षाओं को बैवस बना संकट का दंश झेलने मजबूर कर रखा है वह आज विचारणीय विषय होना चाहिए। कोरोना कहर से मानव सभ्यता का अंजाम जब होगा तब होगा। मगर जिस तरह से कत्र्तव्यनिष्ठा का दौर चल रहा है वह निढाल लोगों के दिल दहलाने काफी है। देश में एक ओर जहां हर रोज लगभग चार पाच हजार संक्रमितों की संख्या बढ रही है तो वहीं समूचे देश में आंकडा फिलहाल एक लाख के पार जा पहुंचा है। मगर यहां समझने वाली बात यह है कि सेवा कल्याण में पूर्व से ही सक्रिय शासकीय अमले की कमी का रोना तो पहले से ही था जिसका कारण उधार के माल पर सत्ताआंे का मोहताज रहना और कम स्टेप्लेप्स में कर्ज हासिल करना रहा है। अब जब अमले की सख्त जरूरत है तब कागजी घोडों के सहारे बैठकों की बाढ के बीच सेवा कल्याण विकास हो रहा है तो उस पर आज नहीं तो कल सवाल होना तो तय है। फिलहाल तो कोरोना के चलते आमजन जीवन जहां बेहाल है तो वहीं दूसरी ओर व्यवस्थायें कंगाल। अगर आज भी हजारों-लाखों की तादाद में युवा, चिकित्सक और कुशल-अकुशल मजदूरों पर राष्ट्रीय संपदा के रूप में निष्ठापूर्ण सत्ताओ का कत्र्तव्य निर्वहन नहीं हुआ तो यह महान नेतृत्वों और सत्ताओं का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। जिसमें सबसे बडे सवाल उस राज्य सरकारों से होना चाहिए तय है जो अपनी विफलताआंे को अपना पुरूषार्थ जताने से नहीं चूक रहीं। 

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