अगर सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस के साथ त्रिस्तरीय कोरोना शहर सेन्टरों की स्थापना न हुई तो परिणाम घातक हो सकते है न वर्क डायरी, न ही सार्थक मूल्यांकन बेपरवाह होता कत्र्तव्य निर्वहन

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 

अगर 16 मार्च से लेकर 24 मार्च के बीच स्वराज के आग्रह पर विचार हुआ होता तो मानव जगत को यह दिन न देखना पड रहा होता। जिस तरह से होच-पौच माहौल के बीच लगातार कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ रही है वह निश्चित ही चिन्ता का विषय है। भले ही आंकडा फिलहाल एक लाख के पार पहुंच चुका हो, तो वहीं 35 फीसदी से अधिक संक्रमित लोगों के स्वास्थ्य में सुधार हुआ हो। मगर जिस तरह से अपने-अपने घरों की ओर जाने की जिद मानव के मन में घर कर चुकी है कहीं यह जान की दुश्मन न बन जाये। स्वराज ने पूर्व में भी आबादी से दूर कोरोना चिकित्सा सेन्टर की स्थापना की बात कही थी जब मरीजों की संख्या देश में एक हजार से भी कम थी। अगर उसी समय आबादी से दूर त्रिस्तरीय कोरोना सेन्टर बन गये होते तो समूचा देश आज कोरोना की इस भयानक चपेट न होता और न ही इतने बडे स्तर पर मजदूरों का पलायन हो अर्थव्यवस्था चैपट होती। स्वराज ने सील सप्लाई, सोशल डिस्टेंस के साथ कोरोना सेन्टर खोले जाने की बात कही थी। मगर कहते है कि जब सत्तायें अपने सिस्टम की मोहताज हो जाती है और शासक सेवकों के निर्णय पर निर्भर तो निर्णय स्वभाविक रूप से इतने सार्थक नहीं रह पाते, जो कल्याणकारी कहे जाये।  
ये अलग बात है कि देश के प्रधानमंत्री ने दूरगामी खतरे को भांपते हुये बतौर दूर-दृष्टा टोटल लाॅकडाउन के माध्यम से देश व देश के नागरिक के स्वास्थ्य को बचाने समय-समय पर अपने सम्बोधन के माध्यम से सार्थक कोशिश की। मगर कहते है कि समय के आगे बडे-बडे प्रयास विफल होते देर नहीं लगती। अभी भी समय है कि सत्ता और सरकारें समय की नजाकत को समझे और आबादी से दूर नये कोरोना सेन्टर जरूरत पडे तो शहर तक बनाने तक से न चूके, फिर वह भले ही अस्थाई ही क्यों न हो। क्योंकि जिस तरह से देश में संक्रमितों की संख्या बढ रही है इससे मद्देनजर ऐतयात बर्तना राज-सत्ताओं का धर्म भी है और कर्म भी। 
जय स्वराज

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