पुरूषार्थ की पराकाष्ठा..............तीरंदाज ? सत्ताओं के सेवा कल्याण और कोरोना के कहर से कांपी मानवता

व्ही.एस.भुल्ले
भैया- अब न तो अष्ठ वक्र जैसा कोई विद्ववान इस पुण्य भूमि पर है जो अपने पिता की उम्र के विद्ववान, पुरूषों की सभा में विद्ववानों को  शास्त्रार्थ में परास्त कर उन्हें क्षमादान का बडा संदेश दें, सच्चे विद्ववान होने का ज्ञान दे, न ही ब्रम्ह और ज्ञान-विज्ञान का सच्चा अर्थ बताने वाला रहा और न ही राजाजनक की भांति अष्ठ वक्र की विद्धवत्ता का कायल हो, सत्ता शासन में व्याप्त कुरूतियों को तत्काल खत्म करने का आदेश देने वाला शेष रहा। म्हारे को तो इस अदने-से कोरोना वायरस, जो मुंआ दिखता भी नहीं और मिठता भी नहीं। भाया मने तो यह कोई मायावी शक्ति लागे। काश म्हारे पास भी आज कोई मायावी शक्ति अचूक अस्त्र होता तो दिन, महीने, साल घण्टे नहीं कुछ सेकेण्डों में ही चारों-खाने चित पडा होता। मगर भाया इस महासंकट के बीच म्हारे त्याग-तपस्वी प्रदान सेवक और बाबा, बहिन को छोड म्हारी महान सत्ताओं का संघर्ष पुरूषार्थ की पराकाष्ठा केबिनों में बंद बैठ कुछ कम नहीं दिखती। जिनकी त्याग-तपस्या, जनसेवा, निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन, सेवा कल्याण को देख कोरोना कहर से समूची मानवता कांप रही है। म्हारा बस चले तो सेवा कल्याण के लिये सत्ताओं को और ऐसे जनसेवकों को नोबल नहीं, तो कम से कम भारत रत्न मिल सके, ऐसा प्रयास तो मने हाथों हाथ कर ही सकता हूं और इन महान मूडधन्य महान सेवकों के लिये ऐतिहासिक पुरूस्कार मिलें, यह आवाज तो म्हारे लोकतंत्र में उठा ही सकता हूं। 
भैये-मुंए चुपकर मुंह पर मास्क, गमछा, तोलिया बांध बार-बार हाथ धों, घर के अन्दर बैठ सोशल डिस्टेंस के साथ लाॅकडाउन का पालन कर, कै थारे को मालूम कोणी विश्व के बडे-बडे बलशाली, सूरमा देशों में लाशों के ढेर लगे है, तो वहीं 10-20 नहीं 25 लाख से अधिक लोग संक्रमित हो चुके है जो बारी-बारी से अपने स्वस्थ होने का इंतजार कर रहे है। बैसे भी म्हारे यहां भी तो संक्रमितों की संख्या कुछ कम नहीं। लगभग आंकडा 50 हजार के पार जा पहुंचा है और सेवा कल्याण का काम फिलहाल युद्ध स्तर पर जारी है। ग्रीन से नारंगी, तो नारंगी से कोई लाल हो रहा है, तो दूसरी ओर हजारों की तादाद में हमारा पुरूषार्थ कोरोना को परास्त भी कर घर लौट रहा है। 
भैया- मने तो बोल्यू सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। 
भैये- अरे बावले इसलिये तो ई-पास हमारे होनहार पढने-लिखने वाले बच्चों और घर लौटने वालों को आॅनलाईन की गई है। इतना ही नहीं एसी, देशी बसों के साथ बंद पडी ट्रेनें भी मजूदरों को ढोने दौड पडी है। विदेशों से म्हारे अपनो को ढोने जहाजों का बेडा चल पडा है, तो वहीं मजदूरों का रथ भी श्रमिकों को ढोने दौड पडा है। अब ऐसे में अगर किराया बसूलने या देने लेने की बात चल पडी है तो म्हारे सेवकों की पूरी मंडली गिरोहबंद हो इस मुद्दे को भुनाने में लग गई है। कै थारे को मालूम कोणी कि कोई दे रहा है तो कोई ले रहा है। अगर मामला लेन-देन तक सीमित होता तो चल जाती, मगर संकट के समय सियासत कैसे अछूती रह जाती। फिर समय-समय पर आवश्यक आदेश-निर्देश भी तो हमारी सत्ताओं से जारी हो रहे है, सेवा, कल्याण की खातिर सीधे खातों में हजार-दो हजार पहुंच रहे है तो कहीं दस किलो मोटा अनाज मुहैया हो रहा है। अब ऐसे में अगर कुछ विघन संतोषी घरों चेम्बरों में बंद, म्हारे सेवकों की सेवा पर कुछ सवाल कर रहे है तो यह सीधे-सीधे म्हारे जनसेवकों की निष्ठापूर्ण सेवा, त्याग-तपस्या पर अर्नगल सवाल है। 
भैया- मने समझ लिया थारा पुरूषार्थ और उसकी पराकाष्ठा, तने तो अंग्रेजों को भी मात दे रिया शै। काश उन्होंने भी सेवा कल्याण के क्षेत्र में ऐसी त्याग-तपस्या की होती, तो उनकी सत्ता भी 200 वर्ष ही नहीं और आगे तक सुरक्षित बनी रहती। मगर ऐसे में मने कै करूं जब कोरोना म्हारे अपनो पर कहर बनकर टूट रहा है और सेवा कल्याण का दौर ऐसा कि कोई पैदल साईकिल, रिक्शा, तो कोई रेल, बस, जहाजों में बैवसी के चलते लम्बा सफर कर रहा है। मगर म्हारे मगज में एक बात न आवे कि जिन बलशाली, शक्तिशाली राष्ट्रों में कभी उसके एक नागरिक की मौत पर सारी सत्ता हिल जाती थी और मारने वाले को जमीन खोदकर निकाल उसे सजा बतौर इस दुनिया से विदा दिला अपनी ताकत का परचम लहराती थी या फिर मिशाल, बमों की बारिस से उन राष्ट्रों को सबक सिखाती थी जो उनके नागरिकों की जान को वेभाव समझते थे। आज उन बलशालियों के राष्ट्र में भी मातम पसरा पडा है कम से कम हमारे यहां तो फिर भी आज सेवा कल्याण का दौर सील, सप्लाई, सोशल डिस्टेंस के साथ भरपूर चल रहा है। बगैर पर्याप्त संसाधनों के कोरोना को धूल चटाते हमारे महान कोरोन वाॅलंटियर जंगे-ए मैदान में डटे है, तो वहीं समूचे चिकित्सीय संसाधन तैनात खडे है। अगर ऐेसे में चंद सेवक, सेवा कल्याण का दुख चेम्बरों में बैठ ले रहे है तो इसमें हर्ज ही क्या ? मगर मने तो एक ही बात जानू कि सील, सप्लाई, स्वच्छता के साथ सोशल डिस्टेंस ही अब कारगार अस्त्र साबित होगा और मानव के जीवन का मूल आधार भी इसी फाॅरमूले से अब सुरक्षित बचेगा। ऐसे में भाया मने किसी लेखक की चार लाईनें याद आवे। ’’आज परछाईं से पूछ ही लिया क्यों चलती हो मेरे साथ, उसने भी हंसकर कहा और कौन है मेरे सिवायें कौन है तेरे साथ ’’
जय स्वराज

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