अधूरे तंत्र और आभावों के बीच संकटपूर्ण जीवन निर्वहन कत्र्तव्यनिष्ठा को कलंकित करती कृतज्ञता

विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
पहले ही इतनी सारी दुष्वारियां ही इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में क्या कम थी जिन्होंने लोकतंत्र के नरबस सिस्टम को भ्रष्टाचाररूपी महामारी से पहले ही बेजान कर रखा था। जिसको ठीक करते-करते भ्रष्टाचार तो खत्म नहीं हुआ बल्कि मानवता का नैतिक पतन ऐसा हुआ कि लोग भ्रष्टाचार को ही शिष्टाचार मान उसे स्वीकार्यता देने में सफल रहे। अगर यो कहें कि इस अर्थ दुनिया में अब भ्रष्टाचार कोई विषय नहीं रहा तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। फिर वो क्षेत्र राजनैतिक, सामाजिक या संस्थागत हो या मानव जीवन के निर्वहन के विभिन्न पहलुओं से बंधा हो। जिस तरह से आज संस्थागत सामाजिक कत्र्तव्य विमुखता भ्रष्टाचार के उदाहरण मौजूदा प्रमाण गली, मौहल्लों से लेकर महानगरों तक फैले पडे है वह किसी से छिपे नहीं। मगर बैवसी ऐसी कि उसके अलावा जिन्दा रहने अब कोई चारा भी नहीं। फिर चाहे वह पेयजल संकट हो, सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा हो या फिर संचार या सेवा से जुडी अन्य सेवायें हो। सभी दूर लोगों की आशा-आकांक्षायें बिलखती नजर आयेंगी और यहीं कारण है कि अब मानव, समाज दो वर्गो की ओर बढ रहा है जो सोशक, पोशक के अलावा संपन्न आभावहीन लोगों के बीच बढ जाये तो लोगों के बीच अतिसंयोक्ति न होगी बेहतर हो कि हम समय रहते सुधार की ओर अग्रसर हो। यहीं मानवीय जीवन की सफलत होगी।  

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