जान और जहान से जूझते मजदूर, किसान जबावदेह लोगों की चुप्पी शर्मनाक

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
जिस तरह से जान बचाने मजदूरों का झुण्ड कहीं सडक पर, तो कहीं पलायन में जुटा है तो दूसरी ओर अपने मेहनत का जहान बचाने किसान खरीदी केन्द्रों पर उमड रहा है। कोरोनाकाल में बनते यह हालात निश्चित ही चिन्ताजनक है। मगर जबावदेह लोगों को चिन्ता मुक्त रहना उतना ही घातक है जितना कि मजदूर, किसानों को है जो मजबूरी में जान और जहान को जोखिम में डाल जीवन निर्वहन के संघर्ष में जुटे है। जिस तरह की खबरे मजदूरों के बीच से उनके यात्रा करने की आ रही है और खरीदी केन्द्रों पर जिस तरह की प्रताडना किसानों के बीच मेहसूस हो रही है यह किसी भी समृद्ध सत्ता, सरकार और सिस्टम के लिये सुखद नहीं कही जा सकती। इसके पीछे का सच क्या है ये तो सिस्टम बनाने वाली सत्तायें और शासन चलाने वाले लोग ही जाने। मगर किसान, मजदूरों का दर्द कुछ कम नहीं। 
कारण साफ है कि भ्रष्टाचार की वह महामारी जो मानवता निगलने में भी संकोच नहीं करती। दीमक की तरह मानवीय चरित्र को चट करने वाला यह भ्रष्टाचार कब रूकेगा ये तो सत्ता सरकारें और सेवा कल्याण के लिये सिस्टम में बैठे लोग ही जाने। मगर जिस तरह से कोरोनाकाल में किसान, मजदूरों को दो-चार होना पड रहा है वह किसी भी समाज के लिये शर्मनाक ही कहा जायेगा। 

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