लोकतंत्र में प्रतिभाओं को निगलती गिरोहबंद संस्कृति सुशांत की मौत पर सत्य की चुप्पी बाॅलीवुड ही नहीं, राजनीति अर्थ, शिक्षा, समाज, सेवा कल्याण, विकास, सभी तो गिरोहबंद संस्कृति का शिकार है
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
फिल्म स्टार कलाकार सुशांत की मौत का सच जो भी हो। मगर जिस तरह की संकायें उनके परिवारजन मित्रों द्वारा उनकी मौत को लेकर व्यक्त की जा रही है उनसे साफ है कि कहीं न कहीं लोकतंत्र में घर कर चुकी गिरोहबंद संस्कृति अब इतनी कुख्यात-विख्यात होती जा रही है कि वह अब लोगों के जुबान तक आने में संकोच नहीं करती।
ये अलग बात है कि आज इस दंश से बाॅलीबुड ही नहीं राजनीति अर्थ और समाज, विज्ञान, सेवा, कल्याण, विकास, शिक्षा के क्षेत्रों में भी इस तथाकथित गिरोहबंद संस्कृति ने अपनी गहरी जडे जमा कर रखी है। अगर हम बाॅलीबुड की बात करें तो सुशांत की मौत पर खडे सवाल कोई नये नहीं। इससे पूर्व भी कई मामले ऐसे आते रहे है भले ही उनका पुष्ट प्रमाण न हो। इतना ही नहीं राजनैतिक क्षेत्रों में भी या अर्थ-जगत सहित समाज और विज्ञान के क्षेत्र में भी कमतर ऐसे ही हालात है। आज जो लोग गिरोहबंद हो अपनी समृद्धि खुशहाली के बल स्वयं को स्थापित किये हुये है। उनके भी कई मर्तवा ऐसे उदाहरण आम देखे गये है। अगर आज हम देखे तो चाहे वह उद्योग जगत हो राजनैतिक दल या फिर विज्ञान के क्षेत्र जहां अपने संसाधनों के बल पर बडे-बडे अपंयार खडे कर प्रतिभा दमन का खेल सरेयाम लोकतंत्र में खेला जाता है जो किसी से छिपा नहीं, जिस तरह से आजकल सोशल मीडिया पर अपने-अपने हेन्डलरों के माध्यम से या इलैक्ट्राॅनिक प्रिंट मीडिया या समाज, सेवा के नाम चेहरे मोहरे और चरित्र चमकायें जाते है कौन नहीं जानता। मगर लोकतंत्र के नाम सबकुछ खुलेआम होता है। इसे किसी भी समृद्ध सभ्यता या समाज का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा जहां प्रतिभाओं को स्वच्छंद उडान का वातावरण न हो। जब तक व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज मिलकर अपनी सनातन संस्कृति और सृष्टि सृजन के सिद्धान्त को अस्वीकार्य कर खुद की समृद्धि का रास्ता खोजते रहेंगे और सत्ताओं के निर्धारण के समय स्वयं के क्षणिक स्वार्थो के खातिर प्रतिभाओं की अनदेखी करते रहेंगे तब तक लोकतंत्र में फलती-फूलती गिरोहबंद संस्कृति पर विराम लगना असंभव ही साबित होगा। बेहतर हो कि हम स्व-स्वार्थ छोड सर्वकल्याण का विचार कर अपने सामर्थ को सिद्ध करे तभी हम गिरोहबंद संस्कृति से हमारी समृद्ध विरासत मानवीय संपदा और प्रतिभाओं को बचा पायेंगे।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
फिल्म स्टार कलाकार सुशांत की मौत का सच जो भी हो। मगर जिस तरह की संकायें उनके परिवारजन मित्रों द्वारा उनकी मौत को लेकर व्यक्त की जा रही है उनसे साफ है कि कहीं न कहीं लोकतंत्र में घर कर चुकी गिरोहबंद संस्कृति अब इतनी कुख्यात-विख्यात होती जा रही है कि वह अब लोगों के जुबान तक आने में संकोच नहीं करती। ये अलग बात है कि आज इस दंश से बाॅलीबुड ही नहीं राजनीति अर्थ और समाज, विज्ञान, सेवा, कल्याण, विकास, शिक्षा के क्षेत्रों में भी इस तथाकथित गिरोहबंद संस्कृति ने अपनी गहरी जडे जमा कर रखी है। अगर हम बाॅलीबुड की बात करें तो सुशांत की मौत पर खडे सवाल कोई नये नहीं। इससे पूर्व भी कई मामले ऐसे आते रहे है भले ही उनका पुष्ट प्रमाण न हो। इतना ही नहीं राजनैतिक क्षेत्रों में भी या अर्थ-जगत सहित समाज और विज्ञान के क्षेत्र में भी कमतर ऐसे ही हालात है। आज जो लोग गिरोहबंद हो अपनी समृद्धि खुशहाली के बल स्वयं को स्थापित किये हुये है। उनके भी कई मर्तवा ऐसे उदाहरण आम देखे गये है। अगर आज हम देखे तो चाहे वह उद्योग जगत हो राजनैतिक दल या फिर विज्ञान के क्षेत्र जहां अपने संसाधनों के बल पर बडे-बडे अपंयार खडे कर प्रतिभा दमन का खेल सरेयाम लोकतंत्र में खेला जाता है जो किसी से छिपा नहीं, जिस तरह से आजकल सोशल मीडिया पर अपने-अपने हेन्डलरों के माध्यम से या इलैक्ट्राॅनिक प्रिंट मीडिया या समाज, सेवा के नाम चेहरे मोहरे और चरित्र चमकायें जाते है कौन नहीं जानता। मगर लोकतंत्र के नाम सबकुछ खुलेआम होता है। इसे किसी भी समृद्ध सभ्यता या समाज का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा जहां प्रतिभाओं को स्वच्छंद उडान का वातावरण न हो। जब तक व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज मिलकर अपनी सनातन संस्कृति और सृष्टि सृजन के सिद्धान्त को अस्वीकार्य कर खुद की समृद्धि का रास्ता खोजते रहेंगे और सत्ताओं के निर्धारण के समय स्वयं के क्षणिक स्वार्थो के खातिर प्रतिभाओं की अनदेखी करते रहेंगे तब तक लोकतंत्र में फलती-फूलती गिरोहबंद संस्कृति पर विराम लगना असंभव ही साबित होगा। बेहतर हो कि हम स्व-स्वार्थ छोड सर्वकल्याण का विचार कर अपने सामर्थ को सिद्ध करे तभी हम गिरोहबंद संस्कृति से हमारी समृद्ध विरासत मानवीय संपदा और प्रतिभाओं को बचा पायेंगे।
Comments
Post a Comment