राजधर्म की दरकार वेलगाम स्वतंत्रता बर्बादी को न्यौता
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह से पांचवा लाॅकडाउन के शुरू होते-होते कोरोना संक्रमितों की संख्या में इजाफा हो रहा है वह चिन्ताजनक ही कहा जायेगा। अगर राजधर्म का पालन नहीं हुआ तो इसके खतरनाक परिणाम हो सकते है। जिस तरह से कोरोनाकाल में बैवसी के चलते आजादी, अधिकार सर चढकर बोल रहे है और कत्र्तव्यनिष्ठा मौन रह तमाशा देखने में जुटी है वह मानवीय जीवन के लिये शुभसंकेत कतई नहीं माने जा सकते। इसलिये जरूरत आज सत्ता और सत्ताधीशोे को मोह त्याग धर्म की रक्षा और न्याय की स्थापना के लिये अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करने की है। जीवन मूल्यों की बिना पर आजाद स्वतंत्रता की कीमत कहीं मानव सभ्यता को इतनी मंहगी न पड जाये कि उसमें सुधार ही संभव न हो सके। समयकाल परिस्थिति अनुसार भूल-चूक होना स्वभाविक है और यह मानव का नैसर्गिक गुण भी। मगर सत्ताओं को सर्वोच्च और पूज्यनीय स्थान किसी भी व्यवस्था में इसलिये प्राप्त है कि वह धर्म और न्याय के लिये हमेशा तूफानों के आगे चट्टान बनकर खडी रहती है। अभी भी वक्त है कि सत्तायें आंखे खोल अपने अहंकार, जुनून को त्याग मानव जीवन की रक्षा और धर्म की स्थापना में जुटे। जिससे मानवीय जीवन को कोरोना के महासंकट से बचाये जा सके। मगर यह लोकतंत्र की बैवसी कहे या दुर्भाग्य कि हमारा लोकतांत्रिक सिस्टम कितना ही सेवाभावी कल्याणकारी और कत्र्तव्यनिष्ठ हो। मगर परिणामों का आभाव निष्ठा पर सवाल अवश्य खडे करता है। इसलिये अहम-अहंकार को छोड देश में मौजूद प्रतिभा, संपदा और विधाओं को शस्त्र बना, अगर कोरोना से दो-दो हाथ हो तो कोई कारण नहीं जो हम उसे अंततः उसे परास्त करने में अवश्य कामयाब होंगे।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह से पांचवा लाॅकडाउन के शुरू होते-होते कोरोना संक्रमितों की संख्या में इजाफा हो रहा है वह चिन्ताजनक ही कहा जायेगा। अगर राजधर्म का पालन नहीं हुआ तो इसके खतरनाक परिणाम हो सकते है। जिस तरह से कोरोनाकाल में बैवसी के चलते आजादी, अधिकार सर चढकर बोल रहे है और कत्र्तव्यनिष्ठा मौन रह तमाशा देखने में जुटी है वह मानवीय जीवन के लिये शुभसंकेत कतई नहीं माने जा सकते। इसलिये जरूरत आज सत्ता और सत्ताधीशोे को मोह त्याग धर्म की रक्षा और न्याय की स्थापना के लिये अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करने की है। जीवन मूल्यों की बिना पर आजाद स्वतंत्रता की कीमत कहीं मानव सभ्यता को इतनी मंहगी न पड जाये कि उसमें सुधार ही संभव न हो सके। समयकाल परिस्थिति अनुसार भूल-चूक होना स्वभाविक है और यह मानव का नैसर्गिक गुण भी। मगर सत्ताओं को सर्वोच्च और पूज्यनीय स्थान किसी भी व्यवस्था में इसलिये प्राप्त है कि वह धर्म और न्याय के लिये हमेशा तूफानों के आगे चट्टान बनकर खडी रहती है। अभी भी वक्त है कि सत्तायें आंखे खोल अपने अहंकार, जुनून को त्याग मानव जीवन की रक्षा और धर्म की स्थापना में जुटे। जिससे मानवीय जीवन को कोरोना के महासंकट से बचाये जा सके। मगर यह लोकतंत्र की बैवसी कहे या दुर्भाग्य कि हमारा लोकतांत्रिक सिस्टम कितना ही सेवाभावी कल्याणकारी और कत्र्तव्यनिष्ठ हो। मगर परिणामों का आभाव निष्ठा पर सवाल अवश्य खडे करता है। इसलिये अहम-अहंकार को छोड देश में मौजूद प्रतिभा, संपदा और विधाओं को शस्त्र बना, अगर कोरोना से दो-दो हाथ हो तो कोई कारण नहीं जो हम उसे अंततः उसे परास्त करने में अवश्य कामयाब होंगे।
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