सृजन में, शान्ति संहार भारतीय संस्कृति, संस्कार, सामर्थ का मूल आधार है मानव धर्म की रक्षा सबसे बडा कर्म विश्व समुदाय की चुप्पी मानवता के साथ अन्याय स्वार्थवत र्दुदान्त दुस्साहियों को सबक समय की दरकार
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भारतवर्ष का सामर्थ अनादिकाल से पुरूषार्थ मानव धर्म की रक्षा के लिए प्रमाणिक रहा है फिर कीमत कत्र्तव्य मार्ग पर जो भी रही हो। अगर यों कहे कि भारतीय संस्कृति, संस्कार सृजन में शान्ति संहार संरक्षण का मूल आधार रहा है तो कोई अति संयोक्ति न होगी। जिसके एक तरफ जहां शान्तिपुंज तो दूसरी ओर संहार करने का सामर्थ मानव धर्म की रक्षा के लिए हमेशा कटिबद्ध रहा है जो भारतीय संस्कृति की विरासत भी है और उसका सामर्थ भी। आज जब एक मर्तवा फिर से मानव धर्म पर हमला हुआ है ऐसे में इंसानित और मानव कल्याण में विश्वास रखने वाले हर मानव का कत्र्तव्य हो जाता है कि मानवता की रक्षा के लिए वह अपना पुरूषार्थ कर अपने मानव धर्म का पालन करें।
अगर गत दिनों की घटना जिसमें कई वीर सैनिकों की शहादत इस कोरोनाकाल के महासंकट के दौरान अपने कत्र्तव्य निर्वहन के दौरान हुई वह भी स्वार्थवत र्दुदान्त दुस्साहसी मानसिकता के चलते यह समूचे विश्व की मानवता के लिए खतरनाक है। जिस पर कोरोना से पीडित समूचे विश्व मानव जगत को संज्ञान अवश्य लेना चाहिए। क्योंकि जिन स्वार्थाे के लिए आज जो लोग मानव धर्म को दरकिनार कर मानव जीवन को संकट में डालने का काम कर रहे है ऐसे लोगों के खिलाफ मानव जगत को एक होना ही उसका सबसे बडा धर्म है। ये अलग बात है कि जिस तरह से भारतवर्ष अपने दुस्साहसी पडोसी से दो-चार होने को मजबूर है इस सत्य को समूची विश्व विरादरी को समझना आज के परवेश में अतिआवश्यक है। कहते है कि किसी भी राष्ट्र की संस्कृति उसके संस्कार और उसका सामर्थ ही उसकी बहुमूल्य विरासत होती है और विरासत की रक्षा करना उसे आगे बढाना उसका धर्म होता है। इसमें किसी संदेह नहीं होना चािहए कि शान्ति और संहार भारतीय संस्कृति के गोद में फलते-फूलते है और कल्याण प्रतिशोध उसकी भुजाओं में लहु बनकर दौडता है। अगर थोडे कहे को बहुत समझ पाये तो यह समुची मानव विरादरी के लिए शुभसंकेत ही कहा जायेगा। क्योंकि भारतवर्ष का भाव मानव धर्म की रक्षा के साथ सर्वकल्याण का अनादिकाल से रहा है और इस विरासत की रक्षा के लिए न तो भारतवर्ष कभी झुका है न ही रूका है और न ही टूटा है, समय आने पर उसने अपने सामर्थ और पुरूषार्थ से बडे-बडे बलशालियों को स्पष्ट संदेश देंने कभी कोई संकोच नहीं किया है क्योंकि भारतववर्ष की माटी महान है और उसके सपूत अदभुत सामर्थवान, जो स्वाभिमान की रक्षा करने में समर्थ भी है और सक्षम भी है।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भारतवर्ष का सामर्थ अनादिकाल से पुरूषार्थ मानव धर्म की रक्षा के लिए प्रमाणिक रहा है फिर कीमत कत्र्तव्य मार्ग पर जो भी रही हो। अगर यों कहे कि भारतीय संस्कृति, संस्कार सृजन में शान्ति संहार संरक्षण का मूल आधार रहा है तो कोई अति संयोक्ति न होगी। जिसके एक तरफ जहां शान्तिपुंज तो दूसरी ओर संहार करने का सामर्थ मानव धर्म की रक्षा के लिए हमेशा कटिबद्ध रहा है जो भारतीय संस्कृति की विरासत भी है और उसका सामर्थ भी। आज जब एक मर्तवा फिर से मानव धर्म पर हमला हुआ है ऐसे में इंसानित और मानव कल्याण में विश्वास रखने वाले हर मानव का कत्र्तव्य हो जाता है कि मानवता की रक्षा के लिए वह अपना पुरूषार्थ कर अपने मानव धर्म का पालन करें।
अगर गत दिनों की घटना जिसमें कई वीर सैनिकों की शहादत इस कोरोनाकाल के महासंकट के दौरान अपने कत्र्तव्य निर्वहन के दौरान हुई वह भी स्वार्थवत र्दुदान्त दुस्साहसी मानसिकता के चलते यह समूचे विश्व की मानवता के लिए खतरनाक है। जिस पर कोरोना से पीडित समूचे विश्व मानव जगत को संज्ञान अवश्य लेना चाहिए। क्योंकि जिन स्वार्थाे के लिए आज जो लोग मानव धर्म को दरकिनार कर मानव जीवन को संकट में डालने का काम कर रहे है ऐसे लोगों के खिलाफ मानव जगत को एक होना ही उसका सबसे बडा धर्म है। ये अलग बात है कि जिस तरह से भारतवर्ष अपने दुस्साहसी पडोसी से दो-चार होने को मजबूर है इस सत्य को समूची विश्व विरादरी को समझना आज के परवेश में अतिआवश्यक है। कहते है कि किसी भी राष्ट्र की संस्कृति उसके संस्कार और उसका सामर्थ ही उसकी बहुमूल्य विरासत होती है और विरासत की रक्षा करना उसे आगे बढाना उसका धर्म होता है। इसमें किसी संदेह नहीं होना चािहए कि शान्ति और संहार भारतीय संस्कृति के गोद में फलते-फूलते है और कल्याण प्रतिशोध उसकी भुजाओं में लहु बनकर दौडता है। अगर थोडे कहे को बहुत समझ पाये तो यह समुची मानव विरादरी के लिए शुभसंकेत ही कहा जायेगा। क्योंकि भारतवर्ष का भाव मानव धर्म की रक्षा के साथ सर्वकल्याण का अनादिकाल से रहा है और इस विरासत की रक्षा के लिए न तो भारतवर्ष कभी झुका है न ही रूका है और न ही टूटा है, समय आने पर उसने अपने सामर्थ और पुरूषार्थ से बडे-बडे बलशालियों को स्पष्ट संदेश देंने कभी कोई संकोच नहीं किया है क्योंकि भारतववर्ष की माटी महान है और उसके सपूत अदभुत सामर्थवान, जो स्वाभिमान की रक्षा करने में समर्थ भी है और सक्षम भी है।

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