स्वार्थ के सैलाब में सामर्थ का पुरूषार्थ कर्मलोक में जीवन की सिद्धता सृष्टि, सिद्धान्त अनुरूप सृजन में नैसर्गिक स्वभाव, सामर्थ, पुरूषार्थ में कत्र्तव्य निर्वहन की बाध्यता कालखण्ड अनुरूप कत्र्तव्य निर्वहन से कलंकित हो, कलफती मानवता

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
स्वयं के विधान और सृष्टि सिद्धान्त को विसार स्वयं की कृतज्ञता सृजन में सिद्ध करने नैसर्गिक स्वभाव विरूद्ध कत्र्तव्य निर्वहन लोक जीवन में कलंकित हो इस तरह से कलफेगा शायद ही मानव धर्म और सृष्टि सिद्धान्त में आस्था रख अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले मानव और महामानवों ने सपने में भी न सोचा होगा। स्वार्थ के मार्ग सामर्थ पुरूषार्थ अनुरूप कृतज्ञता की सिद्धता इस बात का प्रमाण है कि हम महान विरासत के उत्तराधिकारी, मानव धर्म को सर्वोच्च मानने वाले महान मानवों के वंशज स्वयं के जीवन की सिद्धता सिद्ध करने किस कर्मलोक के सहभागी और साक्षी बन चुके है। तार-तार महान संस्कृति, संस्कारों का कफन दफन धारण कर किस संस्कृति, संस्कारों को जाने-अनजाने एवं स्वार्थवत अंगीकार कर चुके है। समाज का तन ढकने जिस संस्कृति, संस्कारों के वस्त्र आज सभ्य मानवता के अंग वस्त्र बन चुके है वह उस महान संस्कृति, संस्कार, विरासत ही नहीं मानव धर्म, मानवता व जीवन के भविष्य को डराने काफी है। फिर मौजूद स्वार्थवत संस्कृति, संस्कारों का प्रदत्त हस्तक्षेप उसकी कृतज्ञता सृष्टि सृजन में प्रकृति जल-थल, नभचर हो या फिर मानव समाज में हो या फिर सृष्टि की अनमोल कृति मानव जीवन के कृतज्ञ क्षेत्र समाज राजनीति, अर्थ, शिक्षा, सत्ता हो। सभी दूर अप्रमाणिक तौर पर स्वार्थवत सैलाब का सन्नाटा खिचा पडा है। हो सकता है मौजूद मानवता समृद्ध खुशहाल जीवन की खातिर इस सत्य को असत्य या सिर्फ आध्यात्म मान खारिज कर दें और स्वयं की कृतज्ञता के आगे इसे सिर्फ कल्पना मात्र समझे। मगर आज नहीं तो कल इस सत्य पर विचार अवश्य मानव जीवन के लिए और मानव धर्म की रक्षा के लिए बाध्यकारी सिद्ध हो सकता है। मगर लगता नहीं कि जो समाज स्वार्थ के अश्व पर सवार अपनी महत्वकांक्षाओं की पताका फहरा अपनी स्थिति अनुसार अपना-अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहते है वह इस सत्य को कभी अंगीकार या फिर कर सके। मगर इसे आज मानव जीवन के संचालन और सिद्धता का सबसे सहज मार्ग शायद ही कोई मानव धर्म में आस्था रखने वाला स्वीकार्य करें। क्योंकि जिस रास्ते आज सेवा कल्याण और सियासी पिरोधाओं के साथ संस्थागत सिपहसालार कंधे से कंधा मिला स्वयं के साम्राज्य और सिद्धता के लिए आतुर दिख रहे है उसे देखकर नहीं लगता कि वर्तमान में जीने की आदत और तत्काल नफा-नुकसान का स्वभाव धारण कर चुकी मानवता इस सत्य को स्वीकार्य करें। क्योंकि अब वह जाने अनजाने में आध्यात्म छोड जीवन निर्वहन में विज्ञान का पिचलग्गु बन समृद्ध खुशहाल जीवन की ओर अग्रसर है। 
जय स्वराज 

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