प्रभारियों के भार से, थर्राती प्रशासनिक व्यवस्था म.प्र. विधुत वितरण कंपनी को लेकर उठे सवाल
वीरेन्द्र शर्मा
म.प्र. भोपाल। अगर खबरों की माने तो विगत वर्षो से व्यवस्था को चलायमान रखने प्रभारी संस्कृति का जो प्रार्दुभाव प्रशासनिक व्यवस्था में पनपा है उसके भार को देखते हुये व्यवस्था ही नहीं समूचा सेवा कल्याण विकास थर्राया हुआ है। बैवस सत्ता ने इस समस्या से निवटने निचले स्तर पर कार्य के सुचारू संचालन और सेवा कल्याण विकास की चमक अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने संविदा आधार या फिर अनुबंध के आधार पर व्यवस्थायें चाकचैबंद कर छोडी है। मगर आला स्तर पर विधि सम्वत पदौन्नति के मार्ग में खडी अडचनों के मद्देनजर प्रभारी व्यवस्था का सहारा लिया गया। जैसे कि प्रशासनिक हल्को में आम चर्चा बनी रहती है। मगर सत्ता का यह फाॅरमूला सत्ता की अथवा तथाकथित मलाईकाटुओं के अपने स्वार्थपूर्ण करने के लिए दुधारू गाय साबित होती इस व्यवस्था और इस फाॅरमूले का जनहित में खुलकर उपयोग हो रहा है।
हालिया खबर मध्यक्षेत्र विधुत वितरण कंपनी के कारनामों को लेकर है। खबर है कि व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर प्रभारियों के सैलाब के बीच अब तो बात सीनियर-जूनियर को दरकिनार कर मनमानी तक आ पहुंची है। जिसमें सत्ता में रसूख रखने वाले लोग हो या सत्ता की सेवा में नस्तमस्तष्क बने रहने वाले लोग हो। अब इस खबर का सच क्या है यह तो खबर को पर लगाने वाले या फिर मध्यक्षेत्र विधुत वितरण कंपनी की कमान संभालने वाले ही जाने। अगर इस तरह की मनमानी विधि की आड में चल रही है तो इसे किसी भी व्यवस्था के लिए सुखद नहीं कहा जा सकता। जिस 24 घंटे बिजली उपलब्ध कराने की मंशा से सत्ता ने विधुत वितरण कंपनियों का गठन किया था आज आंखमचोली करती बिजली व्यवस्था को देखकर नहीं लगता कि सत्ता की मंशा सिद्ध होती दिखाई पडती है। देखना होगा कि व्यवस्था के नाम मचे कोहराम पर आखिर सत्ता कब और कैसे विराम लगा पाती है।
म.प्र. भोपाल। अगर खबरों की माने तो विगत वर्षो से व्यवस्था को चलायमान रखने प्रभारी संस्कृति का जो प्रार्दुभाव प्रशासनिक व्यवस्था में पनपा है उसके भार को देखते हुये व्यवस्था ही नहीं समूचा सेवा कल्याण विकास थर्राया हुआ है। बैवस सत्ता ने इस समस्या से निवटने निचले स्तर पर कार्य के सुचारू संचालन और सेवा कल्याण विकास की चमक अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने संविदा आधार या फिर अनुबंध के आधार पर व्यवस्थायें चाकचैबंद कर छोडी है। मगर आला स्तर पर विधि सम्वत पदौन्नति के मार्ग में खडी अडचनों के मद्देनजर प्रभारी व्यवस्था का सहारा लिया गया। जैसे कि प्रशासनिक हल्को में आम चर्चा बनी रहती है। मगर सत्ता का यह फाॅरमूला सत्ता की अथवा तथाकथित मलाईकाटुओं के अपने स्वार्थपूर्ण करने के लिए दुधारू गाय साबित होती इस व्यवस्था और इस फाॅरमूले का जनहित में खुलकर उपयोग हो रहा है। हालिया खबर मध्यक्षेत्र विधुत वितरण कंपनी के कारनामों को लेकर है। खबर है कि व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर प्रभारियों के सैलाब के बीच अब तो बात सीनियर-जूनियर को दरकिनार कर मनमानी तक आ पहुंची है। जिसमें सत्ता में रसूख रखने वाले लोग हो या सत्ता की सेवा में नस्तमस्तष्क बने रहने वाले लोग हो। अब इस खबर का सच क्या है यह तो खबर को पर लगाने वाले या फिर मध्यक्षेत्र विधुत वितरण कंपनी की कमान संभालने वाले ही जाने। अगर इस तरह की मनमानी विधि की आड में चल रही है तो इसे किसी भी व्यवस्था के लिए सुखद नहीं कहा जा सकता। जिस 24 घंटे बिजली उपलब्ध कराने की मंशा से सत्ता ने विधुत वितरण कंपनियों का गठन किया था आज आंखमचोली करती बिजली व्यवस्था को देखकर नहीं लगता कि सत्ता की मंशा सिद्ध होती दिखाई पडती है। देखना होगा कि व्यवस्था के नाम मचे कोहराम पर आखिर सत्ता कब और कैसे विराम लगा पाती है।
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