विवेकहीनता की पराकाष्ठा नैतिकता को नौच उसे र्निवस्त करने पर आमदा, निकम्मा निर्णय शर्मनाक कृत्य पर सवाल करती संस्कृति नौनिहालों के जीवन से क्रूर मजाक
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
महान तपस्वनी, देवी अहिल्याबाई की महान कर्मस्थली मालवा में विश्व कन्याओं के हौम से उठी आग की ज्वाला की लपटों से भले ही असुर प्रवृति संहार केे शूल से झुलसने के बाद ज्वाला शान्त होने की जुगत में हो। मगर जिस तरह से कोरोना के कहर ने मालवा की कमर तोड रखी है वह किसी से छिपी नहीं। मगर मदमुग्ध अंतरमुखी परमानन्दियों का अहंकार आज जिस तरह से सर चढकर बोल रहा है वह आज की पीढी खासकर युवाओं को और विद्यवान सहित राष्ट्र व मानवतावादियों को समझने वाली बात होनी चाहिए। जिस तरह से दसवी-बारहवीं की शेष परीक्षा के नाम युवा पीढी की जान से खिलबाड की कोशिश हो रही है वह खतरनाक ही नहीं, किसी भी मानवीय समुदाय के साथ खिलबाड है।
आखिर कोई भी सत्ता इतनी क्रूर विवेकहीन, बेशर्म, लापरवाह कैसे हो सकती है। सेवा, कल्याण, सुरक्षा, विकास के नाम क्रूरतापूर्ण, विवेकहीन निर्णय खासकर दसवीं, बारहवीं शेष परीक्षा लिया जाना उसका प्रमाण है जो ऐसे निर्णयों को प्रमाणिक रूप से सिद्ध करने काफी है।
वातानुकूलित कार्यस्थल या घरों में दुबक कत्र्तव्य विमुखता की प्रमाणिक मिशाल अपने निर्णयों से प्रस्तुत करने वाले बैठक, वीडियों काॅन्फ्रेंस से अपना कत्र्तव्य निर्वहन निष्ठापूर्ण सिद्ध करने वालो को पता होना चाहिए कि जिस शहर में बैठ वह दसवी, बारहवीं की शेष परीक्षा कराने का निर्णय ले रहे है उस शहर में ही नहीं प्रदेश के अन्य शहरों में भी थोकबंद कोरोना संक्रमितों के मामले हर रोज बढ रहे है फिर वह मालवा निमाण से लेकर बघेल, बुंदेलखण्ड, भिण्ड, चम्बल, ग्वालियर का क्षेत्र हो या कोरोना विस्फोट की श्रेणी में गिने जाने वाला म.प्र. का इन्दौर, भोपाल जैसा शहर हो। मगर अपने कत्र्तव्य निर्वहन के नाम मोटे-मोटे वेतन भत्ते लें, अपने विवेकहीन निर्णयों से आमजन को अचंभित व अंधभक्तों को वैचेन कर, बच्चों के माता-पिता को संकट में डालने वाले हो, यह आशा-आकांक्षा और म.प्र. के युवा भविष्यों के साथ निर्णयकत्र्ताओं का क्रूर मजाक ही कहा जायेगा। बेहतर होता कि दो माह से घरों में बंद मानवता के लिए त्याग तपस्या और कठिन समय गुजारने वालो को ढांढस बंधाने घरों में दुबके निर्णयकर्ता घरों से बाहर निकल गांव, गलियों में हाल जानने जाते और बेजान पडी चिकित्सीय सेवा एवं संसाधनों के आभाव राशन, पानी, रोजगार से बेहाल लोगों की सेवा कल्याण के प्रति अपनी निष्ठा दिखाते।
कहते है बच्चे सभी के लिए अमूल्य होते है जिसके लिए वह हाड-तोड मेहनत कर जान जोखिम डालने में भी पीछे नहीं हटते। मगर उन्हीं बच्चों की जान को परीक्षा कराने के जुनून और तुकलगी आदेश से अचंभित करने वाले निर्णयकर्ताओं के बच्चे हो सकता है साधन संपन्न होने के साथ विदेशों में या सीबीएससी जैसे शिक्षण संस्थानों में पढ रहे हो। मगर बच्चें तो बच्चे होते है फिर वह किसी बैवस, मजबूर लोगों के हो या साधन संपन्न व्यक्तियों के।
मगर दुर्भाग्य कि जिस भूभाग पर मूकदर्शक, बैवस, मजबूर और स्वस्थ शरीर के साथ स्वस्थ मुंह मस्तिष्क, आंख, नाक, कान, हाथ, पैर होने के बावजूद बैवस अपंगों तथा अंधभक्तों की भीड हो वहां ऐसे आदूरर्शी विवेकहीन क्रूर निर्णयों का होना स्वभाविक है जो किसी भी मानवीय सभ्यता के लिये शर्मनाक और दर्दनाक होना चाहिए।
मगर क्या करें आज के सियासी मैदान में न तो पांडवों की तरह धर्म ध्वजा उठा, त्याग कल्याण करने वाला पांडु पुत्रों की तरह कोई धर्मराज, युधिष्ठर बनना चाहता है और न ही फिलहाल दिख रहा है और न ही कौरवों की सभा की तरह दुर्योपति की लाज बचाने वाला कोई कृष्ण की तरह दिख रहा। अगर यो कहें कि आज मानवता की रक्षा के नाम नैतिकता को नौच उसे र्निवस्त करने पर उतारू दुशासनों का जमखट लोकतंत्र की इस बैवस सभा में जुटा है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। हे राम।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
महान तपस्वनी, देवी अहिल्याबाई की महान कर्मस्थली मालवा में विश्व कन्याओं के हौम से उठी आग की ज्वाला की लपटों से भले ही असुर प्रवृति संहार केे शूल से झुलसने के बाद ज्वाला शान्त होने की जुगत में हो। मगर जिस तरह से कोरोना के कहर ने मालवा की कमर तोड रखी है वह किसी से छिपी नहीं। मगर मदमुग्ध अंतरमुखी परमानन्दियों का अहंकार आज जिस तरह से सर चढकर बोल रहा है वह आज की पीढी खासकर युवाओं को और विद्यवान सहित राष्ट्र व मानवतावादियों को समझने वाली बात होनी चाहिए। जिस तरह से दसवी-बारहवीं की शेष परीक्षा के नाम युवा पीढी की जान से खिलबाड की कोशिश हो रही है वह खतरनाक ही नहीं, किसी भी मानवीय समुदाय के साथ खिलबाड है। आखिर कोई भी सत्ता इतनी क्रूर विवेकहीन, बेशर्म, लापरवाह कैसे हो सकती है। सेवा, कल्याण, सुरक्षा, विकास के नाम क्रूरतापूर्ण, विवेकहीन निर्णय खासकर दसवीं, बारहवीं शेष परीक्षा लिया जाना उसका प्रमाण है जो ऐसे निर्णयों को प्रमाणिक रूप से सिद्ध करने काफी है।
वातानुकूलित कार्यस्थल या घरों में दुबक कत्र्तव्य विमुखता की प्रमाणिक मिशाल अपने निर्णयों से प्रस्तुत करने वाले बैठक, वीडियों काॅन्फ्रेंस से अपना कत्र्तव्य निर्वहन निष्ठापूर्ण सिद्ध करने वालो को पता होना चाहिए कि जिस शहर में बैठ वह दसवी, बारहवीं की शेष परीक्षा कराने का निर्णय ले रहे है उस शहर में ही नहीं प्रदेश के अन्य शहरों में भी थोकबंद कोरोना संक्रमितों के मामले हर रोज बढ रहे है फिर वह मालवा निमाण से लेकर बघेल, बुंदेलखण्ड, भिण्ड, चम्बल, ग्वालियर का क्षेत्र हो या कोरोना विस्फोट की श्रेणी में गिने जाने वाला म.प्र. का इन्दौर, भोपाल जैसा शहर हो। मगर अपने कत्र्तव्य निर्वहन के नाम मोटे-मोटे वेतन भत्ते लें, अपने विवेकहीन निर्णयों से आमजन को अचंभित व अंधभक्तों को वैचेन कर, बच्चों के माता-पिता को संकट में डालने वाले हो, यह आशा-आकांक्षा और म.प्र. के युवा भविष्यों के साथ निर्णयकत्र्ताओं का क्रूर मजाक ही कहा जायेगा। बेहतर होता कि दो माह से घरों में बंद मानवता के लिए त्याग तपस्या और कठिन समय गुजारने वालो को ढांढस बंधाने घरों में दुबके निर्णयकर्ता घरों से बाहर निकल गांव, गलियों में हाल जानने जाते और बेजान पडी चिकित्सीय सेवा एवं संसाधनों के आभाव राशन, पानी, रोजगार से बेहाल लोगों की सेवा कल्याण के प्रति अपनी निष्ठा दिखाते।
कहते है बच्चे सभी के लिए अमूल्य होते है जिसके लिए वह हाड-तोड मेहनत कर जान जोखिम डालने में भी पीछे नहीं हटते। मगर उन्हीं बच्चों की जान को परीक्षा कराने के जुनून और तुकलगी आदेश से अचंभित करने वाले निर्णयकर्ताओं के बच्चे हो सकता है साधन संपन्न होने के साथ विदेशों में या सीबीएससी जैसे शिक्षण संस्थानों में पढ रहे हो। मगर बच्चें तो बच्चे होते है फिर वह किसी बैवस, मजबूर लोगों के हो या साधन संपन्न व्यक्तियों के।
मगर दुर्भाग्य कि जिस भूभाग पर मूकदर्शक, बैवस, मजबूर और स्वस्थ शरीर के साथ स्वस्थ मुंह मस्तिष्क, आंख, नाक, कान, हाथ, पैर होने के बावजूद बैवस अपंगों तथा अंधभक्तों की भीड हो वहां ऐसे आदूरर्शी विवेकहीन क्रूर निर्णयों का होना स्वभाविक है जो किसी भी मानवीय सभ्यता के लिये शर्मनाक और दर्दनाक होना चाहिए।
मगर क्या करें आज के सियासी मैदान में न तो पांडवों की तरह धर्म ध्वजा उठा, त्याग कल्याण करने वाला पांडु पुत्रों की तरह कोई धर्मराज, युधिष्ठर बनना चाहता है और न ही फिलहाल दिख रहा है और न ही कौरवों की सभा की तरह दुर्योपति की लाज बचाने वाला कोई कृष्ण की तरह दिख रहा। अगर यो कहें कि आज मानवता की रक्षा के नाम नैतिकता को नौच उसे र्निवस्त करने पर उतारू दुशासनों का जमखट लोकतंत्र की इस बैवस सभा में जुटा है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। हे राम।
जय स्वराज
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