अपहत होता लोकतंत्र कलफती आशा-आकांक्षायें सेवा कल्याण का मातम मनाने मजबूर
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
ये अलग बात है कि करोडो के लेनदेन की चर्चाऐं आजकल सियासी गलियारों और समाचार पत्रों की सुर्खियां बनी रहती है उसे देखकर तो सिर्फ यहीं कहा जा सकता है कि सियासत के नाम गैंग गिरोह मंे तब्दील सियासी लोगों का हुजूम सेवा कल्याण के लिए अब सत्ता चाहता है फिर उसकी तथाकथित कीमत जो भी हो। हालिया तौर पर जिस तरह के आरोप मालवा के एक चुने हुये विधायक ने सत्ताधारी दल पर सौ करोड की राशि को लेकर लगाये है और जिस तरह के आरोप पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा विधायकों की होर्सट्रेडिंग को लेकर खुलेआम लगाये है उनकी सच्चाई क्या है यह तो सत्ताधारी दल और विपक्षी दल ही जाने। मगर जब जनता द्वारा चुने हुये विधायक सार्वजनिक तौर पर इस तरह के आरोप लगा रहे है तो ऐसे आरोपों पर आमजन के बीच विचार अवश्य होना चाहिए और जिम्मेदार सियासी दलों को भी अपना पक्ष लोकतंत्र में स्पष्ट करना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में जनता जनसेवकों को अपने समृद्ध खुशहाल जीवन की आशा-आकांक्षा के साथ मतदान करती है। अगर करोडों की खरीद-फरोद के आरोप अगर समाचार पत्रों की खबर बनते है तो यह लोकतंत्र के लिए शुभसंकेत नहीं कहे जा सकते। बैसे भी अब आमजन जिस मनह स्थिति से इस कोरोनाकाल में दो-चार हुआ है उसके मन मस्तिष्क में सेवा कल्याण को लेकर बडे सवाल है वह इन सवालों पर क्या जबाव देगी यह तो फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। मगर जिस तरह की फजीहत सत्ता के लिए लोकतंत्र की दिखाई सुनाई देती है वह भविष्य के लिए शुभसंकेत नहीं कहे जा सकते।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
ये अलग बात है कि करोडो के लेनदेन की चर्चाऐं आजकल सियासी गलियारों और समाचार पत्रों की सुर्खियां बनी रहती है उसे देखकर तो सिर्फ यहीं कहा जा सकता है कि सियासत के नाम गैंग गिरोह मंे तब्दील सियासी लोगों का हुजूम सेवा कल्याण के लिए अब सत्ता चाहता है फिर उसकी तथाकथित कीमत जो भी हो। हालिया तौर पर जिस तरह के आरोप मालवा के एक चुने हुये विधायक ने सत्ताधारी दल पर सौ करोड की राशि को लेकर लगाये है और जिस तरह के आरोप पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा विधायकों की होर्सट्रेडिंग को लेकर खुलेआम लगाये है उनकी सच्चाई क्या है यह तो सत्ताधारी दल और विपक्षी दल ही जाने। मगर जब जनता द्वारा चुने हुये विधायक सार्वजनिक तौर पर इस तरह के आरोप लगा रहे है तो ऐसे आरोपों पर आमजन के बीच विचार अवश्य होना चाहिए और जिम्मेदार सियासी दलों को भी अपना पक्ष लोकतंत्र में स्पष्ट करना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में जनता जनसेवकों को अपने समृद्ध खुशहाल जीवन की आशा-आकांक्षा के साथ मतदान करती है। अगर करोडों की खरीद-फरोद के आरोप अगर समाचार पत्रों की खबर बनते है तो यह लोकतंत्र के लिए शुभसंकेत नहीं कहे जा सकते। बैसे भी अब आमजन जिस मनह स्थिति से इस कोरोनाकाल में दो-चार हुआ है उसके मन मस्तिष्क में सेवा कल्याण को लेकर बडे सवाल है वह इन सवालों पर क्या जबाव देगी यह तो फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। मगर जिस तरह की फजीहत सत्ता के लिए लोकतंत्र की दिखाई सुनाई देती है वह भविष्य के लिए शुभसंकेत नहीं कहे जा सकते।

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