जंगली प्रवृति में तब्दील होता मानव जीवन, मानवता के लिए घातक बैवसी की लूट पर समाज और शासन की चुप्पी खतरनाक

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
यह सही है कि जिस संस्कृति को हमने समृद्धि खुशहाली की शान मान अपनी महान संस्कृति और विधान को त्याग अंगीकार किया। आज उसी कलंकित संस्कृति ने मानवीय जीवन को जंगली प्रवृति में तब्दील कर दिया। जहां जीवन का आधार किसी र्निबल के जीवन पर निर्भर होता है अर्थात जहां जिन्दा रहने हिंसक ही नहीं, बल्कि अहिंसक तौर पर जाने पहचाने वाले जीव भी अपने से कमजोर बैवस जीव का भखक्षण करने में पीछे नहीं रहते। हालिया प्रमाण कोरोनाकाल में जरूरत की चीजों पर हर स्तर पर जिस तरह से आदमखोर लूट व्यक्ति ने व्यक्ति की आर्थिक तौर पर की वह किसी भी सभ्य समाज को शर्मसार करने काफी है। जिस तरह से कोरोनाकाल में लोगों ने व्यापार के नाम जरूरत की चीजों को मुहैया कराने के नाम आपस में ही एक-दूसरे को आर्थिक तौर पर लूटा वह सभी के सामने है। बैवस सत्तायें भी सिर्फ आदेश-निर्देश निकालने तक ही सीमित रही। क्योंकि जिस तरह की लूट बैवसी के चलते शुरू हुई वह रोकी जा सकती थी मगर मौजूद सिस्टम में यह असंभव भी था। सो गली से लेकर गांव और गांव से लेकर बाजार तक आपस के ही चिरपरिचितों ने निर्धारित दर से अधिक दर पर बेचने में ही अपना भला सोचा और एक दूसरे को लूटते और लुटते रहे। हो सकता है कि यह अर्थयुग का दुष्प्रभाव या सदप्रभाव हो। क्योंकि जिस संस्कृति का आधार ही निर्जीव और र्निमम हो उससे जीवन व्यवहार की कल्पना करना बैमानी है। जिस तरह से जंगल में जंगल का राजा शेर हिंसक या अहिंसक जीव पर स्वयं का पेट भरने रहम नहीं करता और शेर का शिकार होता हिंसक जीव जब अपने से निर्मल जीव पर अपना जीवोत्पार्जन करने दया नहीं करता, ठीक उसी प्रकार आज मानवीय जीवन का आधार भले ही किसी की जान लेकर स्वयं को जिन्दा रखने का न हो। मगर जिस तरह से धन अकूत संपदा मानव के जिन्दा रहने का भाग बन चुकी है और जीवोत्पार्जन का आधार। अगर ऐसे में बैवस मजबूरी लुटती हो या उसकी आशा-आकांक्षायें धन के लिये आदमखोर लोगों के हाथों लुटती हो और किसी को कोई फर्क नहीं पडता हो। फिर चाहे गली की गली में वस्तु विक्रय के नाम आर्थिक लूट हो या फिर गली में बेचने वाले की किसी बडे बाजार थोक विक्रयकर्ता निर्माणकर्ता के हाथों आर्थिक लूट हो। सभी एक दूसरे को उसकी बैवसी का लाभ उठा आर्थिक रूप से नौंच लेना चाहते है। बहरहाल हो सकता है कि समाज का और सत्ताओं का यह व्यवहारिक सच सिद्ध रूप से प्रमाणिक न हो। मगर इसकी अनुभूति अवश्य देखी और मेहसूस की जा सकती है। जिस तरह से जंगल में किसी र्निबल जीव के शिकार पर अन्य जीव बैवसी भरे अंदाज में उसे मरते दम तक देखने के सिवा कुछ नहीं कर पाते। उसी भूमिका में आज जब आम उपभोक्ता की आर्थिक लूट सरेयाम होती है तो जिम्मेदार भी बैवसी भरे अंदाज में देखते सुनते रह जाते है। बहरहाल अगर यहीं हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मानवता इंसानियत जैसे शब्द मानव समाज के लिये दूर की कोणी साबित हो जायेंगे। 
जय स्वराज 

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