पुरूषार्थ की पीडा और सामर्थ की र्दुदशा में दम तोडती आशा-आकांक्षायें जबावदेह मुक्त कत्र्तव्य निर्वहन का दंश भोगती मानवता

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।  
जिस तरह से वर्तमान संस्कृति में भिन्न-भिन्न संस्कारों का प्रार्दुभाव हो रहा है और जिस तरह से प्रतिभा पुरूषार्थी अवसरों के आभाव में दम तोडने पर मजबूर है। ऐसे में कलफती आशा-आकांक्षायें बैवस मजबूर है अपने समृद्ध खुशहाल जीवन के भविष्य को लेकर। ये अलग बात है कि सत्ताओं की अपनी कोशिशे है और सत्ताओं के मातहतों के अपने प्रयास। मगर परिणामों का आभाव यह स्पष्ट करने काफी है कि पुरूषार्थ पूरे मनोयोग से नहीं हो पा रहा है। बेहतर हो सत्ता, संस्थायें बेहतर समन्वय के साथ अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्यों का निर्वहन सामूहिक तौर पर करने में सक्षम-सफल साबित हो, जिससे पीडित वंचित प्रतिभा और आशा-आकांक्षायें अपने सामर्थ अनुसार पुरूषार्थ का प्रदर्शन कर अपना योगदान समृद्ध खुशहाल समाज और राष्ट्र निर्माण में दे सके, आज यहीं समझने वाली बात होनी चाहिए।  

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