राजस्व उजाड में जुटा आबकारी महकमा शासकीय राजस्व हुआ निढाल
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
म.प्र. भोपाल। ये अलग बात है कि म.प्र. के शिवपुरी जिले में ठेकेदार द्वारा ठेका छोडने पश्चात पुनः जिले की 33 समूह के निष्पादन का कार्य अभी भी प्रचलित हो। मगर जिस तरह से पूर्व निर्धारित दर से 20 प्रतिशत कम की दर पर दुकानें बांटी जा रही है। भले ही वह एक निर्धारित प्रक्रिया के अधीन हो, जिसमें सात दिवस की व्यवस्था ठेका चलाने उसके बाद ई-टेडरिंग प्रक्रिया की व्यवस्था की गई हो। मगर आनन-फानन में शासन द्वारा जिस तरह से 9 माह पुराने जिला आबकारी अधिकारी को हटा नये जिला आबकारी अधिकारी को शिवपुरी स्थानानांतरित किया गया उसकों लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।
जानकारी के आभाव में अगर अपुष्ट सूत्रों की माने तो यह तब्दीली सत्ताधारी दल के किसी नेता के इशारे पर की गई है जब यथास्थिति जानने आज जब विलेज टाइम्स ने जिला आबकारी अधिकारी से यथास्थिति जानने सम्पर्क करना चाहा, तो सम्पर्क के आभाव में सूत्रों ने बताया कि आनन-फानन में जिस तरह से शासन के राजस्व को पलीता लगाने की तैयारी गुपचुप तरीके से की जा रही है। अगर योजना कामयाब रही तो शासन को करोडो की चपत लगना तय है। बहरहाल सच क्या है यह तो आबकारी महकमा और सरकार ही जाने। मगर यक्ष सवाल यह है कि 20 प्रतिशत निर्धारित दर से कम पर दुकानें देनी ही थी तो पूर्व ठेकेदारों की मांग को शासन द्वारा क्यों अस्वीकार्य किया गया। देखना होगा कि शेष बची दुकानों से आबकारी महकमा कितना राजस्व कमा पाता है।
म.प्र. भोपाल। ये अलग बात है कि म.प्र. के शिवपुरी जिले में ठेकेदार द्वारा ठेका छोडने पश्चात पुनः जिले की 33 समूह के निष्पादन का कार्य अभी भी प्रचलित हो। मगर जिस तरह से पूर्व निर्धारित दर से 20 प्रतिशत कम की दर पर दुकानें बांटी जा रही है। भले ही वह एक निर्धारित प्रक्रिया के अधीन हो, जिसमें सात दिवस की व्यवस्था ठेका चलाने उसके बाद ई-टेडरिंग प्रक्रिया की व्यवस्था की गई हो। मगर आनन-फानन में शासन द्वारा जिस तरह से 9 माह पुराने जिला आबकारी अधिकारी को हटा नये जिला आबकारी अधिकारी को शिवपुरी स्थानानांतरित किया गया उसकों लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। जानकारी के आभाव में अगर अपुष्ट सूत्रों की माने तो यह तब्दीली सत्ताधारी दल के किसी नेता के इशारे पर की गई है जब यथास्थिति जानने आज जब विलेज टाइम्स ने जिला आबकारी अधिकारी से यथास्थिति जानने सम्पर्क करना चाहा, तो सम्पर्क के आभाव में सूत्रों ने बताया कि आनन-फानन में जिस तरह से शासन के राजस्व को पलीता लगाने की तैयारी गुपचुप तरीके से की जा रही है। अगर योजना कामयाब रही तो शासन को करोडो की चपत लगना तय है। बहरहाल सच क्या है यह तो आबकारी महकमा और सरकार ही जाने। मगर यक्ष सवाल यह है कि 20 प्रतिशत निर्धारित दर से कम पर दुकानें देनी ही थी तो पूर्व ठेकेदारों की मांग को शासन द्वारा क्यों अस्वीकार्य किया गया। देखना होगा कि शेष बची दुकानों से आबकारी महकमा कितना राजस्व कमा पाता है।
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