जान-जहान से संतुलन बैठाती मानवीय सभ्यता लाखों में दर्ज संक्रमितों के आंकडे खतरनाक
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जान-जहान की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बीच बढते कोरोना संक्रमितों के आंकडे भले ही खतरनाक हो, मगर वर्तमान का सत्य यहीं है। कहते है कि अगर निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन का मार्ग मौजूद संस्कृति से दूर न हुआ होता तो जहान बचाने के चक्कर जान को जोखिम में नहीं डालना पडता। कहते है कि सत्य को वह सिद्ध कान ही सुन पाते है और वह सिद्ध मस्ष्तिक ही समझ पाते है मगर जब-जब जिस-जिस कालखण्ड में सत्य सुनने और समझने वालों का आभाव रहा उस सभ्यता को विनाश का मुंह अवश्य देखना पडा। बात सिस्टम और संसाधनों की नहीं बात है निष्ठापूर्ण जबावदेह कत्र्तव्य निर्वहन की। जिसकी अपेक्षा समृद्धि और खुशहाल जीवन को हर उस व्यवस्था के अंग से होती है जिसका अस्तित्व मानवीय जीवन की सुरक्षा पर निर्भर करता है। कोरोना जैसे महासंकट का भी समाधान सहज हो सकता था मगर लगता है कि सत्य को सुनने समझने वालों का इस महासंकट में भी अकाल-सा है। बरना यह सत्य है कि जीवन को जीवोत्पार्जन के साधन और जीवन में संस्कारों के निष्ठापूर्ण निर्वहन की आवश्यकता होती है जो किसी भी काल में जीवन को सुरक्षित रखने सिद्धहस्त प्राप्त होते है। सत्ताओं और समाज की कालखण्ड अनुसार अपनी बैवसी, मजबूरी हो सकती है। मगर निदान न हो ऐसा असंभव ही है। मगर जो मानवीय सभ्यता या सत्तायें जीवन निर्वहन के जीवन मूल्यों से इतर जीवंत समृद्ध खुशहाल बनाने के सपने देखती है वह न तो कभी सफल होती है और न ही सिद्ध। कारण वर्तमान शिक्षा से जन्मी संस्कृति, संस्कार की समझ और संस्कारिक स्वरूप जब स्वयं निर्जीव हो, तो ऐेसे में सृजन की कल्पना बैमानी हो जाती है। काश हम स्वयं के स्वार्थो से इतर अपने नैसर्गिक स्वभाव और सृष्टि, सृजन के सिद्धान्त पर विचार कर पाये।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जान-जहान की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बीच बढते कोरोना संक्रमितों के आंकडे भले ही खतरनाक हो, मगर वर्तमान का सत्य यहीं है। कहते है कि अगर निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन का मार्ग मौजूद संस्कृति से दूर न हुआ होता तो जहान बचाने के चक्कर जान को जोखिम में नहीं डालना पडता। कहते है कि सत्य को वह सिद्ध कान ही सुन पाते है और वह सिद्ध मस्ष्तिक ही समझ पाते है मगर जब-जब जिस-जिस कालखण्ड में सत्य सुनने और समझने वालों का आभाव रहा उस सभ्यता को विनाश का मुंह अवश्य देखना पडा। बात सिस्टम और संसाधनों की नहीं बात है निष्ठापूर्ण जबावदेह कत्र्तव्य निर्वहन की। जिसकी अपेक्षा समृद्धि और खुशहाल जीवन को हर उस व्यवस्था के अंग से होती है जिसका अस्तित्व मानवीय जीवन की सुरक्षा पर निर्भर करता है। कोरोना जैसे महासंकट का भी समाधान सहज हो सकता था मगर लगता है कि सत्य को सुनने समझने वालों का इस महासंकट में भी अकाल-सा है। बरना यह सत्य है कि जीवन को जीवोत्पार्जन के साधन और जीवन में संस्कारों के निष्ठापूर्ण निर्वहन की आवश्यकता होती है जो किसी भी काल में जीवन को सुरक्षित रखने सिद्धहस्त प्राप्त होते है। सत्ताओं और समाज की कालखण्ड अनुसार अपनी बैवसी, मजबूरी हो सकती है। मगर निदान न हो ऐसा असंभव ही है। मगर जो मानवीय सभ्यता या सत्तायें जीवन निर्वहन के जीवन मूल्यों से इतर जीवंत समृद्ध खुशहाल बनाने के सपने देखती है वह न तो कभी सफल होती है और न ही सिद्ध। कारण वर्तमान शिक्षा से जन्मी संस्कृति, संस्कार की समझ और संस्कारिक स्वरूप जब स्वयं निर्जीव हो, तो ऐेसे में सृजन की कल्पना बैमानी हो जाती है। काश हम स्वयं के स्वार्थो से इतर अपने नैसर्गिक स्वभाव और सृष्टि, सृजन के सिद्धान्त पर विचार कर पाये।

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