उपचुनाव से पूर्व बडे सियासी तोड-फोड की संभावना कांग्रेस और बीजेपी के अलावा अन्य प्रभावी दल हो सकते है प्रभावित
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
म.प्र. भोपाल। जिस तरह की सियासी हवा म.प्र. में होने वाले उपचुनाव को लेकर राजनैतिक हल्कों में चल रही है या तोड-फोड के सैलाव में जिस तरह से कांग्रेस अपनी सत्ता गवां चुकी है उसके जख्म भरने के बजाये और हरे होते दिखाई देते है। सवाल यहां किसी एक दल या नेता का नहीं, सवाल तो अब सियासी आस्थाओं का यक्ष है। कांग्रेस छोडकर जाने वालों के नाम और उनकी आस्था तो फिलहाल सभी के सामने है। मगर सर्वाधिक सशय के दायरे में फिलहाल बीजेपी या अन्य दल अधिक दिखाई देते है। अगर उपचुनाव से पूर्व कोई बडी जोड-तोड चंबल सहित मालवा में दिखे तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी।
मगर उन सियासी सिपहसालारों का क्या जो इस तोड-फोड के मंथन से निकलने वाले अमृत पर निगाह गढाये बैठे है। क्योंकि अब सियासी तोड-फोड से इतना तो सिद्ध है कि सेवा कल्याण के नाम अमृत हीरे-जवारत पद प्रतिष्ठा तो सभी चाहते है। मगर सच्ची सेवा कल्याण का जहर कोई नहीं पीना चाहता। देखना होगा कि सजग होती जनता और कोरोनाकाल में कलफते जनमानस के बीच अपने सियासी गणित में कौन सिद्ध हो पाता है। मगर अंदर खाने की अपुष्ट खबर को सही माने तो भाजपा को कुछ कद्दावर नेताओं की नाखुशी का सामना इस चुनाव में बडे नुकसान के रूप में देखना पडे तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। बैसे भी भाजपा को समझने वाले यदाकदा यह कहते सुने जा सकते है कि भाजपा में लोग आते तो अपनी मर्जी से है और जाने के लिए वह स्वतंत्र होते है। भाजपा जहां थी आज उससे सौ कदम आगे है स्वागत सभी का रहता है स्वयं को नेता सिद्ध करना व्यक्ति के स्वयं का कर्म होता है। बहरहाल कहते है कि सत्ता सियासत सेवा कल्याण के नाम जो कुछ करायें वह कम है। मगर स्वार्थवत संस्कृति में कौन स्वयं को स्थापित कर पाता है यह देखने वाली बात होगी।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
म.प्र. भोपाल। जिस तरह की सियासी हवा म.प्र. में होने वाले उपचुनाव को लेकर राजनैतिक हल्कों में चल रही है या तोड-फोड के सैलाव में जिस तरह से कांग्रेस अपनी सत्ता गवां चुकी है उसके जख्म भरने के बजाये और हरे होते दिखाई देते है। सवाल यहां किसी एक दल या नेता का नहीं, सवाल तो अब सियासी आस्थाओं का यक्ष है। कांग्रेस छोडकर जाने वालों के नाम और उनकी आस्था तो फिलहाल सभी के सामने है। मगर सर्वाधिक सशय के दायरे में फिलहाल बीजेपी या अन्य दल अधिक दिखाई देते है। अगर उपचुनाव से पूर्व कोई बडी जोड-तोड चंबल सहित मालवा में दिखे तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। मगर उन सियासी सिपहसालारों का क्या जो इस तोड-फोड के मंथन से निकलने वाले अमृत पर निगाह गढाये बैठे है। क्योंकि अब सियासी तोड-फोड से इतना तो सिद्ध है कि सेवा कल्याण के नाम अमृत हीरे-जवारत पद प्रतिष्ठा तो सभी चाहते है। मगर सच्ची सेवा कल्याण का जहर कोई नहीं पीना चाहता। देखना होगा कि सजग होती जनता और कोरोनाकाल में कलफते जनमानस के बीच अपने सियासी गणित में कौन सिद्ध हो पाता है। मगर अंदर खाने की अपुष्ट खबर को सही माने तो भाजपा को कुछ कद्दावर नेताओं की नाखुशी का सामना इस चुनाव में बडे नुकसान के रूप में देखना पडे तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। बैसे भी भाजपा को समझने वाले यदाकदा यह कहते सुने जा सकते है कि भाजपा में लोग आते तो अपनी मर्जी से है और जाने के लिए वह स्वतंत्र होते है। भाजपा जहां थी आज उससे सौ कदम आगे है स्वागत सभी का रहता है स्वयं को नेता सिद्ध करना व्यक्ति के स्वयं का कर्म होता है। बहरहाल कहते है कि सत्ता सियासत सेवा कल्याण के नाम जो कुछ करायें वह कम है। मगर स्वार्थवत संस्कृति में कौन स्वयं को स्थापित कर पाता है यह देखने वाली बात होगी।
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