जीवन से जूझती मानव सभ्यता कत्र्तव्य विमुखता की कीमत चुकाता समृद्ध समाज कृतज्ञता हुई कलंकित
व्ही.एस.भुल्लेविलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह से कोरोनाकाल महासंकट के दौरान मानवीय जीवन नष्ट होने पर बैवस मजबूर है और आये दिन विश्वभर ही नहीं भारतवर्ष में कोरोना से संक्रमित तथा कोरोना से मरने वालों की संख्या के आंकडे आये दिन नित-नये ढंग से मुखातिब हो रहे है इनका भविष्य और परिणाम क्या होगा यह भी फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। मगर संभावनाओं का क्या, जो बढती संक्रमितों की संख्या और मरने वाले लोगों के आंकडो को लेकर चमकदार संस्कृति को मुंह चिढाने में कतई संकोच नहीं करते। जिस तरह का भय कोरोना को लेकर लोगों के बीच व्याप्त होता जा रहा है उसने मानव विकास की जडे हिलाकर रख दी है। इतना ही नहीं जिस तरह से आये दिन प्राकृतिक आपदाओं, भूंकप, तूफान की आहटें हो रही है उसने मानव जीवन को भले ही अभी भी यह सोचने पर मजबूर न किया हो कि आखिर उसकी कृतज्ञता में कहां कमी रह गई या फिर कत्र्तव्य विमुखता का अंबार ऐसा लगा कि अब कत्र्तव्य निर्वहन भी कोरोनाकाल में अपंगों की भांति बैवस जान पडता है। मगर कहते है कि अशिक्षित और स्वयं की संस्कृति से दूर मानव स्वभाव का आचरण व्यवहार कितना क्रूर हो सकता है वह कोरोना जैसी महामारी के अस्तित्व में आने से स्पष्ट होता है।
काश मानव जीवन ने सत्य को आधार मान स्वराज को सृष्टि सृजन के सिद्धान्त अनुरूप समझने की कोशिश की होती, हो सकता है कि आज हमें यह दिन नहीं देखना पडता। क्योंकि कोरोना से संक्रमित लोगों की बढती संख्या और मौतों का आंकडा गलत नहीं हो सकता और कोरोना से लडने फिलहाल कोई ऐसी कारगार दवा अस्तित्व में नहीं, सिवाये सावधानी के यह बात मानव जगत को नहीं भूलना चाहिए। कहते है कि मानवीय जीवन संकट और समृद्धि की खान है जिसे शिक्षा और संस्कारों के बल पर ही सार्थक समृद्ध और सफल बनाया जा सकता है। कहते है सृष्टि सृजन में संतुलन जीवन का सिद्धान्त है। जब कभी भी जीवन असंतुलन की स्थितियां बनती है तो उसका असंभावित परिणाम मानव को अवश्य भोगना पडता है। इतिहास, धर्मग्रंथ इस बात के गवाह है कि अगर जीवन शिक्षित अनुशासित और सृष्टि सिद्धान्त अनुसार संस्कारवान न हो तो साधन कितने ही उत्तम क्यों न हो, उत्तम साध्य प्राप्ति और समृद्ध जीवन असंभव ही रहता है। काश आध्यात्म, विज्ञान को अलग-अलग व्याख्या करने वालों की उस अज्ञानता को हम समझ, ज्ञानकंुज से मानव जीवन को समृद्ध सुशोभित कर पाये, तो यह मानव जीवन की इस कोरोनाकाल में सबसे बडी सार्थकता और सफलता होगी। कहते है इस सृष्टि में कभी भी कुछ भी असंभव नहीं रहा और न ही भविष्य में असंभव होगा। बशर्ते निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन सृजन सिद्धान्त का पालन करता हो।
जय स्वराज
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