उन्माद का आतंक कत्र्तव्य तो कलंकित करती निष्ठा सिसकता शान्त समृद्ध भूभाग जबावदेही को मुंह चिढाता समृद्ध मानव समाज
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
विश्वभर में मौजूद भूभाग पर हर जीवन और जीवन से जुडी हर विधा की रक्षा समृद्धि सम्बर्धन से बडा शायद ही कोई धर्म या कर्म हो। जिसमें प्रकृति से लेकर वन पर्यावरण पशु-पक्षी, मानव जीवन, अगर यो कहें कि जल-थल, नवचर सभी का कल्याण समाहित है। जिनकी समृद्धि सुरक्षा संरक्षण का मूल आधार ही मानव का जबावदेह निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन है जो सृजन में एक प्रमाणिक स्वीकार्य सत्य भी है और हो सकता है। मगर जिस तरह से प्रकृति में जीवन की अनमोल समृद्ध कृति मानव जीवन निर्वहन में स्वार्थ उन्माद संस्कृति का शिकार हों, सिसकने पर बैवस मजबूर है वह कत्र्तव्य की निष्ठा को कलंकित करने काफी है।
कहते है कि उन्माद के आतंक से उम्मीद की किरण भले ही धुंधली हो और स्वार्थवत संस्कारों के बीच आशायें कलफती हो तथा गैंग गिरोहबंद होती मानव सभ्यता की भले ही अपनी-अपनी सभ्यता अनुसार कृति संस्कृति हो। मगर मानव कल्याण से विमुख होना किसी के सामर्थ की बात नहीं। आज जब समूचा विश्व कोरोना के महानसंकट से हलाक और वन पर्यावरण के साथ मानव जीवन को लेकर मानव हैरान-परेशान है। ऐसे में जबावदेह निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन की अनदेखी और उन्मादी संस्कृति मानव जीवन को कहां ले जाकर छोडेगी फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। अगर मानव सभ्यता ने आज भी अपने नैसर्गिक स्वभाव और सृष्टि में मौजूद प्राकृतिक संस्कृति, संस्कारों को आत्मसात कर जीवन निर्वहन का मार्ग दुरूस्त नहीं किया, तो आने वाले समय में मानवता को इससे भी अधिक दुरदिन देखना पडे तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
विश्वभर में मौजूद भूभाग पर हर जीवन और जीवन से जुडी हर विधा की रक्षा समृद्धि सम्बर्धन से बडा शायद ही कोई धर्म या कर्म हो। जिसमें प्रकृति से लेकर वन पर्यावरण पशु-पक्षी, मानव जीवन, अगर यो कहें कि जल-थल, नवचर सभी का कल्याण समाहित है। जिनकी समृद्धि सुरक्षा संरक्षण का मूल आधार ही मानव का जबावदेह निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन है जो सृजन में एक प्रमाणिक स्वीकार्य सत्य भी है और हो सकता है। मगर जिस तरह से प्रकृति में जीवन की अनमोल समृद्ध कृति मानव जीवन निर्वहन में स्वार्थ उन्माद संस्कृति का शिकार हों, सिसकने पर बैवस मजबूर है वह कत्र्तव्य की निष्ठा को कलंकित करने काफी है। कहते है कि उन्माद के आतंक से उम्मीद की किरण भले ही धुंधली हो और स्वार्थवत संस्कारों के बीच आशायें कलफती हो तथा गैंग गिरोहबंद होती मानव सभ्यता की भले ही अपनी-अपनी सभ्यता अनुसार कृति संस्कृति हो। मगर मानव कल्याण से विमुख होना किसी के सामर्थ की बात नहीं। आज जब समूचा विश्व कोरोना के महानसंकट से हलाक और वन पर्यावरण के साथ मानव जीवन को लेकर मानव हैरान-परेशान है। ऐसे में जबावदेह निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन की अनदेखी और उन्मादी संस्कृति मानव जीवन को कहां ले जाकर छोडेगी फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। अगर मानव सभ्यता ने आज भी अपने नैसर्गिक स्वभाव और सृष्टि में मौजूद प्राकृतिक संस्कृति, संस्कारों को आत्मसात कर जीवन निर्वहन का मार्ग दुरूस्त नहीं किया, तो आने वाले समय में मानवता को इससे भी अधिक दुरदिन देखना पडे तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी।
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