अमर होता भ्रष्टाचार दम तोडती वैद्यानिक व्यवस्थायें उगाई का अस्त्र बना अघोषित धन आभाव और कार्य मूल्यांकन
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह की हौज-पोज व्यवस्था ने संस्थाओं में अपनी गहरी जडे जमा ली है और जिस तरह से आम नागरिक बैवस मजबूर नजर आता है उसे देखकर तो सिर्फ यहीं कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था दूर की कोणी ही नहीं असंभव ही है जिसका मूल कारण संस्थाओं में सेवायें देने वालों का समयवद्ध मूल्यांकन का आभाव और अघोषित धन आभाव, यह दो प्रमुख महा दानव सेवा कल्याण के मार्ग में इतने बीभत्स सिद्ध हो रहे है सैकडो कानून समीक्षा और अंकेक्षण के बावजूद भी भ्रष्टाचार रूक पाना असंभव-सा जान पडता है। चाहे अधिकारी कर्मचारियों के जायज भुगतान हो या अन्य लाभ, सभी दूर अपना हक हासिल करने अप्रमाणिक तौर पर उस मार्ग से गुजरना पडता है जिसकी कभी उन्होंने कल्पना भी न की हो। मशीनरी पर प्रभावी होती सियासत ने सिस्टम की इस तरह से कमर तोड रखी है कि अब तो सेवक भी सेवा को अपना अधिकार और व्यवहारिक संवाद को अपना स्वाभिमान समझते है इस लोकतांत्रिक व्यवस्था की महा रस्सा-कसी से फिलहाल सभी हैरान-परेशान है मगर कोई भी जुबान तक खोलना नहीं चाहता। सभी पिस रहे है और अपने-अपने हकों से लुट रहे है समाधान कब प्राप्त होगा फिलहाल कोई भविष्याणी नहीं कर सकता, सभी स्वाभिमानी-सम्माजनक जीवन चाहते है। मगर भ्रष्टाचार का कलंक ऐसा है कि वह निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन को भी कलंकित करने से नहीं चूकता। देखना होगा कि सत्ता सियासत कब इन कलंकितों से मुक्ति का मार्ग प्रस्त कर पाते है।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह की हौज-पोज व्यवस्था ने संस्थाओं में अपनी गहरी जडे जमा ली है और जिस तरह से आम नागरिक बैवस मजबूर नजर आता है उसे देखकर तो सिर्फ यहीं कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था दूर की कोणी ही नहीं असंभव ही है जिसका मूल कारण संस्थाओं में सेवायें देने वालों का समयवद्ध मूल्यांकन का आभाव और अघोषित धन आभाव, यह दो प्रमुख महा दानव सेवा कल्याण के मार्ग में इतने बीभत्स सिद्ध हो रहे है सैकडो कानून समीक्षा और अंकेक्षण के बावजूद भी भ्रष्टाचार रूक पाना असंभव-सा जान पडता है। चाहे अधिकारी कर्मचारियों के जायज भुगतान हो या अन्य लाभ, सभी दूर अपना हक हासिल करने अप्रमाणिक तौर पर उस मार्ग से गुजरना पडता है जिसकी कभी उन्होंने कल्पना भी न की हो। मशीनरी पर प्रभावी होती सियासत ने सिस्टम की इस तरह से कमर तोड रखी है कि अब तो सेवक भी सेवा को अपना अधिकार और व्यवहारिक संवाद को अपना स्वाभिमान समझते है इस लोकतांत्रिक व्यवस्था की महा रस्सा-कसी से फिलहाल सभी हैरान-परेशान है मगर कोई भी जुबान तक खोलना नहीं चाहता। सभी पिस रहे है और अपने-अपने हकों से लुट रहे है समाधान कब प्राप्त होगा फिलहाल कोई भविष्याणी नहीं कर सकता, सभी स्वाभिमानी-सम्माजनक जीवन चाहते है। मगर भ्रष्टाचार का कलंक ऐसा है कि वह निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन को भी कलंकित करने से नहीं चूकता। देखना होगा कि सत्ता सियासत कब इन कलंकितों से मुक्ति का मार्ग प्रस्त कर पाते है।
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