सामर्थ की सत्ता और अनमोल संस्कृति........तीरंदाज ?

व्ही.एस.भुल्ले
भैया- भले ही म्हारी चुनाव चंदा पार्टी के महान गठन के मार्ग में म्हारी महान संस्कृति, संस्कार आडे आते हो। मगर म्हारा सियासी संस्कार और चमकदार संस्कृति की माने तो मने भी सत्ता सिंहासन तक पहुंच सकता हूं और हाथों-हाथ मुखिया बन उडन-खटोला में बैठ निष्ठापूर्ण सेवा कल्याण कर सकता हूं। मगर कै करूं काडू बोल्या कि इस मौजूद सियासत में अगर थारी चमकदार संस्कृति और सामर्थ की दिशा ठीक रही तो थारी पार्टी तो पार्टी हाथों-हाथ सिंहासन तक पहुंचने की चाबी मिल जायेगी। 
भैये- कै कोरोनाकाल में कै थारा भी दिमाग सर चढकर बोल रिया शै जो तने भी सत्ता के लिए अभी से अर्र-बर्र बक रिया शै। सबसे पहले तो हाथ सेनेट्राइज करके आ, फिर मुंह में मुसीका लगा मास्क चढा और थोडी दूरी बनाकर बात कर। बगैर संपर्क किये घरों में बैठ  नीति निर्देशों का पालन कर, जरूरत पडे तो घर पर ही बैठ, वीडियों काॅन्फ्रंेस से थारी पार्टी का मंसूबा व्यक्त कर, तब तो पार्टी-मार्टी तो छोड थारी भी चल जायेगी बरना अभी तो लाॅकडाउन के बाद अनलाॅकडाउन है ज्यादा सियासत चढी तो थारे बाप-दादों की झोपडी भी कोरोटाइन हो जायेगी कै थारे को मालूम कोणी कि महान कोरोना का आंकडा म्हारे देश में 4 लाख के पार जा पहुंचा है और प्रदेशों का संेसेक्स कोरोना को लेकर रोजाना अप-डाउन हो रहा है। इसलिए पहले कोरोना से बचाव कर फिर सत्ता सियासत की बात कर। 
भैया- तो कै म्हारे जैसे अदनंगे, भूखे चिन्नी पन्ने वाले का कोई मौलिक अधिकार नहीं, काडू तो बोल्या कै लोकतंत्र में सभी को बराबर का वोट देने और लेने का अधिकार होवे। मगर कै करूं अभी तक तो मने एक भी वोट हासिल नहीं किया, देता ही आ रहा हूं और जनता का जनता के लिए जनता द्वारा स्थापित शासन को समर्थन जुटाता आ रहा हूं। फिर भैया कोरोना का कहर तो टूट ही रहा था मुंए कलदार में खेलने वाले म्हारे पडोसी तो कै हुआ जो म्हारे को आंखे दिखा रहा है और अपने झूठे-सच्चे दावे म्हारी महान भूमि पर ठोके जा रहा है। 
भैये- ये थारे बस की बात नहीं, तने ठहरा साप्ताहिक काला-पीला विलेज टाइम्स स्वराज का शंख फूकने वाला, तू कै जाने आंतरिक बाहरी सियासत, जब थारे जैसे चित्रकार-पत्रकार अपनों के ही बीच बगैर किसी बडे मीडिया समूह के तमगे के कलंकित होते नहीं थकते है और थारे ही सत्तासीन, थारे जैसे चिन्दी-पन्ने वालों को तो कोणी भाव नहीं पूछते। ऐसे में तने देश-विदेश की बात छोड और गांव, गली की बात कर। 
भैया- तो कै म्हारी बात म्हारे ही महान लोकतंत्र में म्हारी समृद्ध अहंकारी सियासतों के चलते कोणी भर भी नहीं सुनी जायेगी।
भैये- अरे बावले जब म्हारे महान भूभाग पर म्हारे आराघ्य लोगों की त्याग-तपस्या समर्पण भाव को आध्यात्म और विलासता से भागवान मान चुके हो, तो ऐसे में थारी कहां चल पायेगी, मने तो लागे अगर थारी यहीं हरकते रही तो थारे लोकतांत्रिक अधिकार के साथ थारे मूल अधिकारों की मिट्टी भी बेभाव कुट जायेगी। 
भैया- मने समझ लिया थारा इसारा, मगर मने भी बता दूं कि म्हारा म्हारे ही महान लोकतंत्र में कुछ भी हो। मगर मने सत्य को जानू कि जो जीवन है अगर उसका प्रारंभ है तो उसका अंत भी है ये तो जीवन यात्रा है। फिर सुख-दुःख, समृद्धि, कंगाली जीवन मृत्यु भी तो जीवन के सत्य है। मगर मने इतना जाडू कि जितने भी इतिहास में महान सूरवीर, सम्राट हुए उनके किले-महल, जागिरों का अब कोई वारिश नहीं, सो भाया छोटा हो या बडा सभी को जबावदेहपूर्ण अपना-अपना कत्र्तव्य निर्वहन अवश्य करना चाहिए। कहते है कि कत्र्तव्यों का निर्वहन कर पाओगे तो कृतज्ञ कहलाओगे, चल गया तो जादू, चूक गये तो मौत, जीवन का प्रचार है।

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