विधि के विधान में उलझा बैवस इंसान.......तीरंदाज ?
व्ही.एस.भुल्ले
भैया- मने संविधान को अंगीकार कर सर्वकल्याण में जीवन निर्वहन करने वाला इंसान भी कभी इतना दुर्बल बैवस हो सकता है मने सपनें में भी न सोचा था ज्योई बाजरा खा-खाकर म्हारी पीढियां तो इंसानियत के बीच तर गई। मगर सरवती, काली मूंछ और सूखे मेवाओं की चटखरी के बीच मने न लागे कै म्हारा ये लोग तो दूर की कोणी परलोक भी सुधरने वाला है। अब मैं म्हारे विधान को माने या अंगीकार किये उस संविधान को मानू जो म्हारी मानवता की रक्षा की सम्पूर्ण गारंटी देवे। सुडा है म्हारे बाबा के राज में बुराई को निस्तानाबूत करने जमकर ठाहे-ठाहे और दाहे-दाहे का पुरूषार्थ चल रहा है और चुन-चुन कर परलोक जाने वालों का गेट पास कट रहा है। मगर मने तो बोल्यू कि म्हारा मौन प्रदेश भी किसी से पीछे न है इसलिये म्हारे महान मौन प्रदेश में बाबा महाकाल का दरबार सावन के पहले ही हप्ते शुरू हो, सज चुका है। काडू बोल्या भाया विधान की लीला से गढा इस दुनिया में आज तक कोई ऐसा पैदा नहीं हुआ और म्हारे महान प्रदेश का एक ही शासक विधि अनुसार हुआ जहां सबके साथ आज भी न्याय होता है। आखिर भाया सच क्या है एक तो बाबा महाकाल के पूरे एक माह तक लगने वाले दरबार जिसमें कईयों का फैसला होना है। दूसरा कोरोना का कहर जिसके भंडारे का परसाद समूचे मौन प्रदेश में सटडाउन खुलते ही पूरे निष्ठा ईमानदारी से बट रहा है आखिर ऐसे में कै होगा म्हारे जैसे दीन र्दुजनों का जो जीवन बचाने संघर्ष में जुटे है।
भैये- कै थारे को मालूम कोणी विधि अनुसार कोरोना भंडारे का बट रहा सदावृत सभी को बगैर किसी भेदभाव के बट रहा है। मगर पहला मौका सिर्फ उन्हीं को मिल रहा है जो विधि को भूल विधान का माखौल उडाने में लगे है। फिर म्हारे मुखिया ने भी तो म्हारे मौन प्रदेश में कोई काम से बेकार और पेट से भूखा न रहे इसलिये खजाना खोल रखा है। अब ऐसे में थारे जैसे मूडधन्य जीवन बचाने कलफ रहे है तो इसमें म्हारे मुखिया और म्हारे मौन प्रदेश की क्या गलती है।
भैया- कै थारे को मालूम कोणी कि चंद दिनों पहले ही ठाहे-ठाहे पुलिस ने दनादन दाहे-दाहे की है। सो मने तो ठीक से सुन भी नहीं पा रहा कि टी.व्ही. डिवेटों में कौन विधि अनुसार बोल रहा है और कौन विधान विरूद्ध।
भैये- तू विधि और विधान छोड, उपचुनावों में मयदल-बल के जुट जा और उपचुनावों के मैदान में कूद डब्लू-डब्लूएफ का पहलवान बन जा, इतने पर तो चल जायेगी, रही सही टिकट की जुगत तो मिलने वाली डब्लू-डब्लूएफ में राशि से थारी चुनाव चंदा पार्टी कम से कम विधि और विधान के लिए भाग्य तो आजमाएगी जिससे म्हारा महान संविधान और मरता इंसान समृद्ध खुशहाल हो सके।
भैया- मने समझ लिया थारा इसारा कि कुछ न होने वाला, सो मने तो सोचू कि ज्वारी बाजरा की पैदाइस इस पावन मास में बाबा महाकाल के लगे दरबार के दर्शन कर आ, अगर मौन प्रदेश के विधान अनुरूप संभव न हो तो ठाहे-ठाहे वालों के प्रदेश में सजे बाबा विश्वनाथ के दरबार ही हो आऊं और मां गंगे के दर्शन कर आचमन भी हाथों-हाथ कर आऊं, क्या पता इस काठी का कि विधि अनुसार इसे कहां कैसी व्यवस्था मिले और रही-सही अंतिम क्रिया पिंड दान की भी कोरोनाकाल के चलते न हो सके, इसलिए जीते-जिन्दा ही मां गंगे के दर्शन कर आऊं। बैसे मने लागे कि इस पावन श्रावण मास में बडे-बडे केश बाबा महाकाल के दरबार में सुलटने वाले और म्हारे जैसे नंगे-भूखों के दिन भी पलटने वाले है। बोल भैया कैसी रही। जय-जय श्रीराम।
भैया- मने संविधान को अंगीकार कर सर्वकल्याण में जीवन निर्वहन करने वाला इंसान भी कभी इतना दुर्बल बैवस हो सकता है मने सपनें में भी न सोचा था ज्योई बाजरा खा-खाकर म्हारी पीढियां तो इंसानियत के बीच तर गई। मगर सरवती, काली मूंछ और सूखे मेवाओं की चटखरी के बीच मने न लागे कै म्हारा ये लोग तो दूर की कोणी परलोक भी सुधरने वाला है। अब मैं म्हारे विधान को माने या अंगीकार किये उस संविधान को मानू जो म्हारी मानवता की रक्षा की सम्पूर्ण गारंटी देवे। सुडा है म्हारे बाबा के राज में बुराई को निस्तानाबूत करने जमकर ठाहे-ठाहे और दाहे-दाहे का पुरूषार्थ चल रहा है और चुन-चुन कर परलोक जाने वालों का गेट पास कट रहा है। मगर मने तो बोल्यू कि म्हारा मौन प्रदेश भी किसी से पीछे न है इसलिये म्हारे महान मौन प्रदेश में बाबा महाकाल का दरबार सावन के पहले ही हप्ते शुरू हो, सज चुका है। काडू बोल्या भाया विधान की लीला से गढा इस दुनिया में आज तक कोई ऐसा पैदा नहीं हुआ और म्हारे महान प्रदेश का एक ही शासक विधि अनुसार हुआ जहां सबके साथ आज भी न्याय होता है। आखिर भाया सच क्या है एक तो बाबा महाकाल के पूरे एक माह तक लगने वाले दरबार जिसमें कईयों का फैसला होना है। दूसरा कोरोना का कहर जिसके भंडारे का परसाद समूचे मौन प्रदेश में सटडाउन खुलते ही पूरे निष्ठा ईमानदारी से बट रहा है आखिर ऐसे में कै होगा म्हारे जैसे दीन र्दुजनों का जो जीवन बचाने संघर्ष में जुटे है। भैये- कै थारे को मालूम कोणी विधि अनुसार कोरोना भंडारे का बट रहा सदावृत सभी को बगैर किसी भेदभाव के बट रहा है। मगर पहला मौका सिर्फ उन्हीं को मिल रहा है जो विधि को भूल विधान का माखौल उडाने में लगे है। फिर म्हारे मुखिया ने भी तो म्हारे मौन प्रदेश में कोई काम से बेकार और पेट से भूखा न रहे इसलिये खजाना खोल रखा है। अब ऐसे में थारे जैसे मूडधन्य जीवन बचाने कलफ रहे है तो इसमें म्हारे मुखिया और म्हारे मौन प्रदेश की क्या गलती है।
भैया- कै थारे को मालूम कोणी कि चंद दिनों पहले ही ठाहे-ठाहे पुलिस ने दनादन दाहे-दाहे की है। सो मने तो ठीक से सुन भी नहीं पा रहा कि टी.व्ही. डिवेटों में कौन विधि अनुसार बोल रहा है और कौन विधान विरूद्ध।
भैये- तू विधि और विधान छोड, उपचुनावों में मयदल-बल के जुट जा और उपचुनावों के मैदान में कूद डब्लू-डब्लूएफ का पहलवान बन जा, इतने पर तो चल जायेगी, रही सही टिकट की जुगत तो मिलने वाली डब्लू-डब्लूएफ में राशि से थारी चुनाव चंदा पार्टी कम से कम विधि और विधान के लिए भाग्य तो आजमाएगी जिससे म्हारा महान संविधान और मरता इंसान समृद्ध खुशहाल हो सके।
भैया- मने समझ लिया थारा इसारा कि कुछ न होने वाला, सो मने तो सोचू कि ज्वारी बाजरा की पैदाइस इस पावन मास में बाबा महाकाल के लगे दरबार के दर्शन कर आ, अगर मौन प्रदेश के विधान अनुरूप संभव न हो तो ठाहे-ठाहे वालों के प्रदेश में सजे बाबा विश्वनाथ के दरबार ही हो आऊं और मां गंगे के दर्शन कर आचमन भी हाथों-हाथ कर आऊं, क्या पता इस काठी का कि विधि अनुसार इसे कहां कैसी व्यवस्था मिले और रही-सही अंतिम क्रिया पिंड दान की भी कोरोनाकाल के चलते न हो सके, इसलिए जीते-जिन्दा ही मां गंगे के दर्शन कर आऊं। बैसे मने लागे कि इस पावन श्रावण मास में बडे-बडे केश बाबा महाकाल के दरबार में सुलटने वाले और म्हारे जैसे नंगे-भूखों के दिन भी पलटने वाले है। बोल भैया कैसी रही। जय-जय श्रीराम।
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