आजाद लोकतंत्र में, आजादी अपराध की राजनीति या राजनीति का अपहरण
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
राष्ट्र जो भी हो, मगर उसके सुनिश्चित विधि अनुरूप संचालन के लिए उसका अपना विधान या संविधान होता है जिसे अंगीकार मान हर नागरिक अपने समृद्ध, खुशहाल जीवन के सपने सजोने के साथ अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के माध्यम अपनी कृतज्ञता सिद्ध करने वैद्यानिक रूप से बाध्य भी होता है। फिर किसी भी राष्ट्र का विधान संविधान लिखित हो, या फिर अलिखित हो। मगर जिस तरह से हमारा लोकतंत्र सर्वकल्याण के लिए अपराधी सियासत का हामी औपचारिक-अनौपचारिक रूप से बनता जा रहा है उससे यह यक्ष सवाल अवश्य ज्वलंत जान पडता है कि हमारे लोकतंत्र में अपराध की राजनीति फल-फूल रही है या फिर लोकतंत्र और लोकतांत्रिक भावनाओं का अपहरण हो चुका है। अगर अपराध में रूचि रखने वाले संस्थाओं के आंकडे या फिर जब तब चर्चाओं में आने वाली सियासत में अपराध से आरोपित अपराधियों की भरमार और जब तब सामने आते सियासत के अपराधिक प्रमाण इस बात के गवाह है कि अब हमारी समूची सियासत को अपराध और अपराधियों ने कहीं न कहीं बडे स्तर पर प्रभावित कर रखा है जो आज हर जागरूक नागरिक को जानने-समझने वाली बात होना चाहिए। जो परिदृश्य लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थानों के नाम से प्रतिबिंबित होता दिखाई पडता है वह यह समझने काफी है कि कहीं न कहीं हमारे मजबूत लोकतंत्र की जडों में दीमक लग चुकी है। अगर वाक्य में ही राष्ट्र और सर्वकल्याण में विश्वास रखने वाले लोग लोकतंत्र और मानव सभ्यता का भला चाहते है तो तत्काल चुनाव पद्धति और प्रक्रिया में अविलंबित सुधार की आवश्यकता और उस शैक्षणिक विषय वस्तु और शैक्षणिक पद्धति में बदलाव की आवश्यकता है। जिससे राष्ट्र और समाज को सर्वकल्याण में आस्था रखने वाले जबावदेह लोग मिल सके और निर्णय लेते वक्त वह स्वयं को समृद्ध और सुरक्षित मेहसूस कर सके। जिससे उनके निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन की सिद्धता स्वतः सिद्ध हो सके। बरना अपराध और अपराधियों का क्या वह लोगों की आशा-आकांक्षाओं को तो स्वकल्याण की खातिर समय-समय पर तार-तार करेंगे ही और गैंग गिरोहबंद संस्कृति के आधार पर स्वयं को मजबूत बना लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं का मान-सम्मान और स्वाभिमान को नौच उसे अपमानित करने से भी नहीं चूकेंगें। कहते है कि मान-सम्मान स्वाभिमान अनुभूति और अभिव्यक्ति के विषय हो सकते है और सहर्ष स्वीकार्यता उनका पुरूस्कार, जो लोग बगैर आज के भ्रामक प्रचारों से इतर अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के साथ अपनी कृतज्ञता सर्वकल्याण को समर्पित करने तत्पर रहते है इतिहास उन्हीं को याद करता है और भविष्य ऐसे लोगों के स्वागत के लिए हमेशा तैयार रहता है। अब यह सुनिश्चित हर उस जागरूक मानव और उन संस्थाओं को करना है जिन्हें सृष्टि सृजन ने शारीरिक रूप से सक्षम समृद्ध बना सामर्थ अनुसार पुरूषार्थ करने के लिए भेजा है।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
राष्ट्र जो भी हो, मगर उसके सुनिश्चित विधि अनुरूप संचालन के लिए उसका अपना विधान या संविधान होता है जिसे अंगीकार मान हर नागरिक अपने समृद्ध, खुशहाल जीवन के सपने सजोने के साथ अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के माध्यम अपनी कृतज्ञता सिद्ध करने वैद्यानिक रूप से बाध्य भी होता है। फिर किसी भी राष्ट्र का विधान संविधान लिखित हो, या फिर अलिखित हो। मगर जिस तरह से हमारा लोकतंत्र सर्वकल्याण के लिए अपराधी सियासत का हामी औपचारिक-अनौपचारिक रूप से बनता जा रहा है उससे यह यक्ष सवाल अवश्य ज्वलंत जान पडता है कि हमारे लोकतंत्र में अपराध की राजनीति फल-फूल रही है या फिर लोकतंत्र और लोकतांत्रिक भावनाओं का अपहरण हो चुका है। अगर अपराध में रूचि रखने वाले संस्थाओं के आंकडे या फिर जब तब चर्चाओं में आने वाली सियासत में अपराध से आरोपित अपराधियों की भरमार और जब तब सामने आते सियासत के अपराधिक प्रमाण इस बात के गवाह है कि अब हमारी समूची सियासत को अपराध और अपराधियों ने कहीं न कहीं बडे स्तर पर प्रभावित कर रखा है जो आज हर जागरूक नागरिक को जानने-समझने वाली बात होना चाहिए। जो परिदृश्य लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थानों के नाम से प्रतिबिंबित होता दिखाई पडता है वह यह समझने काफी है कि कहीं न कहीं हमारे मजबूत लोकतंत्र की जडों में दीमक लग चुकी है। अगर वाक्य में ही राष्ट्र और सर्वकल्याण में विश्वास रखने वाले लोग लोकतंत्र और मानव सभ्यता का भला चाहते है तो तत्काल चुनाव पद्धति और प्रक्रिया में अविलंबित सुधार की आवश्यकता और उस शैक्षणिक विषय वस्तु और शैक्षणिक पद्धति में बदलाव की आवश्यकता है। जिससे राष्ट्र और समाज को सर्वकल्याण में आस्था रखने वाले जबावदेह लोग मिल सके और निर्णय लेते वक्त वह स्वयं को समृद्ध और सुरक्षित मेहसूस कर सके। जिससे उनके निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन की सिद्धता स्वतः सिद्ध हो सके। बरना अपराध और अपराधियों का क्या वह लोगों की आशा-आकांक्षाओं को तो स्वकल्याण की खातिर समय-समय पर तार-तार करेंगे ही और गैंग गिरोहबंद संस्कृति के आधार पर स्वयं को मजबूत बना लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं का मान-सम्मान और स्वाभिमान को नौच उसे अपमानित करने से भी नहीं चूकेंगें। कहते है कि मान-सम्मान स्वाभिमान अनुभूति और अभिव्यक्ति के विषय हो सकते है और सहर्ष स्वीकार्यता उनका पुरूस्कार, जो लोग बगैर आज के भ्रामक प्रचारों से इतर अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के साथ अपनी कृतज्ञता सर्वकल्याण को समर्पित करने तत्पर रहते है इतिहास उन्हीं को याद करता है और भविष्य ऐसे लोगों के स्वागत के लिए हमेशा तैयार रहता है। अब यह सुनिश्चित हर उस जागरूक मानव और उन संस्थाओं को करना है जिन्हें सृष्टि सृजन ने शारीरिक रूप से सक्षम समृद्ध बना सामर्थ अनुसार पुरूषार्थ करने के लिए भेजा है।

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