नाशाज राजा, नर्वस हकीम कोरोना विस्फोट से थर्रायी इंसानियत क्या चूक की चिताओं पर मातम मनाने बैवस होगा मानव
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह की भयाभय स्थिति कोरोना संक्रमण को लेकर उत्पन्न हो रही है हो सकता है राज सत्ता के हकीमों को अभी भी इसका स्पष्ट आभास न हो। मगर कोरोना का यथार्थ सत्य क्या है यह तो स्वयं कोरोना या फिर कोरोना की समझ रखने वाले उस्ताद ही जाने। मगर विश्वभर में कोरोना संक्रमण से बढती लोगों की संख्या और होती लाखों मौतों से इतना तो साफ है कि कुछ तो बीमारी है जिससे जीवन को सावधान रहने की आवश्यकता है। मगर प्रकृति के मस्ष्तिक या नर्वस सिस्टम कहे जाने वाले महान भारतवर्ष के भूभाग पर मानवीय जीवन की निडरता जो कोरोना को लेकर दिखाई देती है। वह कोरोनाकाल में भारतवर्ष की मानवीय समझ और जीवन की श्रेष्ठता समझने काफी है। अगर वर्तमान हालातों के मद्देनजर देखे तो लोकतंत्र में राजा की भूमिका में आम जनता जो अपने वोट और नोट की ताकत से सत्ताओं और सेवकों का निर्धारण करती है और उन्हें पोषित कर सर्वशक्तिमान बनाती है। आज जब मानव जीवन कोरोना के कहर से निढाल पडा है और विज्ञान तकनीक शिक्षा चारो-खाने चित पडी है तथा आध्यात्म सिर्फ आध्यात्म बनकर रह गया है। ऐसे में सैया पर अछेत पडा जीवन और नर्वस पडा उसका सिस्टम जीवन की कितनी रक्षा कर पायेगा यह कहना मुश्किल है। मगर यहां यक्ष सवाल फिर वहीं है कि क्या स्वार्थवत जीवन का लक्ष्य सर्वकल्याण से पोषित भूमि पर इतना सबल, सक्ष्म, शक्तिशाली हो सकता है जो निरीह जीवन की रक्षा की बिना पर आंखे बंद कर स्वयं के जीवन को स्वस्थ सफल और सुरक्षित मानने की भूल करे। क्या सत्ताओं और सेवकों की जमात में एक भी ऐसा समझ वाला व्यक्ति नहीं जो इस महान भूभाग को इस महासंकट से सुरक्षित बना पाता। आखिर ऐसी बैवसी क्यों है इस तंत्र की जिसका नाम तो लोकतंत्र है जो न तो स्वयं को जीवंत चलायमान प्रकृति अनुरूप स्वयं को रख पा रहा है और न ही लोक जन के जीवन की रक्षा में स्वयं को सिद्ध कर पा रहा है। देखा जाए तो अगर सत्तायें चाहती और जिस उदेश्य को लेकर वह पोषित और सर्वशक्तिमान के रूप में अस्तित्व में है जिनका आधार ही लोक जन की रक्षा है। अगर उन्होंने अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन मानव धर्म की रक्षा के लिए मौजूद शिक्षा के साक्षी, सत्ता स्वार्थ मोह से निकल सत्ता और सियासी दलों ने किया होता तो इस महान भूभाग को आज यह दिन नहीं देखना पडता। मगर क्या बैवसी है इनकी ये तो ये ही जाने जिस तरह से आज की सत्तायें नर्वस सिस्टम अपने-अपने स्वार्थ और अहंकार में डूब मानव धर्म की अनदेखी कर रही है इसके दुष्परिणाम समूचे मानवीय जीवन को बडा चुकाना पड सकता है।
अभी भी समय है अभी भी कुछ नहीं बिगडा, अगर सत्तायें चाहे तो एक माह के अंदर बडे पैमाने पर इस महामारी को कंट्रोल कर स्थिति को हाथों से निकलने से रोका जा सकता है। मगर लगता नहीं कि पैदा होते ही दोनो कान में विश्व के सबसे सुंदर मानव और सबसे विद्यवान जीवन के भ्रमपूर्ण स्वरो लोग बाहर निकल अपना नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप सृजन में कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले है। कहते है विवेक से बढकर कोई विधान नहीं और कर्म से बढकर कोई कल्याण नहीं। यहीं मानव जीवन का सार्थक सत्य है। प्रकृति में हर सवाल का उत्तर है और समस्या का समाधान। बशर्ते समझ रखने वाले समाज कल्याण में कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले लोग समृद्ध, खुशहाल स्वस्थ जीवन के लिए संकल्पित हो। कत्र्तव्यों के प्रति निष्ठ राजा, महामंत्री, मंत्री, सभाषद वह सार्थक सफल रहे है जिनके नाक कान और आंखों की पहुंच अंतिम पंक्ति में खडे व्यक्ति तक होती है। मगर दुर्भाग्य कि लोकतंत्र के नाम स्वार्थ तंत्र में तब्दील इस तंत्र की इंद्रियां ही मर चुकी है जो स्वयं के स्वार्थ के आगे न तो कुछ देखना चाहती है न ही सुनना और न ही समझना। ऐसे में आखिर कैसे मानव जीवन की रक्षा सुनिश्चित होगी आज की स्थिति में हर नागरिक को यहीं सबसे बडी समझने वाली बात होना चाहिए। कहते है कि जिन्हें अकल का अजीरण है वह उलझे धागों के झुण्ड को सुलझाने की विधि जान लें बडी से बडी समस्यायें समाधान हो जायेंगी और यह हुनर पतंग उडाने लंग्गढ लडाने वाले, हर उस बच्चे को ईश्वर प्रवत करता है जिसमें समझने और सुलझाने का जुनून हो।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह की भयाभय स्थिति कोरोना संक्रमण को लेकर उत्पन्न हो रही है हो सकता है राज सत्ता के हकीमों को अभी भी इसका स्पष्ट आभास न हो। मगर कोरोना का यथार्थ सत्य क्या है यह तो स्वयं कोरोना या फिर कोरोना की समझ रखने वाले उस्ताद ही जाने। मगर विश्वभर में कोरोना संक्रमण से बढती लोगों की संख्या और होती लाखों मौतों से इतना तो साफ है कि कुछ तो बीमारी है जिससे जीवन को सावधान रहने की आवश्यकता है। मगर प्रकृति के मस्ष्तिक या नर्वस सिस्टम कहे जाने वाले महान भारतवर्ष के भूभाग पर मानवीय जीवन की निडरता जो कोरोना को लेकर दिखाई देती है। वह कोरोनाकाल में भारतवर्ष की मानवीय समझ और जीवन की श्रेष्ठता समझने काफी है। अगर वर्तमान हालातों के मद्देनजर देखे तो लोकतंत्र में राजा की भूमिका में आम जनता जो अपने वोट और नोट की ताकत से सत्ताओं और सेवकों का निर्धारण करती है और उन्हें पोषित कर सर्वशक्तिमान बनाती है। आज जब मानव जीवन कोरोना के कहर से निढाल पडा है और विज्ञान तकनीक शिक्षा चारो-खाने चित पडी है तथा आध्यात्म सिर्फ आध्यात्म बनकर रह गया है। ऐसे में सैया पर अछेत पडा जीवन और नर्वस पडा उसका सिस्टम जीवन की कितनी रक्षा कर पायेगा यह कहना मुश्किल है। मगर यहां यक्ष सवाल फिर वहीं है कि क्या स्वार्थवत जीवन का लक्ष्य सर्वकल्याण से पोषित भूमि पर इतना सबल, सक्ष्म, शक्तिशाली हो सकता है जो निरीह जीवन की रक्षा की बिना पर आंखे बंद कर स्वयं के जीवन को स्वस्थ सफल और सुरक्षित मानने की भूल करे। क्या सत्ताओं और सेवकों की जमात में एक भी ऐसा समझ वाला व्यक्ति नहीं जो इस महान भूभाग को इस महासंकट से सुरक्षित बना पाता। आखिर ऐसी बैवसी क्यों है इस तंत्र की जिसका नाम तो लोकतंत्र है जो न तो स्वयं को जीवंत चलायमान प्रकृति अनुरूप स्वयं को रख पा रहा है और न ही लोक जन के जीवन की रक्षा में स्वयं को सिद्ध कर पा रहा है। देखा जाए तो अगर सत्तायें चाहती और जिस उदेश्य को लेकर वह पोषित और सर्वशक्तिमान के रूप में अस्तित्व में है जिनका आधार ही लोक जन की रक्षा है। अगर उन्होंने अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन मानव धर्म की रक्षा के लिए मौजूद शिक्षा के साक्षी, सत्ता स्वार्थ मोह से निकल सत्ता और सियासी दलों ने किया होता तो इस महान भूभाग को आज यह दिन नहीं देखना पडता। मगर क्या बैवसी है इनकी ये तो ये ही जाने जिस तरह से आज की सत्तायें नर्वस सिस्टम अपने-अपने स्वार्थ और अहंकार में डूब मानव धर्म की अनदेखी कर रही है इसके दुष्परिणाम समूचे मानवीय जीवन को बडा चुकाना पड सकता है। अभी भी समय है अभी भी कुछ नहीं बिगडा, अगर सत्तायें चाहे तो एक माह के अंदर बडे पैमाने पर इस महामारी को कंट्रोल कर स्थिति को हाथों से निकलने से रोका जा सकता है। मगर लगता नहीं कि पैदा होते ही दोनो कान में विश्व के सबसे सुंदर मानव और सबसे विद्यवान जीवन के भ्रमपूर्ण स्वरो लोग बाहर निकल अपना नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप सृजन में कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले है। कहते है विवेक से बढकर कोई विधान नहीं और कर्म से बढकर कोई कल्याण नहीं। यहीं मानव जीवन का सार्थक सत्य है। प्रकृति में हर सवाल का उत्तर है और समस्या का समाधान। बशर्ते समझ रखने वाले समाज कल्याण में कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले लोग समृद्ध, खुशहाल स्वस्थ जीवन के लिए संकल्पित हो। कत्र्तव्यों के प्रति निष्ठ राजा, महामंत्री, मंत्री, सभाषद वह सार्थक सफल रहे है जिनके नाक कान और आंखों की पहुंच अंतिम पंक्ति में खडे व्यक्ति तक होती है। मगर दुर्भाग्य कि लोकतंत्र के नाम स्वार्थ तंत्र में तब्दील इस तंत्र की इंद्रियां ही मर चुकी है जो स्वयं के स्वार्थ के आगे न तो कुछ देखना चाहती है न ही सुनना और न ही समझना। ऐसे में आखिर कैसे मानव जीवन की रक्षा सुनिश्चित होगी आज की स्थिति में हर नागरिक को यहीं सबसे बडी समझने वाली बात होना चाहिए। कहते है कि जिन्हें अकल का अजीरण है वह उलझे धागों के झुण्ड को सुलझाने की विधि जान लें बडी से बडी समस्यायें समाधान हो जायेंगी और यह हुनर पतंग उडाने लंग्गढ लडाने वाले, हर उस बच्चे को ईश्वर प्रवत करता है जिसमें समझने और सुलझाने का जुनून हो।
जय स्वराज
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