कोरोनाकाल को चुनौती देते, माई-बाप भोपाल में कोरोना विस्फोट से थर्राया मानव जीवन
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह से लोकतंत्र के माई-बाप अपने मुखिया की सीख और सेहत को दरकिनार कर कोरोना को चुनौती देने में जुटे है उससे लगता है कि कोरोना कोई संकट नहीं। जिस सोशल डिस्टेंस और मुंह पर मास्क लगाने को लेकर सत्तायें सख्त है और आम जनता पर जुर्माना तक ठोकने से नहीं चूक रही, तो वहीं सत्ता प्रमुख ऐसे ही माई-बापों की ऐसी ही लापरवाही का शिकार हो आज स्वास्थ्य सेवा लेने पर मजबूर है। मगर सत्ता के कुछ सभाषद है मानों उन्होंने अमृत धारण कर कोरोना को खुली चुनौती दे रखी है। जिसमें कई माई-बाप तो सरेयाम मुंह खोले जनसंपर्क और जनता के बीच सीधे संपर्क में आने से नहीं हिचक रहे। ऐसे में यह सत्ता पर सभाषद, सत्ता प्रमुख और म.प्र. की जनता तथा अपने मातहतों को क्या संदेश देना चाहते है यह तो वहीं जाने। मगर जिस तरह की प्रवृति सत्ता पद सौपानों पर कानून की धज्जियां उडाने की पनप रही है उसे न तो लोकतंत्र और न ही संवैधानिक संस्थाओं के लिए उचित कहा जा सकता है। फिलहाल कोरोनाकाल को लेकर जिस तरह के आचरण का निर्वहन सत्ता सौपानों में हो रहा है वह न तो आमजन लोकतांत्रिक संस्थाओं और मुखिया हित में है न ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में आस्था रखने वालों के हित मे।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह से लोकतंत्र के माई-बाप अपने मुखिया की सीख और सेहत को दरकिनार कर कोरोना को चुनौती देने में जुटे है उससे लगता है कि कोरोना कोई संकट नहीं। जिस सोशल डिस्टेंस और मुंह पर मास्क लगाने को लेकर सत्तायें सख्त है और आम जनता पर जुर्माना तक ठोकने से नहीं चूक रही, तो वहीं सत्ता प्रमुख ऐसे ही माई-बापों की ऐसी ही लापरवाही का शिकार हो आज स्वास्थ्य सेवा लेने पर मजबूर है। मगर सत्ता के कुछ सभाषद है मानों उन्होंने अमृत धारण कर कोरोना को खुली चुनौती दे रखी है। जिसमें कई माई-बाप तो सरेयाम मुंह खोले जनसंपर्क और जनता के बीच सीधे संपर्क में आने से नहीं हिचक रहे। ऐसे में यह सत्ता पर सभाषद, सत्ता प्रमुख और म.प्र. की जनता तथा अपने मातहतों को क्या संदेश देना चाहते है यह तो वहीं जाने। मगर जिस तरह की प्रवृति सत्ता पद सौपानों पर कानून की धज्जियां उडाने की पनप रही है उसे न तो लोकतंत्र और न ही संवैधानिक संस्थाओं के लिए उचित कहा जा सकता है। फिलहाल कोरोनाकाल को लेकर जिस तरह के आचरण का निर्वहन सत्ता सौपानों में हो रहा है वह न तो आमजन लोकतांत्रिक संस्थाओं और मुखिया हित में है न ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में आस्था रखने वालों के हित मे।
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