कोरोनाकाल में मंथन........तीरंदाज ? राजा को विष और सभाषदों को अमृत
व्ही.एस.भुल्ले
भैया- कालिख, कंडे पडे म्हारी चुनाव चंदा पार्टी की किस्मत पर, मने तो बोल्यू कि बगैर चुनाव जीते ही सीधे सत्ता सिंहासन पर आसीन होने वाली पार्टी का सदस्य हाथों-हाथ बन जाऊं और मंत्री बन हेलिकाॅप्टर, जहाज, लग्झरी वाहन और फाईव-सेवन स्टार होटलों का सुख उठाऊं, मौका लगा तो हेलिकाॅप्टर, जहाज की सैर कर पेडिंग पडे अपने सारे काम निपटाऊं और जाने, अनजाने में हुए पापों को धोने दर-दर माथा टेक मां गंगा में आचमन कर अपने और अपनों के पाप को धो आऊं। मने तो बोल्यू भाया कोरोनाकाल है सो कोरोनाकाल से निकले अमृत को हासिल करने पूरे ऐडी-चोटी का जोर लगाऊं, साथ ही मायावी बन, मने भी कम से कम इस कोरोनाकाल में तो अमर हो जाऊं, अब इस कोरोनाकाल में बेचारे गहलोत का निजाम बचे या न बचे म्हारे को कै लेना-देना, बैसे भी म्हारे मौन प्रदेश में म्हारे नाथ का कारवां क्यों डूबा बाबा महाकाल के दरबार में इसकी भी तो समीक्षा होना है। सुना है म्हारे लोक और तंत्र में हाईकमान और संगठन के नामों का बडा लोचा है बैसे तो म्हारे संगठनों में लोकतंत्र जिन्दा है। मगर सारे निर्णय तो कमानों को ही लेना है, सो भैया मने तो बोल्यू थारी सियासत तू ही जाडे, मने तो सत्ता सुख की चिन्ता है अब किसको अमृत और किसको विष मिलता है ये तो कोरोना ही जाडे।
भैये- तने इस महासंकट काल में कै अर्र-बर्र बोल जा रिया शै, कै थारे को म्हारे जैसे काले-पीले चिन्दी-पन्ने वाले और अंतिम पंक्ति में खडे बेहाल नंगे भूखों पर कतई रहम नहीं आ रिया शै, कै मने इसी दिन को देखने थारे और म्हारे महान लोकतंत्र को अंगीकार किया शै, मने तो चौथा स्तम्भ भले ही न बचा सका, कम से कम तने तो अपने लोक और जन की हालत पर सवाल कर लिया होता।
भैया- कोरोनाकाल के अमृत को पाकर मने तो धन्य हो लिया शै, थारे जैसे चिन्दी-पन्ने, डिवेटों वालों का क्या जो प्रभु नारद की कृतज्ञता तो कलंकित करने से थारा कुनवा नहीं चूक रिया शै, फिर कै थारे को मालूम कोणी कै लोकतंत्र में राजा भगवान होवे और सभाषद, मंत्री, सेवक उसके चाकर होवे। अब ऐसे में राजा के हिस्से में विष और सभाषदों के हिस्से में अमृत आ रिया शै, तो म्हारी गलती कोणी।
भैये- आखिर मानव धर्म भी तो कोई चीज होवे, जिसके कारण इतना बडा महाभारत हुआ और बडे-बडे सूरमा और बलशालियों का संहार हुआ फिर तने भी तो मानवता की रक्षा करने का विश्वास अभी तक देता आया है और सारा खेल सिर्फ सत्ता के ही इर्द-गिर्द सर्वकल्याण और सेवा के नाम जमाया है फिर टोली हाईकमानों की बफादार हो या फिर उनकी सामूहिक जबावदेही वैचारिक हो सभी दूर तो सत्ता का ही खेल तो है, सो मने तो अपना, अपनों के लिए निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करने की कोशिश कर रहा हूं।
भैया- गर मानवता और मानव धर्म की परिभाषा थारी शिक्षा, संस्कार में यही है तो मने थारे से कुछ नहीं कहना, फिर सत्ता के लिए अलट-पलट का खेल आज का थोडे ही है, ये तो अनादिकाल से चलता रहा है फिर जिसकी जैसी शिक्षा, संस्कार समझ वह मानव धर्म की रक्षा कल्याण की खातिर अपने हिसाब से परिभाषित करते आया है, सो अगर कोरोनाकाल में भी सेवा कल्याण की नई सियासी ईवारत लिखी जा रही है तो गलत क्या है, मने तो दर्द सत्य और दम तोडते विश्वास को लेकर है, गम और आशा-आकांक्षाओं के टूटते पैमानो को लेकर है जो आज अपने मूर्त स्वरूप को छोड कांच के टुकडों में बिखरा पडा है।
भैये- मैं जाडू थारा दर्द और सारी शिकायत, मगर कै करूं, बैसे भी पुरानी कहावत है यथा-राजा, तथा-प्रजा, तो यहां अगर म्हारे लोक जन तंत्र में यथा-प्रजा, तथा-राजा की कहावत इस कोरोनाकाल में प्रचलित हो रही है तो दोष किसका ? मने ये भी जाडू कि ऊपर वाले ने हर सक्षम समझ वाले व्यक्ति से उसके निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन की उम्मीद रख छोडी थी जिसका पालन करने, कराने कई किवदंतियां, धर्म, शास्त्र इतिहासों में दर्ज है जिन्हें तने और मने आज आध्यात्म मान स्वयं को समृद्ध सशक्त शक्तिशाली मानने पर तुले है। अगर ऐसे में अपने भ्रम को त्याग और संविधान अंगीकार करने वाले कत्र्तव्य विमुख है तो फिर दर्द कैसा, मने तो बोल्यू कि भाया जैसा देश बैसा वेष क्रम में चलेगा तो आज नहीं तो कल सिंहासन तक अवश्य पहुंचेगा, बरना अंतिम पंक्ति में खडे सस्ते राशन और कोरोनाकाल में कहर ढा रहे कोरोना से भी बगैर उपाय किये नहीं बच पाओगे, इसलिये तने भी म्हारे महान नेताओं की तरह नेता न बन, मुंह पर मास्क लगा, हर आधा घंटे में साबुन से हाथ धो और जरूरत पडने पर ही सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुये घर से निकलना नहीं तो घर में ही बगैर किसी के संपर्क में आये खुद की सुरक्षा कर लेना, इतने पर तो चल जायेगी, बरना थारी तो थारी म्हारी काटी भी थारे-म्हारे परिजनों के हाथ नहीं आयेगी। बोल भैया कैसी रही।
भैया- कालिख, कंडे पडे म्हारी चुनाव चंदा पार्टी की किस्मत पर, मने तो बोल्यू कि बगैर चुनाव जीते ही सीधे सत्ता सिंहासन पर आसीन होने वाली पार्टी का सदस्य हाथों-हाथ बन जाऊं और मंत्री बन हेलिकाॅप्टर, जहाज, लग्झरी वाहन और फाईव-सेवन स्टार होटलों का सुख उठाऊं, मौका लगा तो हेलिकाॅप्टर, जहाज की सैर कर पेडिंग पडे अपने सारे काम निपटाऊं और जाने, अनजाने में हुए पापों को धोने दर-दर माथा टेक मां गंगा में आचमन कर अपने और अपनों के पाप को धो आऊं। मने तो बोल्यू भाया कोरोनाकाल है सो कोरोनाकाल से निकले अमृत को हासिल करने पूरे ऐडी-चोटी का जोर लगाऊं, साथ ही मायावी बन, मने भी कम से कम इस कोरोनाकाल में तो अमर हो जाऊं, अब इस कोरोनाकाल में बेचारे गहलोत का निजाम बचे या न बचे म्हारे को कै लेना-देना, बैसे भी म्हारे मौन प्रदेश में म्हारे नाथ का कारवां क्यों डूबा बाबा महाकाल के दरबार में इसकी भी तो समीक्षा होना है। सुना है म्हारे लोक और तंत्र में हाईकमान और संगठन के नामों का बडा लोचा है बैसे तो म्हारे संगठनों में लोकतंत्र जिन्दा है। मगर सारे निर्णय तो कमानों को ही लेना है, सो भैया मने तो बोल्यू थारी सियासत तू ही जाडे, मने तो सत्ता सुख की चिन्ता है अब किसको अमृत और किसको विष मिलता है ये तो कोरोना ही जाडे। भैये- तने इस महासंकट काल में कै अर्र-बर्र बोल जा रिया शै, कै थारे को म्हारे जैसे काले-पीले चिन्दी-पन्ने वाले और अंतिम पंक्ति में खडे बेहाल नंगे भूखों पर कतई रहम नहीं आ रिया शै, कै मने इसी दिन को देखने थारे और म्हारे महान लोकतंत्र को अंगीकार किया शै, मने तो चौथा स्तम्भ भले ही न बचा सका, कम से कम तने तो अपने लोक और जन की हालत पर सवाल कर लिया होता।
भैया- कोरोनाकाल के अमृत को पाकर मने तो धन्य हो लिया शै, थारे जैसे चिन्दी-पन्ने, डिवेटों वालों का क्या जो प्रभु नारद की कृतज्ञता तो कलंकित करने से थारा कुनवा नहीं चूक रिया शै, फिर कै थारे को मालूम कोणी कै लोकतंत्र में राजा भगवान होवे और सभाषद, मंत्री, सेवक उसके चाकर होवे। अब ऐसे में राजा के हिस्से में विष और सभाषदों के हिस्से में अमृत आ रिया शै, तो म्हारी गलती कोणी।
भैये- आखिर मानव धर्म भी तो कोई चीज होवे, जिसके कारण इतना बडा महाभारत हुआ और बडे-बडे सूरमा और बलशालियों का संहार हुआ फिर तने भी तो मानवता की रक्षा करने का विश्वास अभी तक देता आया है और सारा खेल सिर्फ सत्ता के ही इर्द-गिर्द सर्वकल्याण और सेवा के नाम जमाया है फिर टोली हाईकमानों की बफादार हो या फिर उनकी सामूहिक जबावदेही वैचारिक हो सभी दूर तो सत्ता का ही खेल तो है, सो मने तो अपना, अपनों के लिए निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करने की कोशिश कर रहा हूं।
भैया- गर मानवता और मानव धर्म की परिभाषा थारी शिक्षा, संस्कार में यही है तो मने थारे से कुछ नहीं कहना, फिर सत्ता के लिए अलट-पलट का खेल आज का थोडे ही है, ये तो अनादिकाल से चलता रहा है फिर जिसकी जैसी शिक्षा, संस्कार समझ वह मानव धर्म की रक्षा कल्याण की खातिर अपने हिसाब से परिभाषित करते आया है, सो अगर कोरोनाकाल में भी सेवा कल्याण की नई सियासी ईवारत लिखी जा रही है तो गलत क्या है, मने तो दर्द सत्य और दम तोडते विश्वास को लेकर है, गम और आशा-आकांक्षाओं के टूटते पैमानो को लेकर है जो आज अपने मूर्त स्वरूप को छोड कांच के टुकडों में बिखरा पडा है।
भैये- मैं जाडू थारा दर्द और सारी शिकायत, मगर कै करूं, बैसे भी पुरानी कहावत है यथा-राजा, तथा-प्रजा, तो यहां अगर म्हारे लोक जन तंत्र में यथा-प्रजा, तथा-राजा की कहावत इस कोरोनाकाल में प्रचलित हो रही है तो दोष किसका ? मने ये भी जाडू कि ऊपर वाले ने हर सक्षम समझ वाले व्यक्ति से उसके निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन की उम्मीद रख छोडी थी जिसका पालन करने, कराने कई किवदंतियां, धर्म, शास्त्र इतिहासों में दर्ज है जिन्हें तने और मने आज आध्यात्म मान स्वयं को समृद्ध सशक्त शक्तिशाली मानने पर तुले है। अगर ऐसे में अपने भ्रम को त्याग और संविधान अंगीकार करने वाले कत्र्तव्य विमुख है तो फिर दर्द कैसा, मने तो बोल्यू कि भाया जैसा देश बैसा वेष क्रम में चलेगा तो आज नहीं तो कल सिंहासन तक अवश्य पहुंचेगा, बरना अंतिम पंक्ति में खडे सस्ते राशन और कोरोनाकाल में कहर ढा रहे कोरोना से भी बगैर उपाय किये नहीं बच पाओगे, इसलिये तने भी म्हारे महान नेताओं की तरह नेता न बन, मुंह पर मास्क लगा, हर आधा घंटे में साबुन से हाथ धो और जरूरत पडने पर ही सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुये घर से निकलना नहीं तो घर में ही बगैर किसी के संपर्क में आये खुद की सुरक्षा कर लेना, इतने पर तो चल जायेगी, बरना थारी तो थारी म्हारी काटी भी थारे-म्हारे परिजनों के हाथ नहीं आयेगी। बोल भैया कैसी रही।
Comments
Post a Comment