शिवपुरी के बिगडे ढर्रे पर मातम मनाती मानवता सेवकों की कत्र्तव्यनिष्ठा से थर्रायी संस्थायें अलालों को कवच साबित होता कोरोनाकाल
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह की सेवाऐं शिवपुरी शहर में विगत 10-15 वर्षो से प्रचलित है उसे देख लगता है अब मानवता भी जबाव देने लगी है। भ्रष्टाचार के आखण्ड में डूबी अलाल लोगों की मण्डली सेवा के नाम क्या कुछ कर गुजर जाये यह किसी से छिपा नहीं। विगत वर्षो में लोकायुक्त के छापे और कुछ द्वारा की गई कार्यवाहियां और शिकायतें इस बात का प्रमाण है कि भ्रष्टाचार किस स्तर तक पैठ बना चुका है। मामले तो अनेक है मगर जब जबावदेह लोग स्वयं अनदेखी कर और ऐसे भ्रष्ट अर्कमण्य लोगों को संरक्षण देने का काम करे तो फिर शिकायत होना भी अपने आप में बैमानी है। जैसे-तैसे लोग कोरोना से विगत दो-चार महीने से दो-चार हो ही रहे थे कि सेवा की कत्र्तव्यनिष्ठा ने आम लोगों को चारो-खाने चित कर रखा है। सेवकों के हालात ये है कि कार्यालय तो कोरोना की कृपा से चल ही नहीं पा रहे। अगर किसी को दूरभाष पर संपर्क भी करना होगा तो भाई लोग फोन भी न उठाने में अपनी सबसे बडी निष्ठा समझते है। म.प्र. के सबसे सुन्दर शहर का सत्यानाश करने वाले सेवकांे की कुंडली खंगाली जाये तो शहर का भले ही व्यवस्था के नाम पर सत्यानाश हो चुका हो। मगर वह जरूर समृद्ध खुशहाल नजर आते है। चाहे वह पेयजल, साफ-सफाई, नाला सफाई अतिक्रमण से पटा शहर का मामला हो या फिर घरों में बैठे सेवा सतकार के नाम हजारों-लाखों की पगार हर माह प्राप्त करने वाले लोग हो, इनसे कोई पूछने वाला नहीं कि उन्होंने एक महीन क्या कार्य किया, न ही सरकार और शासन के पास ऐसा कोई जीवंत सिस्टम जो यह तय कर पाये कि शासकीय वाहनों में आये दिन घरों की यात्रा कर हर माह मोटा वेतन लेने वाले इन कत्र्तव्य निष्ठों की कृतज्ञता का परिणाम क्या है। सिर्फ और सिर्फ अपनी अलाली को ढकने स्वयं की व्यस्तता सिद्ध करने में माहिर कुछ धूर्त सेवक समूची व्यवस्था को ही कलंकित करने से नहीं चूक रहे। अब इस कोरोनाकाल में भले ही कलेक्टर, एसपी ऐडी चोटी का जोर लगा जैसे-तैसे कोरोना के हालात काबू करने में गली, मौहल्लों का भ्रमण कर रहे हो मगर मातहतों को दर्द नहीं कि वह भले ही कुछ ऐसा कर निष्ठा सिद्ध करें जिससे लोगों में यह विश्वास पैदा हो कि जिस संविधान को उन्होंने अंगीकार कर ऐसे सेवकांे को पोषित करने का बीडा उठाया है वह कम से कम कोरोनाकाल जैसे महासंकट के दौरान कुछ तो निष्ठापूर्ण सेवायें आम नागरिक को दे रहे है यह विचार उन विभाग प्रमुख और मोटे पगार लेने वाले उन सेवकों को करना है जिनके कंधों पर शिवपुरी शहर की सेवा का भार है। मगर लगता नहीं कि कोरोनाकाल का दंश और शिवपुरी की आवो-हवा इन्हें ऐसा कुछ करने दें। ये अलग बात है कि म.प्र. के मुख्यमंत्री भले ही यह जता चुके हो कि अब स्थानानातंरण निलंबन ही सिर्फ निदान नहीं, बल्कि ऐसे लोगों को सीधे बर्खास्त किया जाना चाहिए। भले ही बिहार के सुशासन बाबू ने हाल ही में कई सेवकों को बर्खास्त कर यह संदेश स्पष्ट कर दिया कि जो लोग सेवा नहीं कर सकते वह घर ही बैठे म.प्र. में खासकर शिवपुरी के मामले में कब इस तरह के समाचार सुनने, पढने मिलेंगें यह देखने वाली बात होगी।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस तरह की सेवाऐं शिवपुरी शहर में विगत 10-15 वर्षो से प्रचलित है उसे देख लगता है अब मानवता भी जबाव देने लगी है। भ्रष्टाचार के आखण्ड में डूबी अलाल लोगों की मण्डली सेवा के नाम क्या कुछ कर गुजर जाये यह किसी से छिपा नहीं। विगत वर्षो में लोकायुक्त के छापे और कुछ द्वारा की गई कार्यवाहियां और शिकायतें इस बात का प्रमाण है कि भ्रष्टाचार किस स्तर तक पैठ बना चुका है। मामले तो अनेक है मगर जब जबावदेह लोग स्वयं अनदेखी कर और ऐसे भ्रष्ट अर्कमण्य लोगों को संरक्षण देने का काम करे तो फिर शिकायत होना भी अपने आप में बैमानी है। जैसे-तैसे लोग कोरोना से विगत दो-चार महीने से दो-चार हो ही रहे थे कि सेवा की कत्र्तव्यनिष्ठा ने आम लोगों को चारो-खाने चित कर रखा है। सेवकों के हालात ये है कि कार्यालय तो कोरोना की कृपा से चल ही नहीं पा रहे। अगर किसी को दूरभाष पर संपर्क भी करना होगा तो भाई लोग फोन भी न उठाने में अपनी सबसे बडी निष्ठा समझते है। म.प्र. के सबसे सुन्दर शहर का सत्यानाश करने वाले सेवकांे की कुंडली खंगाली जाये तो शहर का भले ही व्यवस्था के नाम पर सत्यानाश हो चुका हो। मगर वह जरूर समृद्ध खुशहाल नजर आते है। चाहे वह पेयजल, साफ-सफाई, नाला सफाई अतिक्रमण से पटा शहर का मामला हो या फिर घरों में बैठे सेवा सतकार के नाम हजारों-लाखों की पगार हर माह प्राप्त करने वाले लोग हो, इनसे कोई पूछने वाला नहीं कि उन्होंने एक महीन क्या कार्य किया, न ही सरकार और शासन के पास ऐसा कोई जीवंत सिस्टम जो यह तय कर पाये कि शासकीय वाहनों में आये दिन घरों की यात्रा कर हर माह मोटा वेतन लेने वाले इन कत्र्तव्य निष्ठों की कृतज्ञता का परिणाम क्या है। सिर्फ और सिर्फ अपनी अलाली को ढकने स्वयं की व्यस्तता सिद्ध करने में माहिर कुछ धूर्त सेवक समूची व्यवस्था को ही कलंकित करने से नहीं चूक रहे। अब इस कोरोनाकाल में भले ही कलेक्टर, एसपी ऐडी चोटी का जोर लगा जैसे-तैसे कोरोना के हालात काबू करने में गली, मौहल्लों का भ्रमण कर रहे हो मगर मातहतों को दर्द नहीं कि वह भले ही कुछ ऐसा कर निष्ठा सिद्ध करें जिससे लोगों में यह विश्वास पैदा हो कि जिस संविधान को उन्होंने अंगीकार कर ऐसे सेवकांे को पोषित करने का बीडा उठाया है वह कम से कम कोरोनाकाल जैसे महासंकट के दौरान कुछ तो निष्ठापूर्ण सेवायें आम नागरिक को दे रहे है यह विचार उन विभाग प्रमुख और मोटे पगार लेने वाले उन सेवकों को करना है जिनके कंधों पर शिवपुरी शहर की सेवा का भार है। मगर लगता नहीं कि कोरोनाकाल का दंश और शिवपुरी की आवो-हवा इन्हें ऐसा कुछ करने दें। ये अलग बात है कि म.प्र. के मुख्यमंत्री भले ही यह जता चुके हो कि अब स्थानानातंरण निलंबन ही सिर्फ निदान नहीं, बल्कि ऐसे लोगों को सीधे बर्खास्त किया जाना चाहिए। भले ही बिहार के सुशासन बाबू ने हाल ही में कई सेवकों को बर्खास्त कर यह संदेश स्पष्ट कर दिया कि जो लोग सेवा नहीं कर सकते वह घर ही बैठे म.प्र. में खासकर शिवपुरी के मामले में कब इस तरह के समाचार सुनने, पढने मिलेंगें यह देखने वाली बात होगी।

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